आत्माराम
वेदों-ग्राम में महादेव सोनार एक सुविख्यात आदमी था।
वह अपने सायबान में प्रात: से संध्या तक अँगीठी के सामने बैठा हुआ खटखट किया करता
था। यह लगातार ध्वनि सुनने के लोग इतने अभ्यस्त हो गये थे कि जब किसी कारण से वह
बंद हो जाती, तो जान पड़ता था, कोई चीज गायब हो गयी। वह नित्य-प्रति एक बार
प्रात:काल अपने तोते का पिंजड़ा लिए कोई भजन गाता हुआ तालाब की ओर जाता था। उस
धँधले प्रकाश में उसका जर्जर शरीर, पोपला मुँह और झुकी हुई कमर देखकर किसी
अपरिचित मनुष्य को उसके पिशाच होने का भ्रम हो सकता था। ज्यों ही लोगों के कानों
में आवाज आती—‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता,’ लोग समझ जाते कि भोर हो गयी।
महादेव
का पारिवारिक जीवन सूखमय न था। उसके तीन पुत्र थे, तीन बहुऍं थीं, दर्जनों नाती-पाते
थे, लेकिन उसके बोझ को
हल्का करने-वाला कोई न था। लड़के कहते—‘तब तक दादा जीते हैं, हम जीवन का आनंद
भोग ले, फिर तो यह ढोल गले पड़ेगी ही।’
बेचारे महादेव को कभी-कभी निराहार ही रहना पड़ता। भोजन के समय उसके घर में
साम्यवाद का ऐसा गगनभेदी निर्घोष होता कि
वह भूखा ही उठ आता, और नारियल का हुक्का पीता हुआ सो जाता। उनका व्यापसायिक जीवन और
भी आशांतिकारक था। यद्यपि वह अपने काम में निपुण था, उसकी खटाई औरों से
कहीं ज्यादा शुद्धिकारक और उसकी रासयनिक क्रियाऍं कहीं ज्यादा कष्टसाध्य थीं, तथापि उसे आये दिन
शक्की और धैर्य-शून्य प्राणियों के अपशब्द सुनने पड़ते थे, पर महादेव अविचिलित
गाम्भीर्य से सिर झुकाये सब कुछ सुना करता था। ज्यों ही यह कलह शांत होता, वह अपने तोते की ओर
देखकर पुकार उठता—‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्तदाता।’ इस मंत्र को जपते ही उसके चित्त को पूर्ण शांति प्राप्त हो जाती
थी।
२
एक
दिन संयोगवश किसी लड़के ने पिंजड़े का द्वार खोल दिया। तोता उड़ गया। महादेव ने
सिह उठाकर जो पिंजड़े की ओर देखा, तो उसका कलेजा सन्न-से हो गया। तोता कहॉँ
गया। उसने फिर पिंजड़े को देखा, तोता गायब था। महादेव घबड़ा कर उठा और
इधर-उधर खपरैलों पर निगाह दौड़ाने लगा। उसे संसार में कोई वस्तु अगर प्यारी थी, तो वह यही तोता।
लड़के-बालों, नाती-पोतों से उसका जी भर गया था। लड़को की चुलबुल से उसके काम
में विघ्न पड़ता था। बेटों से उसे प्रेम न था;
इसलिए नहीं कि वे निकम्मे थे; बल्कि इसलिए कि
उनके कारण वह अपने आनंददायी कुल्हड़ों की नियमित संख्या से वंचित रह जाता था।
पड़ोसियों से उसे चिढ़ थी, इसलिए कि वे अँगीठी
से आग निकाल ले जाते थे। इन समस्त विघ्न-बाधाओं से उसके लिए कोई पनाह थी, तो यही तोता था।
इससे उसे किसी प्रकार का कष्ट न होता था। वह अब उस अवस्था में था जब मनुष्य को
शांति भोग के सिवा और कोई इच्छा नहीं रहती।
तोता
एक खपरैल पर बैठा था। महादेव ने पिंजरा उतार लिया और उसे दिखाकर कहने लगा—‘आ आ’ सत्त गुरुदत्त
शिवदाता।’ लेकिन गॉँव और घर के लड़के एकत्र हो कर चिल्लाने
और तालियॉँ बजाने लगे। ऊपर से कौओं ने कॉँव-कॉँव की रट लगायी? तोता उड़ा और गॉँव
से बाहर निकल कर एक पेड़ पर जा बैठा। महादेव खाली पिंजडा लिये उसके पीछे दौड़ा, सो दौड़ा। लोगो को
उसकी द्रुतिगामिता पर अचम्भा हो रहा था। मोह की इससे सुन्दर, इससे सजीव, इससे भावमय कल्पना
नहीं की जा सकती।
दोपहर
हो गयी थी। किसान लोग खेतों से चले आ रहे थे। उन्हें विनोद का अच्छा अवसर मिला।
महादेव को चिढ़ाने में सभी को मजा आता था। किसी ने कंकड़ फेंके, किसी ने तालियॉँ
बजायीं। तोता फिर उड़ा और वहाँ से दूर आम के बाग में एक पेड़ की फुनगी पर जा बैठा
। महादेव फिर खाली पिंजड़ा लिये मेंढक की भॉँति उचकता चला। बाग में पहुँचा तो पैर
के तलुओं से आग निकल रही थी, सिर चक्कर खा रहा था। जब जरा सावधान हुआ, तो फिर पिंजड़ा उठा
कर कहने लगे—‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता’ तोता फुनगी से उतर कर नीचे की एक डाल पी आ बैठा, किन्तु महादेव की
ओर सशंक नेत्रों से ताक रहा था। महादेव ने समझा, डर रहा है। वह
पिंजड़े को छोड़ कर आप एक दूसरे पेड़ की आड़ में छिप गया। तोते ने चारों ओर गौर से
देखा, निश्शंक हो गया, अतरा और आ कर पिंजड़े
के ऊपर बैठ गया। महादेव का हृदय उछलने लगा। ‘सत्त
गुरुदत्त शिवदत्त दाता’ का मंत्र जपता हुआ
धीरे-धीरे तोते के समीप आया और लपका कि तोते को पकड़ लें, किन्तु तोता हाथ न
आया, फिर पेड़ पर आ
बैठा।
शाम
तक यही हाल रहा। तोता कभी इस डाल पर जाता, कभी उस डाल पर। कभी
पिंजड़े पर आ बैठता, कभी पिंजड़े के द्वार पर बैठे अपने दाना-पानी की प्यालियों को
देखता, और फिर उड़ जाता।
बुड्ढा अगर मूर्तिमान मोह था, तो तोता मूर्तिमयी माया। यहॉँ तक कि शाम हो
गयी। माया और मोह का यह संग्राम अंधकार में विलीन हो गया।
३
रात हो गयी ! चारों ओर निबिड़ अंधकार छा गया। तोता न जाने पत्तों में कहॉँ
छिपा बैठा था। महादेव जानता था कि रात को तोता कही उड़कर नहीं जा सकता, और न पिंजड़े ही
में आ सकता हैं, फिर भी वह उस जगह से हिलने का नाम न लेता था। आज उसने दिन भर कुछ
नहीं खाया। रात के भोजन का समय भी निकल गया, पानी की बूँद भी
उसके कंठ में न गयी, लेकिन उसे न भूख थी, न प्यास ! तोते के बिना उसे अपना जीवन निस्सार, शुष्क और सूना जान
पड़ता था। वह दिन-रात काम करता था; इसलिए कि यह उसकी अंत:प्रेरणा थी; जीवन के और काम इसलिए करता था कि आदत थी। इन कामों मे उसे अपनी
सजीवता का लेश-मात्र भी ज्ञान न होता था। तोता ही वह वस्तु था, जो उसे चेतना की
याद दिलाता था। उसका हाथ से जाना जीव का देह-त्याग करना था।
महादेव
दिन-भर का भूख-प्यासा, थका-मॉँदा, रह-रह कर झपकियॉँ ले लेता था; किन्तु एक क्षण में फिर चौंक कर ऑंखे खोल देता और उस विस्तृत
अंधकार में उसकी आवाज सुनायी देती—‘सत्त गुरुदत्त
शिवदत्त दाता।’
आधी
रात गुजर गयी थी। सहसा वह कोई आहट पा कर चौका। देखा, एक दूसरे वृक्ष के
नीचे एक धुँधला दीपक जल रहा है, और कई आदमी बैंठे हुए आपस में कुछ बातें कर
रहे हैं। वे सब चिलम पी रहे थे। तमाखू की महक ने उसे अधीर कर दिया। उच्च स्वर से
बोला—‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता’
और उन आदमियों की ओर चिलम पीने चला गया; किन्तु जिस प्रकार
बंदूक की आवाज सुनते ही हिरन भाग जाते हैं उसी प्रकार उसे आते देख सब-के-सब उठ कर
भागे। कोई इधर गया, कोई उधर। महादेव चिल्लाने लगा—‘ठहरो-ठहरो
!’ एकाएक उसे ध्यान आ गया, ये सब चोर हैं। वह
जारे से चिल्ला उठा—‘चोर-चोर, पकड़ो-पकड़ो !’ चोरों ने पीछे फिर कर न देखा।
महादेव दीपक के पास गया, तो उसे एक मलसा रखा
हुआ मिला जो मोर्चे से काला हो रहा था। महादेव का हृदय उछलने लगा। उसने कलसे मे
हाथ डाला, तो मोहरें थीं। उसने एक मोहरे बाहर निकाली और दीपक के उजाले में
देखा। हॉँ मोहर थी। उसने तुरंत कलसा उठा लिया, और दीपक बुझा दिया
और पेड़ के नीचे छिप कर बैठ रहा। साह से चोर बन गया।
उसे फिर शंका हुई, ऐसा न हो, चोर लौट आवें, और मुझे अकेला देख
कर मोहरें छीन लें। उसने कुछ मोहर कमर में बॉँधी, फिर एक सूखी लकड़ी
से जमीन की की मिटटी हटा कर कई गड्ढे बनाये, उन्हें माहरों से
भर कर मिटटी से ढँक दिया।
४
महादेव के अतर्नेत्रों के
सामने अब एक दूसरा जगत् था, चिंताओं और कल्पना से परिपूर्ण। यद्यपि अभी
कोष के हाथ से निकल जाने का भय था; पर अभिलाषाओं ने
अपना काम शुरु कर दिया। एक पक्का मकान बन गया, सराफे की एक भारी
दूकान खुल गयी, निज सम्बन्धियों से फिर नाता जुड़ गया, विलास की
सामग्रियॉँ एकत्रित हो गयीं। तब तीर्थ-यात्रा करने चले, और वहॉँ से लौट कर
बड़े समारोह से यज्ञ, ब्रह्मभोज हुआ। इसके पश्चात एक शिवालय और कुऑं बन गया, एक बाग भी लग गया
और वह नित्यप्रति कथा-पुराण सुनने लगा। साधु-सन्तों का आदर-सत्कार होने लगा।
अकस्मात उसे ध्यान आया, कहीं चोर आ जायँ , तो मैं भागूँगा
क्यों-कर? उसने परीक्षा करने के लिए कलसा उठाया। और दो सौ पग तक बेतहाशा
भागा हुआ चला गया। जान पड़ता था, उसके पैरो में पर लग गये हैं। चिंता शांत हो
गयी। इन्हीं कल्पनाओं में रात व्यतीत हो गयी। उषा का आगमन हुआ, हवा जागी, चिड़ियॉँ गाने
लगीं। सहसा महादेव के कानों में आवाज आयी—
‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता,
राम के चरण में चित्त लगा।’
यह बोल सदैव महादेव की
जिह्वा पर रहता था। दिन में सहस्रों ही बार ये शब्द उसके मुँह से निकलते थे, पर उनका धार्मिक
भाव कभी भी उसके अन्त:कारण को स्पर्श न करता था। जैसे किसी बाजे से राग निकलता हैं, उसी प्रकार उसके
मुँह से यह बोल निकलता था। निरर्थक और प्रभाव-शून्य। तब उसका हृदय-रुपी वृक्ष
पत्र-पल्लव विहीन था। यह निर्मल वायु उसे गुंजरित न कर सकती थी; पर अब उस वृक्ष में कोपलें और शाखाऍं निकल आयी थीं। इन
वायु-प्रवाह से झूम उठा, गुंजित हो गया।
अरुणोदय का समय था। प्रकृति
एक अनुरागमय प्रकाश में डूबी हुई थी। उसी समय तोता पैरों को जोड़े हुए ऊँची डाल से
उतरा, जैसे आकाश से कोई
तारा टूटे और आ कर पिंजड़े में बैठ गया। महादेव प्रफुल्लित हो कर दौड़ा और पिंजड़े
को उठा कर बोला—आओ आत्माराम तुमने कष्ट तो बहुत दिया, पर मेरा जीवन भी
सफल कर दिया। अब तुम्हें चॉँदी के पिंजड़े में रखूंगा और सोने से मढ़ दूँगा।’ उसके रोम-रोम के परमात्मा के गुणानुवाद की ध्वनि निकलने लगी।
प्रभु तुम कितने दयावान् हो ! यह तुम्हारा असीम
वात्सल्य है, नहीं तो मुझ पापी, पतित प्राणी कब इस कृपा के योग्य था ! इस पवित्र भावों से आत्मा विन्हल हो गयी ! वह अनुरक्त हो कर
कह उठा—
‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता,
राम के चरण में चित्त लागा।’
उसने एक हाथ में पिंजड़ा
लटकाया, बगल में कलसा दबाया और घर चला।
५
महादेव घर पहुँचा, तो अभी कुछ अँधेरा
था। रास्ते में एक कुत्ते के सिवा और किसी से भेंट न हुई, और कुत्ते को
मोहरों से विशेष प्रेम नहीं होता। उसने कलसे को एक नाद में छिपा दिया, और कोयले से अच्छी
तरह ढँक कर अपनी कोठरी में रख आया। जब दिन निकल आया तो वह सीधे पुराहित के घर
पहुँचा। पुरोहित पूजा पर बैठे सोच रहे थे—कल
ही मुकदमें की पेशी हैं और अभी तक हाथ में कौड़ी भी नहीं—यजमानो
में कोई सॉँस भी लेता। इतने में महादेव ने पालागन की। पंड़ित जी ने मुँह फेर लिया।
यह अमंगलमूर्ति कहॉँ से आ पहुँची, मालमू नहीं, दाना भी मयस्सर
होगा या नहीं। रुष्ट हो कर पूछा—क्या है जी, क्या कहते हो।
जानते नहीं, हम इस समय पूजा पर रहते हैं।
महादेव ने कहा—महाराज, आज मेरे यहॉँ सत्यनाराण की कथा है।
पुरोहित जी विस्मित हो गये।
कानों पर विश्वास न हुआ। महादेव
के घर कथा का होना उतनी ही असाधारण घटना थी, जितनी अपने घर से
किसी भिखारी के लिए भीख निकालना। पूछा—आज क्या है?
महादेव
बोला—कुछ नहीं, ऐसा इच्छा हुई कि आज भगवान की कथा सुन लूँ।
प्रभात ही से तैयारी होने
लगी। वेदों के निकटवर्ती गॉँवो में सूपारी फिरी। कथा के उपरांत भोज का भी नेवता
था। जो सुनता आश्चर्य करता आज रेत में दूब कैसे जमी।
संध्या
समय जब सब लोग जमा हो, और पंडित जी अपने सिंहासन पर विराजमान हुए, तो महादेव खड़ा
होकर उच्च स्वर में बोला—भाइयों मेरी सारी
उम्र छल-कपट में कट गयी। मैंने न जाने कितने आदमियों को दगा दी, कितने खरे को खोटा
किया; पर अब भगवान ने मुझ पर दया की है, वह मेरे मुँह की
कालिख को मिटाना चाहते हैं। मैं आप सब भाइयों से ललकार कर कहता हूँ कि जिसका मेरे
जिम्मे जो कुछ निकलता हो, जिसकी जमा मैंने मार ली हो, जिसके चोखे माल का
खोटा कर दिया हो, वह आकर अपनी एक-एक कौड़ी चुका ले, अगर कोई यहॉँ न आ
सका हो, तो आप लोग उससे जाकर कह दीजिए, कल से एक महीने तक, जब जी चाहे, आये और अपना हिसाब
चुकता कर ले। गवाही-साखी का काम नहीं।
सब
लोग सन्नाटे में आ गये। कोई मार्मिक भाव से सिर हिला कर बोला—हम कहते न थे। किसी ने अविश्वास से कहा—क्या
खा कर भरेगा, हजारों को टोटल हो जायगा।
एक
ठाकुर ने ठठोली की—और जो लोग सुरधाम चले गये।
महादेव
ने उत्तर दिया—उसके घर वाले तो होंगे।
किन्तु इस समय लोगों को
वसूली की इतनी इच्छा न थी, जितनी यह जानने की कि इसे इतना धन मिल कहॉँ
से गया। किसी को महादेव के पास आने का साहस न हुआ। देहात के आदमी थे, गड़े मुर्दे
उखाड़ना क्या जानें। फिर प्राय: लोगों को याद भी न था कि उन्हें महादेव से क्या
पाना हैं, और ऐसे पवित्र अवसर पर भूल-चूक हो जाने का भय उनका मुँह बन्द
किये हुए था। सबसे बड़ी बात यह थी कि महादेव की साधुता ने उन्हीं वशीभूत कर लिया
था।
अचानक
पुरोहित जी बोले—तुम्हें याद हैं, मैंने एक कंठा
बनाने के लिए सोना दिया था, तुमने कई माशे तौल में उड़ा दिये थे।
महादेव—हॉँ, याद हैं, आपका कितना नुकसान हुआ होग।
पुरोहित—पचास रुपये से कम न होगा।
महादेव ने कमर से दो मोहरें
निकालीं और पुरोहित जी के सामने रख दीं।
पुरोहितजी
की लोलुपता पर टीकाऍं होने लगीं। यह बेईमानी हैं, बहुत हो, तो दो-चार रुपये का
नुकसान हुआ होगा। बेचारे से पचास रुपये ऐंठ लिए। नारायण का भी डर नहीं। बनने को
पंड़ित, पर नियत ऐसी खराब राम-राम !
लोगों
को महादेव पर एक श्रद्धा-सी हो गई। एक घंटा बीत गया पर उन सहस्रों मनुष्यों में से
एक भी खड़ा न हुआ। तब महादेव ने फिर कहॉँ—मालूम
होता है, आप लोग अपना-अपना हिसाब भूल गये हैं, इसलिए आज कथा होने
दीजिए। मैं एक महीने तक आपकी राह देखूँगा। इसके पीछे तीर्थ यात्रा करने चला
जाऊँगा। आप सब भाइयों से मेरी विनती है कि आप मेरा उद्धार करें।
एक
महीने तक महादेव लेनदारों की राह देखता रहा। रात को चोंरो के भय से नींद न आती। अब
वह कोई काम न करता। शराब का चसका भी छूटा। साधु-अभ्यागत जो द्वार पर आ जाते, उनका यथायोग्य
सत्कार करता। दूर-दूर उसका सुयश फैल गया। यहॉँ तक कि महीना पूरा हो गया और एक आदमी
भी हिसाब लेने न आया। अब महादेव को ज्ञान हुआ कि संसार में कितना धर्म, कितना सद्व्यवहार
हैं। अब उसे मालूम हुआ कि संसार बुरों के लिए बुरा हैं और अच्छे के लिए अच्छा।
६
इस घटना को हुए पचास वर्ष
बीत चुके हैं। आप वेदों जाइये, तो दूर ही से एक सुनहला कलस दिखायी देता है।
वह ठाकुरद्वारे का कलस है। उससे मिला हुआ एक पक्का तालाब हैं, जिसमें खूब कमल
खिले रहते हैं। उसकी मछलियॉँ कोई नहीं पकड़ता;
तालाब के किनारे एक विशाल समाधि है। यही आत्माराम का स्मृति-चिन्ह है, उसके सम्बन्ध में
विभिन्न किंवदंतियॉँ प्रचलित है। कोई कहता
हैं, वह रत्नजटित पिंजड़ा स्वर्ग को चला गया, कोई कहता, वह ‘सत्त गुरुदत्त’ कहता हुआ
अंतर्ध्यान हो गया, पर यर्थाथ यह हैं कि उस पक्षी-रुपी चंद्र को किसी बिल्ली-रुपी राहु
ने ग्रस लिया। लोग कहते हैं, आधी रात को अभी तक तालाब के किनारे आवाज आती
है—
‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता,
राम के चरण में चित्त लागा।’
महादेव के विषय में भी कितनी
ही जन-श्रुतियॉँ है। उनमें सबसे मान्य यह है कि आत्माराम के समाधिस्थ होने के बाद
वह कई संन्यासियों के साथ हिमालय चला गया, और वहॉँ से लौट कर
न आया। उसका नाम आत्माराम प्रसिद्ध हो गया।
दुर्गा
का मन्दिर
बाबू ब्रजनाथ कानून पढ़ने
में मग्न थे, और उनके दोनों बच्चे लड़ाई करने में। श्यामा चिल्लाती, कि मुन्नू मेरी
गुड़िया नहीं देता। मुन्नु रोता था कि श्यामा ने मेरी मिठाई खा ली।
ब्रजनाथ
ने क्रुद्घ हो कर भामा से कहा—तुम इन दुष्टों को
यहॉँ से हटाती हो कि नहीं? नहीं तो मैं एक-एक की खबर लेता हूँ।
भामा
चूल्हें में आग जला रही थी, बोली—अरे
तो अब क्या संध्या को भी पढ़तेही रहोगे? जरा दम तो ले लो।
ब्रज०--उठा
तो न जाएगा; बैठी-बैठी वहीं से कानून बघारोगी ! अभी एक-आध को पटक दूंगा, तो वहीं से गरजती
हुई आओगी कि हाय-हाय ! बच्चे को मार डाला !
भामा—तो मैं कुछ बैठी या सोयी तो नहीं हूँ। जरा एक घड़ी तुम्हीं लड़को
को बहलाओगे, तो क्या होगा ! कुछ मैंने ही तो
उनकी नौकरी नहीं लिखायी!
ब्रजनाथ
से कोई जवाब न देते बन पड़ा। क्रोध पानी के समान बहाव का मार्ग न पा कर और भी
प्रबल हो जाता है। यद्यपि ब्रजनाथ नैतिक सिद्धांतों के ज्ञाता थे; पर उनके पालन में इस समय कुशल न दिखायी दी। मुद्दई और मुद्दालेह, दोनों को एक ही
लाठी हॉँका, और दोनों को रोते-चिल्लाते छोड़ कानून का ग्रंथ बगल में दबा
कालेज-पार्क की राह ली।
२
सावन का महीना था। आज कई दिन
के बाद बादल हटे थे। हरे-भरे वृक्ष सुनहरी चादर ओढ़े खड़े थे। मृदु समीर सावन का
राग गाता था, और बगुले डालियों पर बैठे हिंडोले झूल रहे थे। ब्रजनाथ एक बेंच
पर आ बैठे और किताब खोली। लेकिन इस ग्रंथ को अपेक्षा प्रकृति-ग्रंथ का अवलोकन अधिक
चित्ताकर्षक था। कभी आसमान को पढ़ते थे, कभी पत्तियों को, कभी छविमयी हरियाली
को और कभी सामने मैदान में खेलते हुए लड़कों को।
एकाएक
उन्हें सामने घास पर कागज की एक पुड़िया दिखायी दी। माया ने जिज्ञासा की—आड़ में चलो, देखें इसमें क्या है।
बुद्धि
ने कहा—तुमसे मतलब? पड़ी रहने दो।
लेकिन जिज्ञासा-रुपी माया की
जीत हुई। ब्रजनाथ ने उठ कर पुड़िया उठा ली। कदाचित् किसी के पैसे पुड़िया में
लिपटे गिर पड़े हैं। खोल कर देखा; सावरेन थे। गिना, पुरे आठ निकले।
कुतूहल की सीमा न रही।
ब्रजनाथ
की छाती धड़कने लगी। आठों सावरेन हाथ में लिये सोचने लगे, इन्हें क्या करुँ? अगर यहीं रख दूँ, तो न जाने किसकी
नजर पड़े; न मालूम कौन उठा ले जाय ! नहीं यहॉँ रखना उचित नहीं। चलूँ थाने में इत्तला कर
दूँ और ये सावरेन थानेदार को सौंप दूँ। जिसके होंगे वह आप ले जायगा या अगर उसको न
भी मिलें, तो मुझ पर कोई दोष न रहेगा, मैं तो अपने
उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाऊँगा।
माया
ने परदे की आड़ से मंत्र मारना शुरु किया। वह थाने नहीं गये, सोचा—चलूं भामा से एक दिल्लगी करुँ। भोजन तैयार होगा। कल इतमीनान से
थाने जाऊँगा।
भामा
ने सावरेन देखे, तो हृदय मे एक गुदगुदी-सी हुई। पूछा किसकी है?
ब्रज०--मेरी।
भामा—चलो, कहीं हो न !
ब्रज०—पड़ी मिली है।
भामा—झूठ बात। ऐसे ही भाग्य के बली हो, तो सच बताओ कहॉँ
मिली? किसकी है?
ब्रज०—सच कहता हूँ, पड़ी मिली है।
भामा—मेरी कसम?
ब्रज०—तुम्हारी कसम।
भामा गिन्नयों को पति के हाथ
से छीनने की चेष्टा करने लगी।
ब्रजनाथ के कहा—क्यों छीनती हो?
भामा—लाओ, मैं अपने पास रख लूँ।
ब्रज०—रहने दो, मैं इसकी इत्तला करने थाने जाता हूँ।
भामा का मुख मलिन हो गया।
बोली—पड़े हुए धन की क्या इत्तला?
ब्रज०—हॉँ, और क्या, इन आठ गिन्नियों के लिए ईमान बिगाडूँगा?
भामा—अच्छा
तो सवेरे चले जाना। इस समय जाओगे, तो आने में देर होगी।
ब्रजनाथ
ने भी सोचा, यही अच्छा। थानेवाले रात को तो कोई कारवाई करेंगे नहीं। जब
अशर्फियों को पड़ा रहना है, तब जेसे थाना वैसे मेरा घर।
गिन्नियॉँ
संदूक में रख दीं। खा-पी कर लेटे, तो भामा ने हँस कर कहा—आया धन क्यों छोड़ते हो? लाओ, मैं अपने लिए एक
गुलूबंद बनवा लूँ, बहुत दिनों से जी तरस रहा है।
माया ने इस समय हास्य का रुप
धारण किया।
ब्रजनाथ ने तिरस्कार करके
कहा—गुलूबंद की लालसा में गले में फॉँसी लगाना चाहती हो क्या?
३
प्रात:काल ब्रजनाथ थाने के
लिए तैयार हूए। कानून का एक लेक्चर छूट जायेगा, कोई हरज नहीं। वह
इलाहाबाद के हाईकोर्ट में अनुवादक थे। नौकरी में उन्नति की आशा न देख कर साल भर से
वकालत की तैयारी में मग्न थे; लेकिन अभी कपड़े
पहन ही रहे थे कि उनके एक मित्र मुंशी गोरेवाला आ कर बैठ गये, ओर अपनी पारिवारिक
दुश्चिंताओं की विस्मृति की रामकहानी सुना कर अत्यंत विनीत भाव से बोले—भाई साहब, इस समय मैं इन झंझटों मे ऐसा फँस गया हूँ कि
बुद्धि कुछ काम नहीं करती। तुम बड़े आदमी हो। इस समय कुछ सहायता करो। ज्यादा नहीं
तीस रुपये दे दो। किसी न किसी तरह काम चला लूँगा, आज तीस तारीख है।
कल शाम को तुम्हें रुपये मिल जायँगे।
ब्रजनाथ
बड़े आदमी तो न थे; किन्तु बड़प्पन की हवा बॉँध रखी थी। यह
मिथ्याभिमान उनके स्वभाव की एक दुर्बलता थी। केवल अपने वैभव का प्रभाव डालने के
लिए ही वह बहुधा मित्रों की छोटी-मोटी आवश्यकताओं पर अपनी वास्तविक आवश्यकताओं को
निछावर कर दिया करत थे, लेकिन भामा को इस विषय में उनसे सहानुभूति न
थी, इसलिए जब ब्रजनाथ
पर इस प्रकार का संकट आ पड़ता था, तब थोड़ी देर के लिए उनकी पारिवारिक शांति
अवश्य नष्ट हो जाती थी। उनमें इनकार करने या टालने की हिम्मत न थी।
वह
सकुचाते हुए भामा के पास गये और बोले—तुम्हारे पास तीस
रुपये तो न होंगे? मुंशी गोरेलाल मॉँग रहे है।
भामा ने रुखाई से रहा—मेरे पास तो रुपये नहीं।
ब्रज०—होंगे तो जरुर, बहाना करती हो।
भामा—अच्छा, बहाना ही सही।
ब्रज०—तो मैं उनसे क्या कह दूँ !
भामा—कह दो घर में रुपये नहीं हैं, तुमसे न कहते बने, तो मैं पर्दे की
आड़ से कह दूँ।
ब्रज०--कहने को तो मैं कह
दूँ, लेकिन उन्हें
विश्वास न आयेगा। समझेंगे, बहाना कर रहे हैं।
भामा--समझेंगे; तो समझा करें।
ब्रज०—मुझसे ऐसी बमुरौवती नहीं हो सकती। रात-दिन का साथ ठहरा, कैसे इनकार करुँ?
भामा—अच्छा, तो जो मन में आवे, सो करो। मैं एक बार
कह चुकी, मेरे पास रुपये नहीं।
ब्रजनाथ मन में बहुत खिन्न
हुए। उन्हें विश्वास था कि भामा के पास रुपये है;
लेकिन केवल मुझे लज्जित करने के लिए इनकार कर रही है। दुराग्रह ने संकल्प को दृढ़
कर दिया। संदूक से दो गिन्नियॉँ निकालीं और गोरेलाल को दे कर बोले—भाई, कल शाम को कचहरी से आते ही रुपये दे जाना। ये एक आदमी की अमानत
हैं, मैं इसी समय देने
जा रहा था --यदि कल रुपये न पहुँचे तो
मुझे बहुत लज्जित होना पड़ेगा; कहीं मुँह दिखाने
योग्य न रहूँगा।
गोरेलाल ने मन में कहा—अमानत स्त्री के सिवा और किसकी होगी, और गिन्नियॉँ जेब
मे रख कर घर की राह ली।
४
आज पहली तारीख की संध्या है।
ब्रजनाथ दरवाजे पर बैठे गोरेलाल का इंतजार कर रहे है।
पॉँच बज गये, गोरेलाल अभी तक
नहीं आये। ब्रजनाथ की ऑंखे रास्ते की तरफ लगी हुई थीं। हाथ में एक पत्र था; लेकिन पढ़ने में जी नहीं लगता था। हर तीसरे मिनट रास्ते की ओर
देखने लगते थे; लेकिन सोचते थे—आज
वेतन मिलने का दिन है। इसी कारण आने में देर हो रही है। आते ही होंगे। छ: बजे, गोरे लाल का पता
नहीं। कचहरी के कर्मचारी एक-एक करके चले आ रहे थे। ब्रजनाथ को कोई बार धोखा हुआ। वह आ रहे हैं। जरुर वही हैं। वैसी ही अचनक है।
वैसे ही टोपी है। चाल भी वही है। हॉँ, वही हैं। इसी तरफ आ रहे
हैं। अपने हृदय से एक बोझा-सा उतरता मालूम हुआ; लेकिन
निकट आने पर ज्ञात हुआ कि कोई और है। आशा की कल्पित मूर्ति दुराशा में बदल गयी।
ब्रजनाथ
का चित्त खिन्न होने लगा। वह एक बार कुरसी से उठे। बरामदे की चौखट पर खडे हो, सड़क पर दोनों तरफ
निगाह दौड़ायी। कहीं पता नहीं। दो-तीन बार दूर से आते हुए इक्कों को देख कर
गोरेलाल का भ्रम हुआ। आकांक्षा की प्रबलता !
सात
बजे; चिराग जल गये। सड़क पर अँधेरा छाने लगा। ब्रजनाथ सड़क पर
उद्विग्न भाव से टहलने लगे। इरादा हुआ, गोरेलाल के घर चलूँ, उधर कदम बढाये; लेकिन हृदय कॉँप रहा था कि कहीं वह रास्ते में आते हुए न मिल
जायँ, तो समझें कि
थोड़े-से रुपयों के लिए इतने व्याकुल हो गये। थोड़ी ही दूर गये कि किसी को आते
देखा। भ्रम हुआ, गोरेलाल है, मुड़े और सीधे बरामदे में आकर दम लिया, लेकिन फिर वही धोखा ! फिर वही भ्रांति !
तब सोचले लगे कि इतनी देर क्यों हो रही हैं? क्या अभी तक वह
कचहरी से न आये होंगे ! ऐसा कदापि नहीं हो सकता।
उनके दफ्तर-वाले मुद्दत हुई, निकल गये। बस दो बातें हो सकती हैं, या तो उन्होंने कल
आने का निश्चय कर लिया, समझे होंगे, रात को कौन जाय, या जान-बूझ कर बैठे
होंगे, देना न चाहते होंगे, उस समय उनको गरज थी, इस समय मुझे गरज
है। मैं ही किसी को क्यों न भेज दूँ? लेकिन किसे भेजूँ? मुन्नू जा सकता है।
सड़क ही पर मकान है। यह सोच कर कमरे में गये, लैप जलाया और पत्र
लिखने बैठे, मगर ऑंखें द्वार ही की ओर लगी हुई थी। अकस्मात् किसी के पैरों की
आहट सुनाई दी। परन्तु पत्र को एक किताब के
नीचे दबा लिया और बरामद में चले आये। देखा, पड़ोस का एक
कुँजड़ा तार पढ़ाने आया है। उससे बोले—भाई, इस समय फुरसत नहीं
हैं; थोड़ी देर में आना। उसने कहा--बाबू जी, घर भर के आदमी
घबराये हैं, जरा एक निगाह देख लीजिए। निदान ब्रजनाथ ने झुँझला कर उसके हाथ से
तार ले लिया, और सरसरी नजर से देख कर बोले—कलकत्ते
से आया है। माल नहीं पहुँचा। कुँजड़े ने डरते-डरते कहा—बाबू
जी, इतना और देख लीजिए
किसने भेजा है। इस पर ब्रजनाथ ने तार फेंक दिया और बोले--मुझे इस वक्त फुरसत नहीं
है।
आठ
बज गये। ब्रजनाथ को निराशा होने लगी—मुन्नू इतनी रात
बीते नहीं जा सकता। मन में निश्चय किया, आज ही जाना चाहिए, बला से बुरा
मानेंगे। इसकी कहॉँ तक चिंता करुँ स्पष्ट कह दूँगा मेरे रुपये दे दो। भलमानसी
भलेमानसों से निभाई जा सकती है। ऐसे धूर्तो के साथ भलमनसी का व्यवहार करना मूर्खता
हैं अचकन पहनी; घर में जाकर माया से कहा—जरा एक काम से बाहर जाता हूँ, किवाड़े बन्द कर
लो।
चलने
को तो चले; लेकिन पग-पग पर रुकते जाते थे। गोरेलाल का घर
दूर से दिखाई दिया; लैंप जल रहा था। ठिठक गये और सोचने लगे चल कर
क्या कहूँगा? कहीं उन्होंने जाते-जाते रपए निकाल कर दे दिये, और देर के लिए
क्षमा मॉँगी तो मुझे बड़ी झेंप होगी। वह मुझे क्षुद्र, ओछा, धैर्यहीन समझेंगे।
नहीं, रुपयों की आतचीत
करूँ? कहूंगा—भाई घर में बड़ी देर से पेट दर्द कर रहा है। तुम्हारे पास पुराना
तेज सिरका तो नहीं है मगर नहीं, यह बहाना कुछ भद्दा-सा प्रतीत होता है। साफ
कलई खुल जायगी। ऊंह ! इस झंझट की जरुरत ही क्या है। वह मुझे देखकर आप ही समझ
जायेंगे। इस विषय में बातचीत की कुछ नौबत ही न आवेगी। ब्रजनाथ इसी उधेड़बुन में
आगे बढ़ते चले जाते थे जैसे नदी में लहरें चाहे किसी ओर चलें, धारा अपना मार्ग
नहीं छोड़ती।
गोरेलाल
का घर आ गया। द्वार बंद था। ब्रजनाथ को उन्हें पुकारने का साहस न हुआ, समझे खाना खा रहे
होंगे। दरवाजे के सामने से निकले, और धीरे-धीरे टहलते हुए एक मील तक चले गए। नौ
बजने की आवाज कान में आयी। गोरेलाल भोजन कर चुके होंगे, यह सोचकर लौट पड़े; लेकिन द्वार पर पहुंचे तो, अंधेरा था। वह
आशा-रूपी दीपक बुझ गया था। एक मिनट तक दुविधा में खड़े रहे। क्या करूँ। अभी बहुत
सबेरा है। इतनी जल्दी थोड़े ही सो गए होंगे? दबे पॉँव बरामदे पर
चढ़े। द्वार पर कान लगा कर सुना, चारों ओर ताक रहे थे कि कहीं कोई देख न ले।
कुछ बातचीत की भनक कान में पड़ी। ध्यान से सुना। स्त्री कह रही थी-रुपये तो सब उठ
रए, ब्रजनाथ को कहॉँ से
दोगे? गोरेलाल ने उत्तर
दिया-ऐसी कौन सी उतावली है, फिर दे देंगे। और दरख्वास्त दे दी है, कल मंजूर हो ही
जायगी। तीन महीने के बाद लौटेंगे तब देखा जायगा।
ब्रजनाथ
को ऐसा जान पड़ा मानों मुँह पर किसी न तमाचा मार दिया।
क्रोध
और नैराश्य से भरे हुए बरामदे में उतर आए। घर चले तो सीधे कदम न पड़ते थे, जैसे कोई दिन-भर का
थका-मॉंदा पथिक हो।
५
ब्रजनाथ रात-भर करवटें बदलते
रहे। कभी गोरेलाल की धुर्तता पर क्रोध आता था, कभी अपनी सरलता पर; मालूम नहीं; किस गरीब के रुपये
हैं। उस पर क्या बीती होगी ! लेकिन अब क्रोध या खेद रो क्या लाभ? सोचने लगे--रुपये
कहॉँ से आवेंगे? भाभा पहले ही इनकार कर चुकी है, वेतन में इतनी
गुंजाइश नहीं। दस-पॉँच रुपये की बात होती तो कतर ब्योंत करता। तो क्या करू? किसी से उधार लूँ।
मगर मुझे कौन देगा। आज तक किसी से मॉँगने का संयोग नहीं पड़ा, और अपना कोई ऐसा
मित्र है भी नहीं। जो लोग हैं, मुझी को सताया करते हैं, मुझे क्या देंगे।
हॉँ, यदि कुछ दिन कानून
छोड़कर अनुवाद करने में परिश्रम करूँ, तो रुपये मिल सकते हैं।
कम-से-कम एक मास का कठिन परिश्रम है। सस्ते अनुवादकों के मारे दर भी तो गिर गयी है
! हा निर्दयी ! तूने बड़ी दगा की। न जाने किस जन्म का बैर चुकाया है। कहीं का न
रखा !
दूसरे
दिन ब्रजनाथ को रुपयों की धुन सवार हुई। सबेरे कानून के लेक्चर में सम्मिलित होते, संध्या को कचहरी से
तजवीजों का पुलिंदा घर लाते और आधी रात बैठे अनुवाद किया करते। सिर उठाने की मुहलत
न मिलती ! कभी एक-दो भी बज जाते। जब मस्तिष्क बिलकुल शिथिल हो जाता तब विवश होकर
चारपाई पर पड़े रहते।
लेकिन
इतने परिश्रम का अभ्यास न होने के कारण कभी-कभी सिर में दर्द होने लगता। कभी
पाचन-क्रिया में विध्न पड़ जाता, कभी ज्वर चढ़ आता। तिस पर भी वह मशीन की तरह
काम में लगे रहते। भाभा कभी-कभी झुँझला कर कहती--अजी, लेट भी रहो; बड़े धर्मात्मा बने हो। तुम्हारे जैसे दस-पॉँच आदमी और होते, तो संसार का काम ही
बन्द हो जाता। ब्रजनाथ इस बाधाकारी व्यंग का उत्तर न देते, दिन निकलते ही फिर
वही चरखा ले बैठते।
यहॉँ
तक कि तीन सप्ताह बीत गये और पचीस रुपये हाथ आ गए। ब्रजनाथ सोचते थे--दो तीन दिन
में बेड़ा पार है; लेकिन इक्कीसवें दिन उन्हें प्रचंड ज्वर चढ़
आया और तीन दिन तक न उतरा। छुट्टी लेनी पड़ी, शय्यासेवी बन गए।
भादों का महीना था। भाभा ने समझा, पित्त का, प्रकोप है; लेकिन जब एक सप्ताह तक डाक्टर की औषधि सेवन करने पर भी ज्वर न
उतरा तब घबरायी। ब्रजनाथ प्राय: ज्वर में बक-झक भी करने लगते। भाभा सुनकर डर के
मारे कमरे में से भाग जाती। बच्चों को पकड़ कर दूसरे कमरे में बन्द कर देती। अब
उसे शंका होने लगती थी कि कहीं यह कष्ट उन्हीं रुपयों के कारण तो नहीं भोगना पड़
रहा है ! कौन जाने, रुपयेवाले ने कुछ कर धर दिया हो ! जरूर यही बात है, नहीं तो औषधि से
लाभ क्यों नहीं होता?
संकट
पड़ने पर हम धर्म-भीरु हो जाते हैं, औषधियों से निराश होकर देवताओं की शरण लेते
हैं। भाभा ने भी देवताओं की शरण ली। वह जन्माष्टमी, शिवरात्रि का कठिन
व्रत शुरू किया।
आठ
दिन पूरे हो गए। अंतिम दिन आया। प्रभात का समय था। भाभा ने ब्रजनाथ को दवा पिलाई
और दोनों बालकों को लेकर दुर्गा जी की पूजा करने के लिए चली। उसका हृदय आराध्य
देवी के प्रति श्रद्धा से परिपूर्ण था। मन्दिर के ऑंगन में पहुँची। उपासक आसनों पर
बैठे हुए दुर्गापाठ कर रहे थे। धूप और अगर की सुगंध उड़ रही थी। उसने मन्दिर में
प्रवेश किया। सामने दुर्गा की विशाल प्रतिमा शोभायमान थी। उसके मुखारविंद पर एक
विलक्षण दीप्त झलक रही थी। बड़े-बड़े उज्जल नेत्रों से प्रभा की किरणें छिटक रही
थीं। पवित्रता का एक समॉँ-सा छाया हुआ था। भाभा इस दीप्तवर्ण मूर्ति के सम्मुख
साधी ऑंखों से ताक न सकी। उसके अन्त:करण में एक निर्मल, विशुद्ध भाव-पूर्ण
भय का उदय हो आया। उसने ऑंखें बन्द कर लीं। घुटनों के बल बैठ गयी, और हाथ जोड़ कर
करुण स्वर से बोली—माता, मुझ पर दया करो।
उसे
ऐसा ज्ञात हुआ, मानों देवी मुस्कराई। उसे उन दिव्य नेत्रों से एक ज्योति-सी निकल
कर अपने हृदय में आती हुई मालूम हुई। उसके कानों में देवी के मुँह से निकले ये
शब्द सुनाई दिए—पराया धन लौटा दे, तेरा भला होगा।
भाभा
उठ बैठी। उसकी ऑंखों में निर्मल भक्ति का आभास झलक रहा था। मुखमंडल से पवित्र
प्रेम बरसा पड़ता था। देवी ने कदाचित् उसे अपनी प्रभा के रंग में डूबा दिया था।
इतने
में दूसरी एक स्त्री आई। उसके उज्जल केश बिखरे और मुरझाए हुए चेहरे के दोनों ओर
लटक रहे थे। शरीर पर केवल एक श्वेत साड़ी थी। हाथ में चूड़ियों के सिवा और कोई
आभूषण न था। शोक और नैराश्य की साक्षात् मूर्ति मालूम होती थी। उसने भी देवी के
सामने सिर झुकाया और दोनों हाथों से ऑंचल फैला कर बोली—देवी, जिसने मेरा धन लिया
हो, उसका सर्वनाश करो।
जैसे
सितार मिजराब की चोट खा कर थरथरा उठता है, उसी प्रकार भाभा का
हृदय अनिष्ट के भय से थरथरा उठा। ये शब्द तीव्र शर के समान उसके कलेजे में चुभ गए।
उसने देवी की ओर कातर नेत्रों से देखा। उनका ज्योतिर्मय स्वरूप भयंकर था, नेत्रों से भीषण
ज्वाला निकल रही थी। भाभा के अन्त:करण में सर्वथा आकाश से, मंदिर के सामने
वाले वृक्षों से; मंदिर के स्तंभों से, सिंहासन के ऊपर
जलते हुए दीपक से और देवी के विकराल मुँह से ये शब्द निकलकर गूँजने लगे--पराया धन
लौटा दे, नहीं तो तेरा सर्वनाश हो जायगा।
भाभा
खड़ी हो गई और उस वृद्धा से बोली-क्यों माता, तुम्हारा धन किसी
ने ले लिया है?
वृद्धा
ने इस प्रकार उसकी ओर देखा, मानों डूबते को तिनके का सहारा मिला। बोली—हॉं बेटी !
भाभा--कितने
दिन हुए ?
वृद्धा--कोई
डेढ़ महीना।
भामा--कितने
रुपये थे?
वृद्धा--पूरे
एक सौ बीस।
भामा--कैसे
खोए?
वृद्धा--क्या
जाने कहीं गिर गए। मेरे स्वामी पलटन में नौकर थे। आज कई बरस हुए, वह परलोक सिधारे।
अब मुझे सरकार से आठ रुपए साल पेन्शन मिलती है। अक्की दो साल की पेन्शन एक साथ ही
मिली थी। खजाने से रुपए लेकर आ रही थी। मालूम नहीं, कब और कहॉँ गिर
पड़े। आठ गिन्नियॉँ थीं।
भामा--अगर
वे तुम्हें मिल जायँ तो क्या दोगी।
वृद्धा--अधिक
नहीं, उसमें से पचास रुपए
दे दूँगी।
भामा
रुपये क्या होंगे, कोई उससे अच्छी चीज दो।
वृद्धा--बेटी
और क्या दूँ जब तक जीऊँगी, तुम्हारा यश गाऊँगी।
भामा--नहीं, इसकी मुझे आवश्यकता
नहीं !
वृद्धा--बेटी, इसके सिवा मेरे पास
क्या है?
भामा--मुझे
आर्शीवाद दो। मेरे पति बीमार हैं, वह अच्छे हो जायँ।
वृद्धा--क्या
उन्हीं को रुपये मिले हैं?
भामा--हॉँ, वह उसी दिन से
तुम्हें खोज रहे हैं।
वृद्धा
घुटनों के बल बैठ गई, और ऑंचल फैला कर कम्पित स्वर से बोली--देवी ! इनका कल्याण करो।
भामा ने फिर देवी की ओर सशंक
दृष्टि से देखा। उनके दिव्य रूप पर प्रेम का प्रकाश था। ऑंखों में दया की
आनंददायिनी झलक थी। उस समय भामा के अंत:करण में कहीं स्वर्गलोक से यह ध्वनि सुनाई
दी--जा तेरा कल्याण होगा।
संध्या
का समय है। भामा ब्रजनाथ के साथ इक्के पर बैठी तुलसी के घर, उसकी थाती लौटाने
जा रही है। ब्रजनाथ के बड़े परिश्रम की कमायी जो डाक्टर की भेंट हो चुकी है, लेकिन भामा ने एक
पड़ोसी के हाथ अपने कानों के झुमके बेचकर रुपये जुटाए हैं। जिस समय झुमके बनकर आये
थे, भामा बहुत प्रसन्न
हुई थी। आज उन्हें बेचकर वह उससे भी अधिक प्रसन्न है।
जब
ब्रजनाथ ने आठों गिन्नियॉँ उसे दिखाई थीं, उसके हृदय में एक
गुदगुदी-सी हुई थी; लेकिन यह हर्ष मुख पर आने का साहस न कर सका
था। आज उन गिन्नियों को हाथ से जाते समय उसका हार्दिक आनन्द ऑंखों में चमक रहा है, ओठों पर नाच रहा है, कपोलों को रंग रहा
है, और अंगों पर किलोल
कर रहा है; वह इंद्रियों का आनंद था, यह आत्मा का आनंद है; वह आनंद लज्जा के भीतर छिपा हुआ था, यह आनंद गर्व से
बाहर निकला पड़ता है।
तुलसी
का आशीर्वाद सफल हुआ। आज पूरे तीन सप्ताह के बाद ब्रजनाथ तकिए के सहारे बैठे थे।
वह बार-बार भामा को प्रेम-पूर्ण नेत्रों से देखते थे। वह आज उन्हें देवी मालूम
होती थी। अब तक उन्होंने उसके बाह्य सौंदर्य की शोभ देखी थी, आज वह उसका आत्मिक
सौंदर्य देख रहे हैं।
तुलसी
का घर एक गली में था। इक्का सड़क पर जाकर
ठहर गया। ब्रजनाथ इक्के पर से उतरे, और अपनी छड़ी टेकते हुए भामा के हाथों के
सहारे तुलसी के घर पहुँचे। तुलसी ने रुपए लिए और दोनों हाथ फैला कर आशीर्वाद
दिया--दुर्गा जी तुम्हारा कल्याण करें।
तुलसी
का वर्णहीन मुख वैसे ही खिल गया, जैसे वर्षा के पीछे वृक्षों की पत्तियॉँ खिल
जाती हैं। सिमटा हुआ अंग फैल गया, गालों की झुर्रियॉँ मिटती दीख पड़ीं। ऐसा
मालूम होता थ, मानो उसका कायाकलूप
हो गया।
वहॉँ
से आकर ब्रजनाथ अपवने द्वार पर बैठे हुए थे कि गोरेलाल आ कर बैठ गए। ब्रजनाथ ने
मुँह फेर लिया।
गोरेलाल
बोले--भाई साहब ! कैसी तबियत है?
ब्रजनाथ--बहुत
अच्छी तरह हूँ।
गोरेलाल--मुझे क्षमा
कीजिएगा। मुझे इसका बहुत खेद है कि आपके रुपये देने में इतना विलम्ब हुआ। पहली
तारीख ही को घर से एक आवश्यक पत्र आ गया, और मैं किसी तरह तीन महीने
की छुट्टी लेकर घर भागा। वहॉँ की विपत्ति-कथा कहूँ, तो समाप्त न हो; लेकिन आपकी बीमारी की शोक-समाचार सुन कर आज भागा चला आ रहा हूँ।
ये लीजिये, रुपये हाजिर हैं। इस विलम्ब के लिए अत्यंत लज्जित हूँ।
ब्रजनाथ
का क्रोध शांत हो गया। विनय में कितनी शक्ति है ! बोले-जी हॉँ, बीमार तो था; लेकिन अब अच्छा हो गया हूँ, आपको मेरे कारण
व्यर्थ कष्ट उठाना पड़ा। यदि इस समय आपको असुविधा हो, तो रुपये फिर दे
दीजिएगा। मैं अब उऋण हो गया हूँ। कोई जल्दी नहीं है।
गोरेलाल
विदा हो गये, तो ब्रजनाथ रुपये लिये हुए भीतर आये और भामा से बोले--ये लो अपने
रुपये; गोरेलाल दे गये।
भामा
ने कहा--ये मरे रुपये नहीं तुलसी के हैं; एक बार पराया धन
लेकर सीख गयी।
ब्रज०--लेकिन
तुलसी के पूरे रुपये तो दे दिये गये !
भामा--दे
दिये तो क्या हुआ? ये उसके आशीर्वाद की न्योछावर है।
ब्रज०-कान
के झुमके कहॉँ से आवेंगे?
भामा--झुमके
न रहेंगे, न सही; सदा के लिए ‘कान’ तो हो गये।


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