Jan Jan Ki Baat

प्रेमचंद - निर्मला

निर्मला

 

यों

तो बाबू उदयभानुलाल के परिवार में बीसों ही प्राणी थेकोई ममेरा भाई थाकोई फुफेराकोई भांजा थाकोई भतीजालेकिन यहां हमें उनसे कोई प्रयोजन नहींवह अच्छे वकील थेलक्ष्मी प्रसन्न थीं और कुटुम्ब के दरिद्र  प्राणियों को आश्रय देना उनका कत्तव्य ही था। हमारा सम्बन्ध तो केवल उनकी दोनों कन्याओं से हैजिनमें बड़ी का नाम निर्मला और छोटी का कृष्णा था। अभी कल दोनों साथ-साथ गुड़िया खेलती थीं। निर्मला का पन्द्रहवां साल थाकृष्णा का दसवांफिर भी उनके स्वभाव में कोई विशेष अन्तर न था। दोनों चंचलखिलाड़िन और सैर-तमाशे पर जान देती थीं। दोनों गुड़िया का धूमधाम से ब्याह करती थींसदा काम से जी चुराती थीं। मां पुकारती रहती थीपर दोनों कोठे पर छिपी बैठी रहती थीं कि न जाने किस काम के लिए बुलाती हैं। दोनों अपने भाइयों से लड़ती थींनौकरों को डांटती थीं और बाजे की आवाज सुनते ही द्वार पर आकर खड़ी हो जाती थीं पर आज एकाएक एक ऐसी बात हो गई हैजिसने बड़ी को बड़ी और छोटी को छोटी बना दिया है। कृष्णा यही हैपर निर्मला बड़ी गम्भीरएकान्त-प्रिय और लज्जाशील हो गई है। इधर महीनों से बाबू उदयभानुलाल निर्मला के विवाह की बातचीत कर रहे थे। आज उनकी मेहनत ठिकाने लगी है। बाबू भालचन्द्र सिन्हा के ज्येष्ठ पुत्र भुवन मोहन सिन्हा से बात पक्की हो गई है। वर के पिता ने कह दिया है कि आपकी खुशी ही दहेज देंया न देंमुझे इसकी परवाह नहीं; हांबारात में जो लोग जायें उनका आदर-सत्कार अच्छी तरह होना चहिएजिसमें मेरी और आपकी जग-हंसाई न हो। बाबू उदयभानुलाल थे तो वकीलपर संचय करना न जानते थे। दहेज उनके सामने कठिन समस्या थी। इसलिए जब वर के पिता ने स्वयं कह दिया कि मुझे दहेज की परवाह नहींतो मानों उन्हें आंखें मिल गई। डरते थे, न जाने किस-किस के सामने हाथ फैलाना पड़ेदो-तीन महाजनों को ठीक कर रखा था। उनका अनुमान था कि हाथ रोकने पर भी बीस हजार से कम खर्च न होंगे। यह आश्वासन पाकर वे खुशी के मारे फूले न समाये।

    इसकी सूचना ने अज्ञान बलिका को मुंह ढांप कर एक कोने में बिठा रखा है। उसके हृदय में एक विचित्र शंका समा गई हैरो-रोम में एक अज्ञात भय का संचार हो गया हैन जाने क्या होगा। उसके मन में वे उमंगें नहीं हैंजो युवतियों की आंखों में तिरछी चितवन बनकरओंठों पर मधुर हास्य बनकर और अंगों में आलस्य बनकर प्रकट होती है। नहीं वहां अभिलाषाएं नहीं हैं वहां केवल शंकाएंचिन्ताएं और भीरू कल्पनाएं हैं। यौवन का अभी तक पूर्ण प्रकाश नहीं हुआ है।

    कृष्णा कुछ-कुछ जानती हैकुछ-कुछ नहीं जानती। जानती हैबहन को अच्छे-अच्छे गहने मिलेंगे, द्वार पर बाजे बजेंगेमेहमान आयेंगेनाच होगा-यह जानकर प्रसन्न है और यह भी जानती है कि बहन सबके गले मिलकर रोयेगीयहां से रो-धोकर विदा हो जायेगीमैं अकेली रह जाऊंगी- यह जानकर दु:खी हैपर यह नहीं जानती कि यह इसलिए हो रहा हैमाताजी और पिताजी क्यों बहन को इस घर से निकालने को इतने उत्सुक हो रहे हैं। बहन ने तो किसी को कुछ नहीं कहाकिसी से लड़ाई नहीं कीक्या इसी तरह एक दिन मुझे भी ये लोग निकाल देंगे? मैं भी इसी तरह कोने में बैठकर रोऊंगी और किसी को मुझ पर दया न आयेगी? इसलिए वह भयभीत भी हैं।

    संध्या का समय थानिर्मला छत पर जानकर अकेली बैठी आकाश की और तृषित नेत्रों से ताक रही थी। ऐसा मन होता था  पंख होतेतो वह उड़ जाती और इन सारे झंझटों से छूट जाती। इस समय बहुधा दोनों बहनें कहीं सैर करने जाया करती थीं। बग्घी खाली न होतीतो बगीचे में ही टहला करतींइसलिए कृष्णा उसे खोजती फिरती थीजब कहीं न पायातो छत पर आई और उसे देखते ही हंसकर बोली-तुम यहां आकर छिपी बैठी हो और मैं तुम्हें ढूंढती फिरती हूं। चलोबग्घी तैयार करा आयी हूं।

    निर्मला- ने उदासीन भाव से कहा-तू जामैं न जाऊंगी।

    कृष्णा-नहीं मेरी अच्छी दीदीआज जरूर चलो। देखोकैसी ठण्डी-ठण्डी हवा चल रही है।

    निर्मला-मेरा मन नहीं चाहतातू चली जा।

    कृष्णा की आंखें डबडबा आई। कांपती हुई आवाज से बोली- आज तुम क्यों नहीं चलतीं मुझसे क्यों नहीं बोलतीं क्यों इधर-उधर छिपी-छिपी फिरती हो? मेरा जी अकेले बैठे-बैठे घबड़ाता है। तुम न चलोगीतो मैं भी न जाऊगी। यहीं तुम्हारे साथ बैठी रहूंगी।

    निर्मला-और जब मैं चली जाऊंगी तब क्या करेगी? तब किसके साथ खेलेगी और किसके साथ घूमने जायेगी, बता?

    कृष्णा-मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी। अकेले मुझसे यहां न रहा जायेगा।

निर्मला मुस्कराकर बोली-तुझे अम्मा न जाने देंगी।

कृष्णा-तो मैं भी तुम्हें न जाने दूंगी। तुम अम्मा से कह क्यों नहीं देती कि मैं न जाउंगी।

    निर्मला- कह तो रही हूंकोई सुनता है!

    कृष्णा-तो क्या यह तुम्हारा घर नहीं है?

    निर्मला-नहींमेरा घर होतातो कोई क्यों जबर्दस्ती निकाल देता?

    कृष्णा-इसी तरह किसी दिन मैं भी निकाल दी जाऊंगी?

    निर्मला-और नहीं क्या तू बैठी रहेगी! हम लड़कियां हैंहमारा घर कहीं नहीं होता।

    कृष्णा-चन्दर भी निकाल दिया जायेगा?

    निर्मला-चन्दर तो लड़का हैउसे कौन निकालेगा?

    कृष्णा-तो लड़कियां बहुत खराब होती होंगी?

    निर्मला-खराब न होतींतो घर से भगाई क्यों जाती?

    कृष्णा-चन्दर इतना बदमाश हैउसे कोई नहीं भगाता। हम-तुम तो कोई बदमाशी भी नहीं करतीं।

    एकाएक चन्दर धम-धम करता हुआ छत पर आ पहुंचा और निर्मला को देखकर बोला-अच्छा आप यहां बैठी हैं। ओहो! अब तो बाजे बजेंगेदीदी दुल्हन बनेंगीपालकी पर चढ़ेंगीओहो! ओहो!

    चन्दर का पूरा नाम चन्द्रभानु सिन्हा था। निर्मला से तीन साल छोटा और कृष्णा से दो साल बड़ा।

    निर्मला-चन्दरमुझे चिढ़ाओगे तो अभी जाकर अम्मा से कह दूंगी।

    चन्द्र-तो चिढ़ती क्यों हो तुम भी बाजे सुनना। ओ हो-हो! अब आप दुल्हन बनेंगी। क्यों किशनीतू बाजे सुनेगी न वैसे बाजे तूने कभी न सुने होंगे।

    कृष्णा-क्या बैण्ड से भी अच्छे होंगे?

    चन्द्र-हां-हांबैण्ड से भी अच्छेहजार गुने अच्छेलाख गुने अच्छे। तुम जानो क्या एक बैण्ड सुन लियातो समझने लगीं कि उससे अच्छे बाजे नहीं होते। बाजे बजानेवाले लाल-लाल वर्दियां और काली-काली टोपियां पहने होंगे। ऐसे खबूसूरत मालूम होंगे कि तुमसे क्या कहूं आतिशबाजियां भी होंगीहवाइयां आसमान में उड़ जायेंगी और वहां तारों में लगेंगी तो लालपीलेहरेनीले तारे टूट-टूटकर गिरेंगे। बड़ा बजा आयेगा।

    कृष्णा-और क्या-क्या होगा चन्दनबता दे मेरे भैया?

    चन्द्र-मेरे साथ घूमने चलतो रास्ते में सारी बातें बता दूं। ऐसे-ऐसे तमाशे होंगे कि देखकर तेरी आंखें खुल जायेंगी। हवा में उड़ती हुई परियां होंगीसचमुच की परियां।

कृष्णा-अच्छा चलोलेकिन न बताओगेतो मारूंगी।

    चन्द्रभानू और कृष्णा चले गएपर निर्मला अकेली बैठी रह गई। कृष्णा के चले जाने से इस समय उसे बड़ा क्षोभ हुआ। कृष्णाजिसे वह प्राणों से भी अधिक प्यार करती थीआज इतनी निठुर हो गई। अकेली छोड़कर चली गई। बात कोई न थीलेकिन दु:खी हृदय दुखती हुई आंख हैजिसमें हवा से भी पीड़ा होती है। निर्मला बड़ी देर तक बैठी रोती रही। भाई-बहनमाता-पितासभी इसी भांति मुझे भूल जायेंगेसबकी आंखें फिर जायेंगी, फिर शायद इन्हें देखने को भी तरस जाऊं।

    बाग में फूल खिले हुए थे। मीठी-मीठी सुगन्ध आ रही थी। चैत की शीतल मन्द समीर चल रही थी। आकाश में तारे छिटके हुए थे। निर्मला इन्हीं शोकमय विचारों में पड़ी-पड़ी सो गई और आंख लगते ही उसका मन स्वप्न-देश मेंविचरने लगा। क्या देखती है कि सामने एक नदी लहरें मार रही है और वह नदी के किनारे नाव की बाठ देख रही है। सन्ध्या का समय है। अंधेरा किसी भयंकर जन्तु की भांति बढ़ता चला आता है। वह घोर चिन्ता में पड़ी हुई है कि कैसे यह नदी पार होगीकैसे पहुंचूंगी! रो रही है कि कहीं रात न हो जायेनहीं तो मैं अकेली यहां कैसे रहूंगी। एकाएक उसे एक सुन्दर नौका घाट की ओर आती दिखाई देती है। वह खुशी से उछल पड़ती है और ज्योही नाव घाट पर आती हैवह उस पर चढ़ने के लिए बढ़ती हैलेकिन ज्योंही नाव के पटरे पर पैर रखना चाहती हैउसका मल्लाह बोल उठता है-तेरे लिए यहां जगह नहीं है! वह मल्लाह की खुशामद करती हैउसके पैरों पड़ती है, रोती हैलेकिन वह यह कहे जाता हैतेरे लिए यहां जगह नहीं है। एक क्षण में नाव खुल जाती है। वह चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगती है। नदी के निर्जन तट पर रात भर कैसे रहेगी, यह सोच वह नदी में कूद कर उस नाव को पकड़ना चाहती है कि इतने में कहीं से आवाज आती है-ठहरोठहरोनदी गहरी हैडूब जाओगी। वह नाव तुम्हारे लिए नहीं हैमैं आता हूं, मेरी नाव में बैठ जाओ। मैं उस पार पहुंचा दूंगा। वह भयभीत होकर इधर-उधर देखती है कि यह आवाज कहां से आई? थोड़ी देर के बाद एक छोटी-सी डोंगी आती दिखाई देती है। उसमें न पाल हैन पतवार और न मस्तूल। पेंदा फटा हुआ हैतख्ते टूटे हुएनाव में पानी भरा हुआ है और एक आदमी उसमें से पानी उलीच रहा है। वह उससे कहती हैयह तो टूटी हुई हैयह कैसे पार लगेगी? मल्लाह कहता है- तुम्हारे लिए यही भेजी गई हैआकर बैठ जाओ! वह एक क्षण सोचती है- इसमें बैठूं या न बैठूं? अन्त में वह निश्चय करती है- बैठ जाऊं। यहां अकेली पड़ी रहने से नाव में बैठ जाना फिर भी अच्छा है। किसी भयंकर जन्तु के पेट में जाने से तो यही अच्छा है कि नदी में डूब जाऊं। कौन जाने, नाव पार पहुंच ही जाये। यह सोचकर वह प्राणों की मुट्ठी में लिए हुए नाव पर बैठ जाती है। कुछ देर तक नाव डगमगाती हुई चलती है, लेकिन प्रतिक्षण उसमें पानी भरता जाता है। वह भी मल्लाह के साथ दोनों हाथों से पानी उलीचने लगती है। यहां तक कि उनके हाथ रह जाते हैंपर पानी बढ़ता ही चला जाता हैआखिर नाव चक्कर खाने लगती हैमालूम होती है- अब डूबीअब डूबी। तब वह किसी अदृश्य सहारे के लिए दोनों हाथ फैलाती हैनाव नीचे जाती है और उसके पैर उखड़ जाते हैं। वह जोर से चिल्लाई और चिल्लाते ही उसकी आंखें खुल गई। देखातो माता सामने खड़ी उसका कन्धा पकड़कर हिला रही थी।

 

दो

 

बा

बू उदयभानुलाल का मकान बाजार बना हुआ है। बरामदे में सुनार के हथौड़े और कमरे में दर्जी की सुईयां चल रही हैं। सामने नीम के नीचे बढ़ई चारपाइयां बना रहा है। खपरैल में हलवाई के लिए भट्ठा खोदा गया है। मेहमानों के लिए अलग एक मकान ठीक किया गया है। यह प्रबन्ध किया जा रहा है कि हरेक मेहमान के लिए एक-एक चारपाईएक-एक कुर्सी और एक-एक मेज हो। हर तीन मेहमानों के लिए एक-एक कहार रखने की तजवीज हो रही है। अभी बारात आने में एक महीने की देर हैलेकिन तैयारियां अभी से हो रही हैं। बारातियों का ऐसा सत्कार किया जाये कि किसी को जबान हिलाने का मौका न मिले। वे लोग भी याद करें कि किसी के यहां बारात में गये थे। पूरा मकान बर्तनों से भरा हुआ है। चाय के सेट हैंनाश्ते की तश्तरियांथाललोटे, गिलास। जो लोग नित्य खाट पर पड़े हुक्का पीते रहते थेबड़ी तत्परता से काम में लगे हुए हैं। अपनी उपयोगिता सिद्ध करने का ऐसा अच्छा अवसर उन्हें फिर बहुत दिनों के बाद मिलेगा। जहां एक आदमी को जाना होता हैपांच दौड़ते हैं। काम कम होता हैहुल्लड़ अधिक। जरा-जरा सी बात पर घण्टों तर्क-वितर्क होता है और अन्त में वकील साहब को आकर निर्णय करना पड़ता है। एक कहता हैयह घी खराब हैदूसरा कहता हैइससे अच्छा बाजार में मिल जाये तो टांग की राह से निकल जाऊं। तीसरा कहता हैइसमें तो हीक आती है। चौथा कहता हैतुम्हारी नाक ही सड़ गई हैतुम क्या जानो घी किसे कहते हैं। जब से यहां आये होघी मिलने लगा हैनहीं तो घी के दर्शन भी न होते थे! इस पर तकरार बढ़ जाती है और वकील साहब को झगड़ा चुकाना पड़ता है।

    रात के नौ बजे थे। उदयभानुलाल अन्दर बैठे हुए खर्च का तखमीना लगा रहे थे। वह प्राय: रोज ही तखमीना लगते थे पर रोज ही उसमें कुछ-न-कुछ परिवर्तन और परिवर्धन करना पड़ता था। सामने कल्याणी भौंहे सिकोड़े हुए खड़ी थी। बाबू साहब ने बड़ी देर के बाद सिर उठाया और बोले-दस हजार से कम नहीं होताबल्कि शायद और बढ़ जाये।

    कल्याणी-दस दिन में पांच से दस हजार हुए। एक महीने में तो शायद एक लाख नौबत आ जाये।

    उदयभानु-क्या करूंजग हंसाई भी तो अच्छी नहीं लगती। कोई शिकायत हुई तो लोग कहेंगेनाम बड़े दर्शन थोड़े। फिर जब वह मुझसे दहेज एक पाई नहीं लेते तो मेरा भी कर्तव्य है कि मेहमानों के आदर-सत्कार में कोई बात उठा न रखूं।

    कल्याणी- जब से ब्रह्मा ने सृष्टि रचीतब से आज तक कभी बारातियों को कोई प्रसन्न नहीं रख सकता। उन्हें दोष निकालने और निन्दा करने का कोई-न-कोई अवसर मिल ही जाता है। जिसे अपने घर सूखी रोटियां भी मयस्सर नहीं वह भी बारात में जाकर तानाशाह बन बैठता है। तेल खुशबूदार नहींसाबुन टके सेर का जाने कहां से बटोर लायेकहार बात नहीं सुनते, लालटेनें धुआं देती हैंकुर्सियों में खटमल हैचारपाइयां ढीली हैंजनवासे की जगह हवादार नहीं। ऐसी-ऐसी हजारों शिकायतें होती रहती हैं। उन्हें आप कहां तक रोकियेगा? अगर यह मौका न मिला, तो और कोई ऐब निकाल लिये जायेंगे। भईयह तेल तो रंडियों के लगाने लायक हैहमें तो सादा तेल चाहिए। जनाब ने यह साबुन नहीं भेजा हैअपनी अमीरी की शान दिखाई हैमानो हमने साबुन देखा ही नहीं। ये कहार नहीं यमदूत हैंजब देखिये सिर पर सवार! लालटेनें ऐसी भेजी हैं कि आंखें चमकने लगती हैंअगर दस-पांच दिन इस रोशनी में बैठना पड़े तो आंखें फूट जाएं। जनवासा क्या हैअभागे का भाग्य हैजिस पर चारों तरफ से झोंके आते रहते हैं। मैं तो फिर यही कहूंगी कि बारतियों के नखरों का विचार ही छोड़ दो।

    उदयभानु- तो आखिर तुम मुझे क्या करने को कहती हो?

    कल्याणी-कह तो रही हूंपक्का इरादा कर लो कि मैं पांच हजार से अधिक न खर्च करूंगा। घर में तो टका है नहींकर्ज ही का भरोसा ठहरातो इतना कर्ज क्यों लें कि जिन्दगी में अदा न हो। आखिर मेरे और बच्चे भी तो हैंउनके लिए भी तो कुछ चाहिए।

    उदयभानु- तो आज मैं मरा जाता हूं?

    कल्याणी- जीने-मरने का हाल कोई नहीं जानता।

    कल्याणी- इसमें बिगड़ने की तो कोई बात नहीं। मरना एक दिन सभी को है। कोई यहां अमर होकर थोड़े ही आया है। आंखें बन्द कर लेने से तो होने-वाली बात न टलेगी। रोज आंखों देखती हूंबाप का देहान्त हो जाता हैउसके बच्चे गली-गली ठोकरें खाते फिरते हैं। आदमी ऐसा काम ही क्यों करे?

          उदयभानु न जलकर कहा- जो अब समझ लूं कि मेरे मरने के दिन निकट आ गयेयही तुम्हारी भविष्यवाणी है! सुहाग से स्त्रियों का जी ऊबते नहीं सुना थाआज यह नई बात मालूम हुई। रंडापे में भी कोई सुख होगा ही!

    कल्याणी-तुमसे दुनिया की कोई भी बात कही जाती हैतो जहर उगलने लगते हो। इसलिए न कि जानते होइसे कहीं टिकना नहीं हैमेरी ही रोटियों पर पड़ी हुई है या और कुछ! जहां कोई बात कहीबस सिर हो गयेमानों मैं घर की लौंडी हूंमेरा केवल रोटी और कपड़े का नाता है। जितना ही मैं दबती हूंतुम और भी दबाते हो। मुफ्तखोर माल उड़ायेंकोई मुंह न खोलेशराब-कबाब में रूपये लुटेंकोई जबान न हिलाये। वे सारे कांटे मेरे बच्चों ही के लिए तो बोये जा रहे है।

    उदयभानु लाल- तो मैं क्या तुम्हारा गुलाम हूं?

    कल्याणी- तो क्या मैं तुम्हारी लौंडी हूं?

    उदयभानु लाल- ऐसे मर्द और होंगेजो औरतों के इशारों पर नाचते हैं।

    कल्याणी- तो ऐसी स्त्रियों भी होंगीजो मर्दों की जूतियां सहा करती हैं।

    उदयभानु लाल- मैं कमाकर लाता हूंजैसे चाहूं खर्च कर सकता हूं। किसी को बोलने का अधिकार नहीं।

    कल्याणी- तो आप अपना घर संभलिये! ऐसे घर को मेरा दूर ही से सलाम हैजहां मेरी कोई पूछ नहीं घर में तुम्हारा जितना अधिकार हैउतना ही मेरा भी। इससे जौ भर भी कम नहीं। अगर तुम अपने मन के राजा होतो मैं भी अपने मन को रानी हूं। तुम्हारा घर तुम्हें मुबारक रहेमेरे लिए पेट की रोटियों की कमी नहीं है। तुम्हारे बच्चे हैंमारो या जिलाओ। न आंखों से देखूंगीन पीड़ा होगी। आंखें फूटींपीर गई!

    उदयभानु- क्या तुम समझती हो कि तुम न संभालेगी तो मेरा घर ही न संभलेगा? मैं अकेले ऐसे-ऐसे दस घर संभाल सकता हूं।

    कल्याणी-कौन? अगर आज के महीने दिन मिट्टी में न मिल जायेतो कहना कोई कहती थी!

    यह कहते-कहते कल्याणी का चेहरा तमतमा उठावह झमककर उठी और कमरे के द्वार की ओर चली। वकील साहब मुकदमें में तो खूब मीन-मेख निकालते थेलेकिन स्त्रियों के स्वभाव का उन्हें कुछ यों ही-सा ज्ञान था। यही एक ऐसी विद्या हैजिसमें आदमी बूढ़ा होने पर भी कोरा रह जाता है। अगर वे अब भी नरम पड़ जाते और कल्याणी का हाथ पकड़कर बिठा लेतेतो शायद वह रूक जातीलेकिन आपसे यह तो हो न सकाउल्टे चलते-चलते एक और चरका दिया।

बोल-मैके का घमण्ड होगा?

          कल्याणी ने द्वारा पर रूक कर पति की ओर लाल-लाल नेत्रों से देखा और बिफरकर बोल- मैके वाले मेरे तकदीर के साथी नहीं है और न मैं इतनी नीच हूं कि उनकी रोटियों पर जा पडूं।

    उदयभानु-तब कहां जा रही हो?

    कल्याणी-तुम यह पूछने वाले कौन होते हो? ईश्वर की सृष्टि में असंख्य प्राप्रियों के लिए जगह हैक्या मेरे ही लिए जगह नहीं है?

    यह कहकर कल्याणी कमरे के बाहर निकल गई। आंगन में आकर उसने एक बार आकाश की ओर देखामानो तारागण को साक्षी दे रही है कि मैं इस घर में कितनी निर्दयता से निकाली जा रही हूं। रात के ग्यारह बज गये थे। घर में सन्नाटा छा गया थादोनों बेटों की चारपाई उसी के कमरे में रहती थी। वह अपने कमरे में आईदेखा चन्द्रभानु सोया हैसबसे छोटा सूर्यभानु चारपाई पर उठ बैठा है। माता को देखते ही वह बोला-तुम तहां दई तीं अम्मां?

    कल्याणी दूर ही से खड़े-खड़े बोली- कहीं तो नहीं बेटातुम्हारे बाबूजी के पास गई थी।

    सूर्य-तुम तली दईमुधे अतेले दर लदता था। तुम क्यों तली दई तीं, बताओ?

    यह कहकर बच्चे ने गोद में चढ़ने के लिए दोनों हाथ फैला दिये। कल्याणी अब अपने को न रोक सकी। मातृ-स्नेह के सुधा-प्रवाह से उसका संतप्त हृदय परिप्लावित हो गया। हृदय के कोमल पौधेजो क्रोध के ताप से मुरझा गये थे,  फिर हरे हो गये। आंखें सजल हो गई। उसने बच्चे को गोद में उठा लिया और छाती से लगाकर बोली-तुमने पुकार क्यों न लिया, बेटा?

    सूर्य-पुतालता तो तातुम थुनती न तींबताओ अब तो कबी न दाओगी।

कल्याणी-नहीं भैयाअब नहीं जाऊंगी।

    यह कहकर कल्याणी सूर्यभानु को लेकर चारपाई पर लेटी। मां के हृदय से लिपटते ही बालक नि:शंक होकर सो गयाकल्याणी के मन में संकल्प-विकल्प होने लगेपति की बातें याद आतीं तो मन होता-घर को तिलांजलि देकर चली जाऊंलेकिन बच्चों का मुंह देखतीतो वासल्य से चित्त गद्रगद्र हो जाता। बच्चों को किस पर छोड़कर जाऊं? मेरे इन लालों को कौन पालेगाये किसके होकर रहेंगे? कौन प्रात:काल इन्हें दूध और हलवा खिलायेगाकौन इनकी नींद सोयेगाइनकी नींद जागेगा? बेचारे कौड़ी के तीन हो जायेंगे। नहीं प्यारोमैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगी। तुम्हारे लिए सब कुछ सह लूंगी। निरादर-अपमानजली-कटीखोटी-खरीघुड़की-झिड़की सब तुम्हारे लिए सहूंगी।

कल्याणी तो बच्चे को लेकर लेटीपर बाबू साहब को नींद न आई उन्हें चोट करनेवाली बातें बड़ी मुश्किल से भूलती थी। उफयह मिजाज! मानों मैं ही इनकी स्त्री हूं। बात मुंह से निकालनी मुश्किल है। अब मैं इनका गुलाम होकर रहूं। घर में अकेली यह रहें और बाकी जितने अपने बेगाने हैंसब निकाल दिये जायें। जला करती हैं। मनाती हैं कि यह किसी तरह मरेंतो मैं अकेली आराम करूं। दिल की बात मुंह से निकल ही आती हैचाहे कोई कितना ही छिपाये। कई दिन से देख रहा हूं ऐसी ही जली-कटी सुनाया करती हैं। मैके का घमण्ड होगालेकिन वहां कोई भी न पूछेगाअभी सब आवभगत करते हैं। जब जाकर सिर पड़ जायेंगी तो आटे-दाल का भाव मालूम हो जायेगा। रोती हुई जायेंगी। वाह रे घमण्ड! सोचती हैं-मैं ही यह गृहस्थी चलाती हूं। अभी चार दिन को कहीं चला जाऊंतो मालूम हो जायेगासारी शेखी किरकिरी हो जायेगा। एक बार इनका घमण्ड तोड़ ही दूं। जरा वैधव्य का मजा भी चखा दूं। न जाने इनकी हिम्मत कैसे पड़ती है कि मुझे यों कोसने लगत हैं। मालूम होता हैप्रेम इन्हें छू नहीं गया या समझती हैंयह घर से इतना चिमटा हुआ है कि इसे चाहे जितना कोसूंटलने का नाम न लेगा। यही बात हैपर यहां संसार से चिमटनेवाले जीव नहीं हैं! जहन्नुम में जाये यह घरजहां ऐसे प्राणियों से पाला पड़े। घर है या नरक? आदमी बाहर से थका-मांदा आता हैतो उसे घर में आराम मिलता है। यहां आराम के बदले कोसने सुनने पड़ते हैं। मेरी मृत्यु के लिए व्रत रखे जाते हैं। यह है पचीस वर्ष के दाम्पत्य जीवन का अन्त! बसचल ही दूं। जब देख लूंगा इनका सारा घमण्ड धूल में मिल गया और मिजाज ठण्डा हो गयातो लौट आऊंगा। चार-पांच दिन काफी होंगे। लोतुम भी याद करोगी किसी से पाला पड़ा था।

    यही सोचते हुए बाबू साहब उठेरेशमी चादर गले में डालीकुछ रूपये लियेअपना कार्ड निकालकर दूसरे कुर्ते की जेब में रखाछड़ी उठाई और चुपके से बाहर निकले। सब नौकर नींद में मस्त थे। कुत्ता आहट पाकर चौंक पड़ा और उनके साथ हो लिया।

    पर यह कौन जानता था कि यह सारी लीला विधि के हाथों रची जा रही है। जीवन-रंगशाला का वह निर्दय सूत्रधार किसी अगम गुप्त स्थान पर बैठा हुआ अपनी जटिल क्रूर क्रीड़ा दिखा रहा है। यह कौन जानता था कि नकल असल होने जा रही हैअभिनय सत्य का रूप ग्रहण करने वाला है।

    निशा ने इन्दू को परास्त करके अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। उसकी पैशाचिक सेना ने प्रकृति पर आतंक जमा रखा था। सद्रवृत्तियां मुंह छिपाये पड़ी थीं और कुवृत्तियां विजय-गर्व से इठलाती फिरती थीं। वन में वन्यजन्तु शिकार की खोज में विचार रहे थे और नगरों में नर-पिशाच गलियों में मंडराते फिरते थे।

बाबू उदयभानुलाल लपके हुए गंगा की ओर चले जा रहे थे। उन्होंने अपना कुर्त्ता घाट के किनारे रखकर पांच दिन के लिए मिर्जापुर चले जाने का निश्चय किया था। उनके कपड़े देखकर लोगों को डूब जाने का विश्वास हो जायेगाकार्ड कुर्ते की जेब में था। पता लगाने में कोई दिक्कत न हो सकती थी। दम-के-दम में सारे शहर में खबर मशहूर हो जायेगी। आठ बजते-बजते तो मेरे द्वार पर सारा शहर जमा हो जायेगातब देखूंदेवी जी क्या करती हैं?

    यही सोचते हुए बाबू साहब गलियों में चले जा रहे थेसहसा उन्हें अपने पीछे किसी दूसरे आदमी के आने की आहट मिलीसमझे कोई होगा। आगे बढ़ेलेकिन जिस गली में वह मुड़ते उसी तरफ यह आदमी भी मुड़ता था। तब बाबू साहब को आशंका हुई कि यह आदमी मेरा पीछा कर रहा है। ऐसा आभास हुआ कि इसकी नीयत साफ नहीं है। उन्होंने तुरन्त जेबी लालटेन निकाली और उसके प्रकाश में उस आदमी को देखा। एक बरिष्ष्ठ मनुष्य कन्धे पर लाठी रखे चला आता था। बाबू साहब उसे देखते ही चौंक पड़े। यह शहर का छटा हुआ बदमाश था। तीन साल पहले उस पर डाके का अभियोग चला था। उदयभानु ने उस मुकदमे में सरकार की ओर से पैरवी की थी और इस बदमाश को तीन साल की सजा दिलाई थी। सभी से वह इनके खून का प्यासा हो रहा था। कल ही वह छूटकर आया था। आज दैवात् साहब अकेले रात को दिखाई दियेतो उसने सोचा यह इनसे दाव चुकाने का अच्छा मौका है। ऐसा मौका शायद ही फिर कभी मिले। तुरन्त पीछे हो लिया और वार करने की घात ही में था कि बाबू साहब ने जेबी लालटेन जलाई। बदमाश जरा ठिठककर बोला-क्यों बाबूजी पहचानते हो? मैं हूं मतई।

    बाबू साहब ने डपटकर कहा- तुम मेरे पिछे-पिछे क्यों आरहे हो? 

    मतई- क्योंकिसी को रास्ता चलने की मनाही है? यह गली तुम्हारे बाप की है?

    बाबू साहब जवानी में कुश्ती लड़े थेअब भी हृष्ट-पुष्ट आदमी थे। दिल के भी कच्चे न थे। छड़ी संभालकर बोले-अभी शायद मन नहीं भरा। अबकी सात साल को जाओगे।

    मतई-मैं सात साल को जाऊंगा या चौदह साल कोपर तुम्हें जिद्दा न छोडूंगा। हांअगर तुम मेरे पैरों पर गिरकर कसम खाओ कि अब किसी को सजा न कराऊंगातो छोड़ दूं। बोलो मंजूर है?

    उदयभानु-तेरी शामत तो नहीं आई?

    मतई-शामत मेरी नहीं आईतुम्हारी आई है। बोलो खाते हो कसम-एक!

    उदयभानु-तुम हटते हो कि मैं पुलिसमैन को बुलाऊं।

    मतई-दो!

    उदयभानु-(गरजकर) हट जा बादशाहसामने से!

मतई-तीन!

          मुंह से तीन शब्द निकालते ही बाबू साहब के सिर पर लाठी का ऐसा तुला हाथ पड़ा कि वह अचेत होकर जमीन पर गिर पड़े। मुंह से केवल इतना ही निकला-हाय! मार डाला!

          मतई ने समीप आकर देखातो सिर फट गया था और खून की घार निकल रही थी। नाड़ी का कहीं पता न था। समझ गया कि काम तमाम हो गया। उसने कलाई से सोने की घड़ी खोल लीकुर्ते से सोने के बटन निकाल लियेउंगली से अंगूठी उतारी और अपनी राह चला गयामानो कुछ हुआ ही नहीं। हांइतनी दया की कि लाश रास्ते से घसीटकर किनारे डाल दी। हायबेचारे क्या सोचकर चले थेक्या हो गया! जीवनतुमसे ज्यादा असार भी दुनिया में कोई वस्तु है? क्या वह उस दीपक की भांति ही क्षणभंगुर नहीं हैजो हवा के एक झोंके से बुझ जाता है! पानी के एक बुलबुले को देखते होलेकिन उसे टूटते भी कुछ देर लगती हैजीवन में उतना सार भी नहीं। सांस का भरोसा ही क्या और इसी नश्वरता पर हम अभिलाषाओं के कितने विशाल भवन बनाते हैं! नहीं जानतेनीचे जानेवाली सांस ऊपर आयेगी या नहींपर सोचते इतनी दूर की हैंमानो हम अमर हैं।

 

तीन

 

वि

वाह का विलाप और अनाथों का रोना सुनाकर हम पाठकों का दिल न दुखायेंगे। जिसके ऊपर पड़ती हैवह रोता हैविलाप करता है, पछाड़ें खाता है। यह कोई नयी बात नहीं। हांअगर आप चाहें तो कल्याणी की उस घोर मानसिक यातना का अनुमान कर सकते हैंजो उसे इस विचार से हो रही थी कि मैं ही अपने प्राणाधार की घातिका हूं। वे वाक्य जो क्रोध के आवेश में उसके असंयत मुख से निकले थेअब उसके हृदय को वाणों की भांति छेद रहे थे। अगर पति ने उसकी गोद में कराह-कराहकर प्राण-त्याग दिए होतेतो उसे संतोष होता कि मैंने उनके प्रति अपने कर्तव्य का पालन किया। शोकाकुल हृदय को इससे ज्यादा सान्त्वना और किसी बात से नहीं होती। उसे इस विचार से कितना संतोष होता कि मेरे स्वामी मुझसे प्रसन्न गयेअन्तिम समय तक उनके हृदय में मेरा प्रेम बना रहा। कल्याणी को यह सन्तोष न था। वह सोचती थी-हा! मेरी पचीस बरस की तपस्या निष्फल हो गई। मैं अन्त समय अपने प्राणपति के प्रेम के वंचित हो गयी। अगर मैंने उन्हें ऐसे कठोर शब्द न कहे होतेतो वह कदापि रात को घर से न जाते।न जाने उनके मन में क्या-क्या विचार आये हों? उनके मनोभावों की कल्पना करके और अपने अपराध को बढ़ा-बढ़ाकर वह आठों पहर कुढ़ती रहती थी। जिन बच्चों पर वह प्राण देती थीअब उनकी सूरत से चिढ़ती। इन्हीं के कारण मुझे अपने स्वामी से रार मोल लेनी पड़ी। यही मेरे शत्रु हैं। जहां आठों पहर कचहरी-सी लगी रहती थीवहां अब खाक उड़ती है। वह मेला ही उठ गया। जब खिलानेवाला ही न रहातो खानेवाले कैसे पड़े रहते। धीरे-धीरे एक महीने के अन्दर सभी भांजे-भतीजे बिदा हो गये। जिनका दावा था कि हम पानी की जगह खून बहानेवालों में हैंवे ऐसा सरपट भागे कि पीछे फिरकर भी न देखा। दुनिया ही दूसरी हो गयी। जिन बच्चों को देखकर प्यार करने को जी चाहता था उनके चेहरे पर अब मक्खियां भिनभिनाती थीं। न जाने वह कांति कहां चली गई?

    शोक का आवेग कम हुआतो निर्मला के विवाह की समस्या उपस्थित हुई। कुछ लोगों की सलाह हुई कि विवाह इस साल रोक दिया जायेलेकिन कल्याणी ने कहा- इतनी तैयरियों के बाद विवाह को रोक देने से सब किया-धरा मिट्टी में मिल जायेगा और दूसरे साल फिर यही तैयारियां करनी पड़ेंगीजिसकी कोई आशा नहीं। विवाह कर ही देना अच्छा है। कुछ लेना-देना तो है ही नहीं। बारातियों के सेवा-सत्कार का काफी सामान हो चुका हैविलम्ब करने में हानि-ही-हानि है। अतएव महाशय भालचन्द्र को शक-सूचना के साथ यह सन्देश भी भेज दिया गया। कल्याणी ने अपने पत्र में लिखा-इस अनाथिनी पर दया कीजिए और डूबती हुई नाव को पार लगाइये। स्वामीजी के मन में बड़ी-बड़ी कामनाएं थींकिंतु ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। अब मेरी लाज आपके हाथ है। कन्या आपकी हो चुकी। मैं लोगों के सेवा-सत्कार करने को अपना सौभाग्य समझती हूंलेकिन यदि इसमें कुछ कमी होकुछ त्रुटि पड़ेतो मेरी दशा का विचार करके क्षमा कीजियेगा। मुझे विश्वास है कि आप इस अनाथिनी की निन्दा न होने देंगेआदि।

    कल्याणी ने यह पत्र डाक से न भेजाबल्कि पुरोहित से कहा-आपको कष्ट तो होगापर आप स्वयं जाकर यह पत्र दीजिए और मेरी ओर से बहुत विनय के साथ कहियेगा कि जितने कम आदमी आयें, उतना ही अच्छा। यहां कोई प्रबन्ध करनेवाला नहीं है।

    पुरोहित मोटेराम यह सन्देश लेकर तीसरे दिन लखनऊ जा पहुंचे।

    संध्या का समय था। बाबू भालचन्द्र दीवानखाने के सामने आरामकुर्सी पर नंग-धड़ंग लेटे हुए हुक्का पी रहे थे। बहुत ही स्थूलऊंचे कद के आदमी थे। ऐसा मालूम होता था कि काला देव है या कोई हब्शी अफ्रीका से पकड़कर आया है। सिर से पैर तक एक ही रंग था-काला। चेहरा इतना स्याह था कि मालूम न होता था कि माथे का अंत कहां है सिर का आरम्भ कहां। बसकोयले की एक सजीव मूर्ति थी। आपको गर्मी बहुत सताती थी। दो आदमी खड़े पंखा झल रहे थेउस पर भी पसीने का तार बंधा हुआ था। आप आबकारी के विभाग में एक ऊंचे ओहदे पर थे। पांच सौ रूपये वेतन मिलता था। ठेकेदारों से खूब रिश्वत लेते थे। ठेकेदार शराब के नाम पानी बेचेंचौबीसों घंटे दुकान खुली रखेंआपको केवल खुश रखना काफी था। सारा कानून आपकी खुशी थी। इतनी भयंकर मूर्ति थी कि चांदनी रात में लोग उन्हें देख कर सहसा चौंक पड़ते थे-बालक और स्त्रियां ही नहींपुरूष तक सहम जाते थे। चांदनी रात इसलिए कहा गया कि अंधेरी रात में तो उन्हें कोई देख ही न सकता था-श्यामलता अन्धकार में विलीन हो जाती थी। केवल आंखों का रंग लाल था। जैसे पक्का मुसलमान पांच बार नमाज पढ़ता हैवैसे ही आप भी पांच बार शराब पीते थेमुफ्त की शराब तो काजी को हलाल हैफिर आप तो शराब के अफसर ही थेजितनी चाहें पियेंकोई हाथ पकड़ने वाला न था। जब प्यास लगती शराब पी लेते । जैसे कुछ रंगों में परस्पर सहानुभूति हैउसी तरह कुछ रंगों में परस्पर विरोध है। लालिमा के संयोग से कालिमा और भी भयंकर हो जाती है।

    बाबू साहब ने पंडितजी को देखते ही कुर्सी से उठकर कहा-अख्खाह! आप हैं? आइए-आइए। धन्य भाग! अरे कोई है। कहां चले गये सब-के-सबझगडूगुरदीनछकौड़ीभवानीरामगुलाम कोई है? क्या सब-के-सब मर गये! चलो रामगुलामभवानीछकौड़ी, गुरदीनझगड़ू। कोई नहीं बोलतासब मर गये! दर्जन-भर आदमी हैंपर मौके पर एक की भी सूरत नहीं नजर आतीन जाने सब कहां गायब हो जाते हैं। आपके वास्ते कुर्सी लाओ।

    बाबू साहब ने ये पांचों नाम कई बार दुहरायेलेकिन यह न हुआ कि पंखा झलनेवाले दोनों आदमियों में से किसी को कुर्सी लाने को भेज देते। तीन-चार मिनट के बाद एक काना आदमी खांसता हुआ आकर बोला-सरकारईतना की नौकरी हमार कीन न होई ! कहां तक उधार-बाढ़ी लै-लै खाई मांगत-मांगत थेथर होय गयेना।

    भाल- बको मतजाकर कुर्सी लाओ। जब कोई काम करने की कहा गयातो रोने लगता है। कहिए पडितजी, वहां सब कुशल है?

    मोटेराम-क्या कुशल कहूं बाबूजीअब कुशल कहां? सारा घर मिट्टी में मिल गया।

    इतने में कहार ने एक टूटा हुआ चीड़ का सन्दूक लाकर रख दिया और बोला-कर्सी-मेज हमारे उठाये नाहीं उठत है।

    पंडितजी शर्माते हुए डरते-डरते उस पर बैठे कि कहीं टूट न जाये और कल्याणी का पत्र बाबू साहब के हाथ में रख दिया।

    भाल-अब और कैसे मिट्टी में मिलेगा? इससे बड़ी और कौन विपत्ति पड़ेगीबाबू उदयभानु लाल से मेरी पुरानी दोस्ती थी। आदमी नहीं, हीरा था! क्या दिल थाक्या हिम्मत थी, (आंखें पोंछकर) मेरा तो जैसे दाहिना हाथ ही कट गया। विश्वास मानिएजबसे यह खबर सुनी हैआंखों में अंधेरा-सा छा गया है। खाने बैठता हूंतो कौर मुंह में नहीं जाता। उनकी सूरत आंखों के सामने खड़ी रहती है। मुंह जूठा करके उठ जाता हूं। किसी काम में दिल नहीं लगता। भाई के मरने का रंज भी इससे कम ही होता है। आदमी नहींहीरा था!

    मोटे- सरकारनगर में अब ऐसा कोई रईस नहीं रहा।

    भाल- मैं खूब जानता हूंपंडितजीआप मुझसे क्या कहते हैं। ऐसा आदमी लाख-दो-लाख में एक होता है। जितना मैं उनको जानता थाउतना दूसरा नहीं जान सकता। दो-ही-तीन बार की मुलाकात में उनका भक्त हो गया और मरने दम तक रहूंगा। आप समधिन साहब से कह दीजिएगामुझे दिली रंज है।

    मोटे-आपसे ऐसी ही आशा थी! आज-जैसे सज्जनों के दर्शन दुर्लभ हैं। नहीं तो आज कौन बिना दहेज के पुत्र का विवाह करता है।

    भाल-महाराजदेहज की बातचीत ऐसे सत्यवादी पुरूषों से नहीं की जाती। उनसे सम्बन्ध हो जाना ही लाख रूपये के बराबर है। मैं इसी को अपना अहोभाग्य समझता हूं। हा! कितनी उदार आमत्मा थी। रूपये को तो उन्होंने कुछ समझा ही नहींतिनके के बराबर भी परवाह नहीं की। बुरा रिवाज हैबेहद बुरा! मेरा बस चलेतो दहेज लेनेवालों और दहेज देनेवालों दोनों ही को गोली मार दूंहां साहबसाफ गोली मार दूंफिर चाहे फांसी ही क्यों न हो जाय! पूछोआप लड़के का विवाह करते हैं कि उसे बेचते हैं? अगर आपको लड़के के शादी में दिल खोलकर खर्च करने का अरमान हैतो शौक के खर्च कीजिएलेकिन जो कुछ कीजिएअपने बल पर। यह क्या कि कन्या के पिता का गला रेतिए। नीचता हैघोर नीचता! मेरा बस चले, तो इन पाजियों को गोली मार दूं।

    मोटे- धन्य हो सरकार! भगवान् ने आपको बड़ी बुद्धि दी है। यह धर्म का प्रताप है। मालकिन की इच्छा है कि विवाह का मुहूर्त वही रहे और तो उन्होंने सारी बातें पत्र में लिख दी हैं। बसअब आप ही उबारें तो हम उबर सकते हैं। इस तरह तो बारात में जितने सज्जन आयेंगेउनकी सेवा-सत्कार हम करेंगे हीलेकिन परिस्थिति अब बहुत बदल गयी है सरकार, कोई करने-धरनेवाला नहीं है। बस ऐसी बात कीजिए कि वकील साहब के नाम पर बट्टा न लगे।

    भालचन्द्र एक मिनट तक आंखें बन्द किये बैठे रहेफिर एक लम्बी सांस खींच कर बोले-ईश्वर को मंजूर ही न था कि वह लक्ष्मी मेरे घर आतीनहीं तो क्या यह वज्र गिरता? सारे मनसूबे खाक में मिल गये। फूला न समाता था कि वह शुभ-अवसर निकट आ रहा हैपर क्या जानता था कि ईश्वर के दरबार में कुछ और षड्यन्त्र रचा जा रहा है। मरनेवाले की याद ही रूलाने के लिए काफी है। उसे देखकर तो जख्म और भी हरा जो जायेगा। उस दशा में न जाने क्या कर बैठूं। इसे गुण समझिएचाहे दोष कि जिससे एक बार मेरी घनिष्ठता हो गयीफिर उसकी याद चित्त से नहीं उतरती। अभी तो खैर इतना ही है कि उनकी सूरत आंखों के सामने नाचती रहती हैलेकिन यदि वह कन्या घर में आ गयीतब मेरा जिन्दा रहना कठिन हो जायेगा। सच मानिएरोते-रोते मेरी आंखें फूट जायेंगी। जानता हूंरोना-धोना व्यर्थ है। जो मर गया वह लौटकर नहीं आ सकता। सब्र करने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है, लेकिन दिल से मजबूर हूं। उस अनाथ बालिका को देखकर मेरा कलेजा फट जायेगा।

    मोटे- ऐसा न कहिए सरकार! वकील साहब नहीं तो क्याआप तो हैं। अब आप ही उसके पिता-तुल्य हैं। वह अब वकील साहब की कन्या नहींआपकी कन्या है। आपके हृदय के भाव तो कोई जानता नहींलोग समझेंगेवकील साहब का देहान्त हो जाने के कारण आप अपने वचन से फिर गये। इसमें आपकी बदनामी है। चित्त को समझाइए और हंस-खुशी कन्या का पाणिग्रहण करा लीजिए। हाथी मरे तो नौ लाख का। लाख विपत्ति पड़ी हैलेकिन मालकिन आप लोगों की सेवा-सत्कार करने में कोई बात न उठा रखेंगी।

    बाबू साहब समझ गये कि पंडित मोटेराम कोरे पोथी के ही पंडित नहींवरन व्यवहार-नीति में भी चतुर हैं। बोले-पंडितजीहलफ से कहता हूंमुझे उस लड़की से जितना प्रेम है, उतना अपनी लड़की से भी नहीं हैलेकिन जब ईश्वर को मंजूर नहीं हैतो मेरा क्या बस है? वह मृत्यु एक प्रकार की अमंगल सूचना हैजो विधाता की ओर से हमें मिली है। यह किसी आनेवाली मुसीबत की आकाशवाणी है विधाता स्पष्ट रीति से कह रहा है कि यह  विवाह मंगलमय न होगा। ऐसी दशा में आप ही सोचियेयह संयोग कहां तक उचित है। आप तो विद्वान आदमी हैं। सोचिएजिस काम का आरम्भ ही अमंगल से होउसका अंत अमंगलमय हो सकता है? नहींजानबूझकर मक्खी नहीं निगली जाती। समधिन साहब को समझाकर कह दीजिएगामैं उनकी आज्ञापालन करने को तैयार हूंलेकिन इसका परिणाम अच्छा न होगा। स्वार्थ के वंश में होकर मैं अपने परम मित्र की सन्तान के साथ यह अन्याय नहीं कर सकता।

    इस तर्क ने पडितजी को निरुत्तर कर दिया। वादी ने यह तीर छोड़ा थाजिसकी उनके पास कोई काट न थी। शत्रु ने उन्हीं के हथियार से उन पर वार किया था और वह उसका प्रतिकार न कर सकते थे। वह अभी कोई जवाब सोच ही रहे थेकि बाबू साहब ने फिर नौकरों को पुकारना शुरू किया- अरेतुम सब फिर गायब हो गये- झगडूछकौड़ीभवानीगुरूदीनरामगुलाम! एक भी नहीं बोलतासब-के-सब मर गये। पंडितजी के वास्ते पानी-वानी की फिक्र है? ना जाने इन सबों को कोई कहां तक समझये। अक्ल छू तक नहीं गयी। देख रहे हैं कि एक महाशय दूर से थके-मांदे चले आ रहे हैंपर किसी को जरा भी परवाह नहीं। लाओंपानी-वानी रखो। पडितजीआपके लिए शर्बत बनवाऊं या फलाहारी मिठाई मंगवा दूं।

    मोटेरामजी मिठाइयों के विषय में किसी तरह का बन्धन न स्वीकार करते थे। उनका सिद्धान्त था कि घृत से सभी वस्तुएं पवित्र हो जाती हैं। रसगुल्ले और बेसन के लड्डू उन्हें बहुत प्रिय थेपर शर्बत से उन्हें रुचि न थी। पानी से पेट भरना उनके नियम के विरूद्ध था। सकुचाते हुए बोले-शर्बत पीने की तो मुझे आदत नहींमिठाई खा लूंगा।

    भाल- फलाहारी न?

    मोटे- इसका मुझे कोई विचार नहीं।

    भाल- है तो यही बात। छूत-छात सब ढकोसला है। मैं स्वयं नहीं मानता। अरेअभी तक कोई नहीं आया? छकौड़ीभवानीगुरुदीन, रामगुलामकोई तो बोले!

    अबकी भी वही बूढ़ा कहार खांसता हुआ आकर खड़ा हो गया और बोला-सरकारमोर तलब दै दीन जाय। ऐसी नौकरी मोसे न होई। कहां लो दौरी दौरत-दौरत गोड़ पिराय लागत है।

    भाल-काम कुछ करो या न करोपर तलब पहिले चहिए! दिन भर पड़े-पड़े खांसा करोतलब तो तुम्हारी चढ़ रही है। जाकर बाजार से एक आने की ताजी मिठाई ला। दौड़ता हुआ जा।

    कहार को यह हुक्म देकर बाबू साहब घर में गये और स्त्री से बोले-वहां से एक पंडितजी आये हैं। यह खत लाये हैंजरा पढ़ो तो।

    पत्नी जी का नाम रंगीलीबाई था। गोरे रंग की प्रसन्न-मुख महिला थीं। रूप और यौवन उनसे विदा हो रहे थेपर किसी प्रेमी मित्र की भांति मचल-मचल कर तीस साल तक जिसके गले से लगे रहेउसे छोड़ते न बनता था।

    रंगीलीबाई बैठी पान लगा रही थीं। बोली-कह दिया न कि हमें वहां ब्याह करना मंजूर नहीं।

    भाल-हां, कह तो दियापर मारे संकोच के मुंह से शब्द न निकलता था। झूठ-मूठ का होला करना पड़ता।

    रंगीली-साफ बात करने में संकोच क्या? हमारी इच्छा हैनहीं करते। किसी का कुछ लिया तो नहीं है? जब दूसरी जगह दस हजार नगद मिल रहे हैं; तो वहां क्यों न करूं? उनकी लड़की कोई सोने की थोड़े ही है। वकील साहब जीते होते तो शरमाते-शमाते पन्द्रह-बीस हजार दे मरते। अब वहां क्या रखा है?

भाल- एक दफा जबान देकर मुकर जाना अच्छी बात नहीं। कोई मुख से कुछ न कहपर बदनामी हुए बिना नहीं रहती। मगर तुम्हारी जिद से मजबूर हूं।

    रंगीलीबाई ने पान खाकर खत खोला और पढ़ने लगीं। हिन्दी का अभ्यास बाबू साहब को तो बिल्कुल न था और यद्यपि रंगीलीबाई भी शायद ही कभी किताब पढ़ती होंपर खत-वत पढ़ लेती थीं। पहली ही पांति पढ़कर उनकी आंखें सजल हो गयीं और पत्र समाप्त किया। तो उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे-एक-एक शब्द करूणा के रस में डूबा हुआ था। एक-एक अक्षर से दीनता टपक रही थी। रंगीलीबाई की कठोरता पत्थर की नहींलाख की थीजो एक ही आंच से पिघल जाती है। कल्याणी के करूणोत्पादक शब्दों ने उनके स्वार्थ-मंडित हृदय को पिघला दिया। रूंधे हुए कंठ से बोली-अभी ब्राह्मण बैठा है न?

    भालचन्द्र पत्नी के आंसुओं को देख-देखकर सूखे जाते थे। अपने ऊपर झल्ला रहे थे कि नाहक मैंने यह खत इसे दिखाया। इसकी जरूरत क्या थी? इतनी बड़ी भूल उनसे कभी न हुई थी। संदिग्ध भाव से बोले-शायद बैठा होमैंने तो जाने को कह दिया था। रंगीली ने खिड़की से झांककर देखा। पंडित मोटेराम जी बगुले की तरह ध्यान लगाये बाजार के रास्ते की ओर ताक रहे थे। लालसा में व्यग्र होकर कभी यह पहलू बदलतेकभी वह पहलू। एक आने की मिठाई ने तो आशा की कमर ही तोड़ दी थीउसमें भी यह विलम्ब, दारूण दशा थी। उन्हें बैठे देखकर रंगीलीबाई बोली-है-है अभी हैजाकर कह दोहम विवाह करेंगेजरूर करेंगे। बेचारी बड़ी मुसीबत में है।

    भाल- तुम कभी-कभी बच्चों की-सी बातें करने लगती होअभी उससे कह आया हूं कि मुझे विवाह करना मंजूर नहीं। एक लम्बी-चौड़ी भूमिका बांधनी पड़ी। अब जाकर यह संदेश कहूंगातो वह अपने दिल में क्या कहेगाजरा सोचो तो? यह शादी-विवाह का मामला है। लड़कों का खेल नहीं कि अभी एक बात तय कीअभी पलट गये। भले आदमी की बात न हुईदिल्लगी हुई।

    रंगीली- अच्छातुम अपने मुंह से न कहोउस ब्राह्मण को मेरे पास भेज दो। मैं इस तरह समझा दूंगी कि तुम्हारी बात भी रह जाये और मेरी भी। इसमें तो तुम्हें कोई आपत्ति नहीं है।

    भाल-तुम अपने सिवा सारी दुनिया को नादान समझती हो। तुम कहो या मैं कहूंबात एक ही है। जो बात तय हो गयीवह हो गईअब मैं उसे फिर नहीं उठाना चाहता। तुम्हीं तो बार-बार कहती थीं कि मैं वहां न करूंगी। तुम्हारे ही कारण मुझे अपनी बात खोनी पड़ी। अब तुम फिर रंग बदलती हो। यह तो मेरी छाती पर मूंग दलना है। आखिर तुम्हें कुछ तो मेरे मान-अपमान का विचार करना चाहिए।

रंगीली- तो मुझे क्या मालूम था कि विधवा की दशा इतनी हीन हो गया है? तुम्हीं ने तो कहा था कि उसने पति की सारी सम्पत्ति छिपा रखी है और अपनी गरीबी का ढोंग रचकर काम निकालना चाहती है। एक ही छंटी औरत है। तुमने जो कहावह मैंने मान लिया। भलाई करके बुराई करने में तो लज्जा और संकोच है। बुराई करके भलाई करने मे कोई संकोच नहीं। अगर तुम हां कर आये होते और मैं नहीं करने को कहतीतो तुम्हारा संकोच उचित था। नहीं करने के बाद हां करने में तो अपना बड़प्पन है।

    भाल- तुम्हें बड़प्पन मालूम होता होमुझे तो लुच्चापन ही मालूम होता है। फिर तुमने यह कैसे मान लिया कि मैंने वकीलाइन में विषय में जो बात कही थीवह झूठी थी! क्या वह पत्र देखकर? तुम जैसी खुद सरल होवैसे ही दूसरे को भी सरल समझती हो।

    रंगीली- इस पत्र में बनावट नहीं मालूम होती। बनावट की बात दिल में चुभती नहीं। उसमें बनावट की गन्ध अवश्य रहती है।

    भाल- बनावट की बात तो ऐसी चुभती है कि सच्ची बात उसके सामने बिल्कुल फीकी मालूम होती है। यह किस्से-कहानियां लिखने वाले जिनकी किताबें पढ़-पढ़कर तुम घण्टों रोती होक्या सच्ची बातें लिखते है? सरासर झूठ का तूमार बांधते हैं। यह भी एक कला है।

    रंगीली- क्यों जीतुम मुझसे भी उड़ते हो! दाई से पेट छिपाते हो? मैं तुम्हारी बातें मान जाती हूंतो तुम समझते हो, इसे चकमा दिया। मगर मैं तुम्हारी एक-एक नस पहचानती हूं। तुम अपना ऐब मेरे सिर मढ़कर खुद  बेदाग बचना चहाते हो। बोलोकुछ झूठ कहती हूंजब वकील साहब जीते थेजो तुमने सोचा था कि ठहराव की जरूरत ही कया हैवे खुद  ही जितना उचित समेझेंगे देंगेबल्कि बिना ठहराव के और भी ज्यादा मिलने की आशा होगी। अब जो वकील साहब का देहान्त हो गया, तो तरह-तरह के हीले-हवाले करने लगे। यह भलमनसी नहींछोटापन हैइसका इलजाम भी तुम्हारे सिर है। मै। अब शादी-ब्याह के नगीच न जाऊंगी। तुम्हारी जैसी इच्छा हो, करो। ढोंगी आदमियों से मुझे चिढ़ है। जो बात करोसफाई से करोबुरा हो या अच्छा। हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और वाली नीति पर चलना तुम्हें शोभा नहीं देता। बोला आब भी वहां शादी करते हो या नहीं?

    भाला- जब मैं बेईमानदगाबाज और झूठा ठहरातो मुझसे पूछना ही क्या! मगर खूब पहचानती हो आदमियों को! क्या कहना हैतुम्हारी इस सूझ-बूझ कीबलैया ले लें!

    रंगीली- हो बड़े हयादारब भी नहीं शरमाते। ईमान से कहामैंने बात ताड़ ली कि नहीं?

          भाल-अजी जाओवह दूसरी औरतें होती हैं जो मर्दों को पहचानती हैं। अब तक मैं यही समझता था कि औरतों की दृष्टि बड़ी सूक्ष्म होती हैपर आज यह विश्वास उठ गया और महात्माओं ने औरतों के विषय में जो तत्व की बाते कही है, उनको मानना पड़ा।

    रंगीली- जरा आईने में अपनी सूरत तो देख आओंतुम्हें मेरी कमस है। जरा देख लोकितना झेंपे हुए हो।

    भाल- सच कहनाकितना झेंपा हुआ हूं?

    रंगीली- इतना हीजितना कोई भलामानस चोर चोरी खुल जाने पर झेंपता है।

    भाल- खैरमैं झेंपा ही सहीपर शादी वहां न होगी।

    रंगीली- मेरी बला सेजहां चाहो करो। क्योंभुवन से एक बार क्यों नहीं पूछ लेते?

    भाल- अच्छी बात हैउसी पर फैसला रहा।

    रंगीली- जरा भी इशारा न करना!

    भाल- अजीमैं उसकी तरफ ताकूंगा भी नहीं।

    संयोग से ठीक इसी वक्त भुवनमोहन भी आ पहुंचा। ऐसे सुन्दरसुडौलबलिष्ठ युवक कालेजों में बहुत कम देखने में आते हैं। बिल्कुल मां को पड़ा थावही गोरा-चिट्टा रंगवही पतले-पतले गुलाब की पत्ती के-से ओंठवही चौड़ामाथावही बड़ी-बड़ी आंखें, डील-डौल बाप का-सा था। ऊंचा कोटब्रीचेजटाईबूटहैट उस पर खूब ल रहे थे। हाथ में एक हाकी-स्टिक थी। चाल में जवानी का गरूर थाआंखों में आमत्मगौरव।

    रंगीली ने कहा-आज बड़ी देर लगाई तुमने? यह देखोतुम्हारी ससुराल से यह खत आया है। तुम्हारी सास ने लिखा है। साफ-साफ बतला दोअभी सबेरा है। तुम्हें वहां शादी करना मंजूर है या नहीं?

    भुवन- शादी करनी तो चाहिए अम्मांपर मैं करूंगा नहीं।

    रंगीली- क्यों?

    भुवन- कहीं ऐसी जगह शादी करवाइये कि खूब रूपये मिलें। और न सही एक लाख का तो डौल हो। वहां अब क्या रखा है? वकील साहब रहे ही नहींबुढ़िया के पास अब क्या होगा?

    रंगीली- तुम्हें ऐसी बातें मुंह से निकालते शर्म नहीं आती?

    भुवन- इसमें शर्म की कौन-सी बात है? रूपये किसे काटते हैं? लाख रूपये तो लाख जन्म में भी न जमा कर पाऊंगा। इस साल पास भी हो गयातो कम-से-कम पांच साल तक रूपये से सूरत नजर न आयेगी। फिर सौ-दो-सौ रूपये महीने कमाने लगूंगा। पांच-छ: तक पहुंचते-पहुंचते उम्र के तीन भाग बीत जायेंगे। रूपये जमा करने की नौबत ही न आयेगी। दुनिया का कुछ मजा न उठा सकूंग। किसी धनी की लड़की से शादी हो जातीतो चैन से कटती। मैं ज्यादा नहीं चाहताबस एक लाख हो या फिर कोई ऐसी जायदादवाली बेवा मिलेजिसके एक ही लड़की हो।

    रंगीली- चाहे औरत कैसे ही मिले।

    भूवन- धन सारे ऐबों को छिपा देगा। मुझे वह गालियां भी सुनायेतो भी चूं न करूं। दुधारू गाय की लात किसे बुरी मालूम होती है?

    बाबू साहब ने प्रशंसा-सूचक भाव से कहा-हमें उन लोगों के साथ सहानुभति है और दु:खी है कि ईश्वर ने उन्हें विपत्ति में डालालेकिन बुद्धि से काम लेकर ही कोई निश्चय करना चहिए। हम कितने ही फटे-हालों जायेंफिर भी अच्छी-खासी बारात हो जायेगी। वहां भोजन का भी ठिकाना नहीं। सिवा इसके कि लोग हंसें और कोई नतीजा न निकलेगा।

    रंगीली- तुम बाप-पूत दोनों एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हो। दोनों उस गरीब लड़की के गले पर छुरी फेरना चाहते हो।

    भुवन-जो गरीब हैउसे गरीबों ही के यहां सम्बन्ध करना चहिए। अपनी हैसियत से बढ़कर.....।

    रंगीली- चुप भी रहआया है वहां से हैसियत लेकर। तुम कहां के धन्ना-सेठ हो? कोई आदमी द्वारा पर आ जायेतो एक लोटे पानी को तरस जाये। बड़े हैसियतवाले बने हो!

    यह कहकर रंगीली वहां से उठकर रसोई का प्रबन्ध करने चली गयी।

    भुवनमोहन मुस्कराता हुआ अपने कमरे में चला गया और बाबू साहब मूछों पर ताव देते हुए बाहर आये कि मोटेराम को अन्तिम निश्चय सुना दें। पर उनका कहीं पता न था।

    मोटेरामजी कुछ देर तक तो कहार की राह देखते रहेजब उसके आने में बहुत देर हुईतो उनसे बैठा न गया। सोचा यहां बैठे-बैठे काम न चलेगाकुछ उद्योग करना चाहिए। भाग्य के भरोसे यहां अड़ी किये बैठे रहेंतो भूखों मर जायेंगे। यहां तुम्हारी दाल नहीं गलने की। चुपके से लकड़ी उठायी और जिधर वह कहार गया थाउसी तरफ चले। बाजार थोड़ी ही दूर पर थाएक क्षण में जा पहुंचे। देखातो बुड्ढा एक हलवाई की दूकान पर बैठा चिलम पी रहा था। उसे देखते ही आपने बड़ी बेतकल्लुफी से कहा-अभी कुछ तैयार नहीं है क्या महरा? सरकार वहां बैठे बिगड़ रहे हैं कि जाकर सो गया या ताड़ी पीने लगा। मैंने कहा-सरकार यह बात नहींबुढ्डा आदमी हैआते ही आते तो आयेगा। बड़े विचित्र जीव हैं। न जाने इनके यहां कैसे नौकर टिकते हैं।

    कहार-मुझे छोड़कर आज तक दूसरा कोई टिका नहींऔर न टिकेगा। साल-भर से तलब नहीं मिली। किसी को तलब नहीं देते। जहां किसी ने तलब मांगी और लगे डांटने। बेचारा नौकरी छोड़कर भाग जाता है। वे दोनों आदमीजो पंखा झल रहे थेसरकारी नौकर हैं। सरकार से दो अर्दली मिले हैं न! इसी से पड़े हुए हैं। मैं भी सोचता हूंजैसा तेरा ताना-बाना वैसे मेरी भरनी! इस साल कट गये हैंसाल दो साल और इसी तरह कट जायेंगे।

    मोटेराम- तो तुम्हीं अकेले हो? नाम तो कई कहारों का लेते है।

    कहार- वह सब इन दो-तीन महीनों के अन्दर आये और छोड़-छोड़ कर चले गये। यह अपना रोब जमाने को अभी तक उनका नाम जपा करते हैं। कहीं नौकरी दिलाइएगाचलूं?

    मोटेराम- अजीबहुत नौकरी है। कहार तो आजकल ढूंढे नहीं मिलते। तुम तो पुराने आदमी हो, तुम्हारे लिए नौकरी की क्या कमी है। यहां कोई ताजी चीज? मुझसे कहने लगेखिचड़ी बनाइएगा या बाटी लगाइएगा? मैंने कह दिया-सरकार, बुढ्डा आदमी हैरात को उसे मेरा भोजन बनाने में कष्ट होगामैं कुछ बाजार ही से खा लूंगा। इसकी आप चिन्ता न करें। बोलेअच्छी बात हैकहार आपको दुकान पर मिलेगा। बोलो साहजीकुछ तर माल तैयार है? लड्डू तो ताजे मालूम होते हैं तौल दो एक सेर भर। आ जाऊं वहीं ऊपर न?

    यह कहकर मोटेरामजी हलवाई की दूकान पर जा बैठे और तर माल चखने लगे। खूब छककर खाया। ढाई-तीन सेर चट कर गये। खाते जाते थे और हलवाई की तारीफ करते जाते थे- शाहजीतुम्हारी दूकान का जैसा नाम सुना थावैसा ही माल भी पाया। बनारसवाले ऐसे रसगुल्ले नहीं बना पातेकलाकन्द अच्छी बनाते हैंपर तुम्हारी उनसे बुरी नहींमाल डालने से अच्छी चीज नहीं बन जातीविद्या चहिए।

    हलवाई-कुछ और लीजिए महाराज! थोड़ी-सी रबड़ी मेरी तरफ से लीजिए।

    मोटेराम-इच्छा तो नहीं हैलेकिन दे दो पाव-भर।

    हलवाई-पाव-भर क्या लीजिएगा? चीज अच्छी हैआध सेर तो लीजिए।

खूब इच्छापूर्ण भोजन करके पंडितजी ने थोड़ी देर तक बाजार की सैर की और नौ बजते-बजते मकान पर आये। यहां सन्नाटा-सा छाया हुआ था। एक लालटेन जल रही थी। अपने चबूतरे पर बिस्तर जमाया और सो गये।

    सबेरे अपने नियमानुसार कोई आठ बजे उठेतो देखा कि बाबूसाहब टहल रहे हैं। इन्हें जगा देखकर वह पालागन कर बोले-महाराजआज रात कहां चले गयेमैं बड़ी रात तक आपकी राह देखता रहा। भोजन का सब सामान बड़ी देर तक रखा रहा। जब आज न आयेतो रखवा दिया गया। आपने कुछ भोजन किया था। या नहीं?

    मोटे- हलवाई की दूकान में कुछ खा आया था।

    भाल- अजी पूरी-मिठाई में वह आनन्द कहांजो बाटी और दाल में है। दस-बारह आने खर्च हो गये होंगेफिर भी पेट न भरा होगाआप मेरे मेहमान हैंजितने पैसे लगे हों ले लीजिएगा।

    मोटे- आप ही के हलवाई की दूकान पर खाया थावह जो नुक्कड़ पर बैठता है।

    भाल- कितने पैसे देने पड़े?

    मोटे- आपके हिसाब में लिखा दिये हैं।

    भाल- जितनी मिठाइयां ली होंमुझे बता दीजिएनहीं तो पीछे से बेईमानी करने लगेगा। एक ही ठग है।

    मोटे- कोई ढाई सेर मिठाई थी और आधा सेर रबड़ी।

    बाबू साहब ने विस्फरित नेत्रों से पंडितजी को देखामानो कोई अचम्भे की बात सुनी हो। तीन सेर तो कभी यहां महीने भर का टोटल भी न होता था और यह महाशय एक ही बार में कोई चार रूपये का माल उड़ा गये। अगर एक आध दिन और रह गयेतो या बैठ जायेगी। पेट है या शैतान की कब्र? तीन सेर! कुछ ठिकाना है! उद्विग्न दशा में दौड़े हुए अन्दर गये और रंगीली से बोल-कुछ सुनती हो, यह महाशय कल तीन सेर मिठाई उड़ा गये। तीन सेर पक्की तौल!

    रंगीलीबाई ने विस्मित होकर कहा-अजी नहींतीन सेर भला क्या खा जायेगा! आदमी है या बैल?

    भाल- तीन सेर तो अपने मुंह से कह रहा है। चार सेर से कम न होगापक्की तौल!

    रंगीली- पेट में सनीचर है क्या?

    भाल- आज और रह गया तो छ: सेर पर हाथ फेरेगा।

    रंगीली- तो आज रहे ही क्योंखत का जवाब जो देना देकर विदा करो। अगर रहे तो साफ कह देना कि हमारे यहां मिठाई मुफ्त नहीं आती। खिचड़ी बनाना होबनावेनहीं तो अपनी राह ले। जिन्हें ऐसे पेटुओं को खिलाने से मुक्ति मिलती होवे खिलायें हमें ऐसी मुक्ति न चाहिये!

    मगर पंडित विदा होने को तैयार बैठे थेइसलिए बाबूसाहब को कौशल से काम लेने की जरूरत न पड़ी।

    पूछा- क्या तैयारी कर दी महाराज?

मोटे- हां सरकारअब चलूंगा। नौ बजे की गाड़ी मिलेगी न?

    भाल- भला आज तो और रहिए।

    यह कहते-कहते बाबूजी को भय हुआ कि कहीं यह महाराज सचमुच न रह जायेंइसलिये वाक्य को यों पूरा किया- हांवहां भी लोग आपका इन्तजार कर रहे होंगे।

    मोटे- एक-दो दिन की तो कोई बात न थी और विचार भी यही था कि त्रिवेणी का स्नान करूंगापर बुरा न मानिए तो कहूंआप लोगों में ब्राह्राणों के प्रति लेशमात्र भी श्रद्धा नहीं है। हमारे जजमान हैंजो हमारा मुंह जोहते रहते हैं कि पंडितजी कोई आज्ञा देंतो उसका पालन करें। हम उनके द्वारा पहुंच जाते हैंतो वे अपना धन्य भाग्य समझते हैं और सारा घर-छोटे से बड़े तक हमारी सेवा-सत्कार में मग्न हो जाते हैं। जहां अपना आदर नहींवहां एक क्षण भी ठहरना असह्राय है। जहां ब्रह्राण का आदर नहींवहां कल्याण नहीं हो सकता।

    भाल- महाराजहमसे तो ऐसा अपराध नहीं हुआ।

    मोटे- अपराध नहीं हुआ! और अपराध कहते किसे हैं? अभी आप ही ने घर में जाकर कहा कि यह महाशय तीन सेर मिठाई चट कर गयेपक्की तौल। आपने अभी खानेवाले देखे कहां? एक बार खिलाइये तो आंखें खुल जायें। ऐसे-ऐसे महान पुरूष पड़े हैंजो पसेरी भर मिठाई खा जायें और डकार तक न लें। एक-एक मिठाई खाने के लिए हमारी चिरौरी की जाती हैरूपये दिये जाते हैं। हम भिक्षुक ब्राह्राण नहीं हैं, जो आपके द्वार पर पड़े रहें। आपका नाम सुनकर आये थेयह न जानते थे कि यहां मेरे भोजन के भी लाले पड़ेंगे। जाइयेभगवान् आपका कल्याण करें!

    बाबू साहब ऐसा झेंपे कि मुंह से बात न निकली। जिन्दगी भर में उन पर कभी ऐसी फटकार न पड़ी थी। बहुत बातें बनायीं-आपकी चर्चा न थीएक दूसरे ही महाशय की बात थीलेकिन पंडितजी का क्रोध शान्त न हुआ। वह सब कुछ सह सकते थेपर अपने पेट की निन्दा न सह सकते थे। औरतों को रूप की निन्दा जितनी प्रिय लगती हैउससे कहीं अधिक अप्रिय पुरूषों को अपने पेट की निन्दा लगती है। बाबू साहब मनाते तो थे; पर धड़का भी समाया हुआ था कि यह टिक न जायें। उनकी कृपणता का परदा खुल गया थाअब इसमें सन्देह न था। उस पर्दे को ढांकना जरूरी था। अपनी कृपणता को छिपाने के लिए उन्होंने कोई बात उठा न रखी पर होनेवाली बात होकर रही। पछता रहे थे कि कहां से घर में इसकी बात कहने गया और कहा भी तो उच्च स्वर में। यह दुष्ट भी कान लगाये सुनता रहाकिन्तु अब पछताने से क्या हो सकता था? न जाने किस मनहूस की सूरत देखी थी यह विपत्ति गले पड़ी। अगर इस वक्त यहां से रूष्ट होकर चला गया; तो वहां जाकर बदनाम करेगा और मेरा सारा कौशल खुल जायेगा। अब तो इसका मुंह बन्द कर देना ही पड़ेगा।

    यह सोच-विचार करते हुए वह घर में जाकर रंगीलीबाई से बोले-इस दुष्ट ने हमारी-तुम्हारी बातें सुन ली। रूठकर चला जा रहा है।

    रंगीली-जब तुम जानते थे कि द्वार पर खड़ा हैतो धीरे से क्यों न बोले?

    भाल-विपत्ति आती है; तो अकेले नहीं आती। यह क्या जानता था कि वह द्वार पर कान लगाये खड़ा है।

    रंगीली- न जाने किसका मुंह देख था?

    भाल-वही दुष्ट सामने लेटा हुआ था। जानता तो उधर ताकता ही नहीं। अब तो इसे कुछ दे-दिलाकर राजी करना पड़ेगा।

    रंगीली- ऊंहजाने भी दो। जब तुम्हें वहां विवाह ही नहीं करना हैतो क्या परवाह है? जो चाहे समझेजो चाहे कहे।

    भाल-यों जान न बचेगी। आओं दस रूपये विदाई के बहाने दे दूं। ईश्वर फिर इस मनहूस की सूरत न दिखाये।

    रंगीली ने बहुत अछताते-पछताते दस रुपये निकाले और बाबू साहब ने उन्हें ले जाकर पंडितजी के चरणों पर रख दिया। पंडितजी ने दिल में कहा-धत्तैरे मक्खीचूस की! ऐसा रगड़ा कि याद करोगे। तुम समझते होगे कि दस रुपये देकर इसे उल्लू बना लूंगा। इस फेर में न रहना। यहां तुम्हारी नस-नस पहचानते हैं। रुपये जेब में रख लिये और आशीर्वाद देकर अपनी राह ली।

    बाबू साहब बड़ी देकर तक खड़े सोच रहे थे-मालूम नहींअब भी मुझे कृपण ही समझ रहा है या परदा ढंक गया। कहीं ये रुपये भी तो पानी में नहीं गिर पड़े।

 

चार

 

ल्याणी के सामने अब एक विषम समस्या आ खड़ी हुई। पति के देहान्त के बाद उसे अपनी दुरवस्था का यह पहला और बहुत ही कड़वा अनुभव हुआ। दरिद्र विधवा के लिए इससे बड़ी और क्या विपत्ति हो सकती है कि जवान बेटी सिर पर सवार हो? लड़के नंगे पांव पढ़ने जा सकते हैंचौका-बर्त्तन भी अपने हाथ से किया जा सकता हैरूखा-सूखा खाकर निर्वाह किया जा सकता हैझोपड़े में दिन काटे जा सकते हैंलेकिन युवती कन्या घर में नहीं बैठाई जा सकती। कल्याणी को भालचन्द्र पर ऐसा क्रोध आता था कि स्वयं जाकर उसके मुंह में कालिख लगाऊंसिर के बाल नोच लूंकहूं कि तू अपनी बात से फिर गया, तू अपने बाप का बेटा नहीं। पंडित मोटेराम ने उनकी कपट-लीला का नग्न वृत्तान्त सुना दिया था।

    वह इसी क्रोध में भरी बैठी थी कि कृष्णा खेलती हुई आयी और बोली-कै दिन में बारात आयेगी अम्मां? पंडित तो आ गये।

    कल्याणी- बारात का सपना देख रही है क्या?

    कृष्णा-वही चन्दर तो कह रहा है कि-दो-तीन दिन में बारात आयेगीक्या न जायेगी अम्मां?

    कल्याणी-एक बार तो कह दियासिर क्यों खाती है?

    कृष्णा-सबके घर तो बारात आ रही हैहमारे यहां क्यों नहीं आती?

    कल्याणी-तेरे यहां जो बारात लाने वाला थाउसके घर में आग लग गई।

    कृष्णा-सचअम्मां! तब तो सारा घर जल गया होगा। कहां रहते होंगे? बहन कहां जाकर रहेगी?

    कल्याणी-अरे पगली! तू तो बात ही नहीं समझती। आग नहीं लगी। वह हमारे यहां ब्याह न करेगा।

    कृष्णा-यह क्यों अम्मां? पहले तो वहीं ठीक हो गया था न?

    कल्याणी-बहुत से रुपये मांगता है। मेरे पास उसे देने को रुपये नहीं हैं।

    कृष्णा-क्या बड़े लालची हैंअम्मां?

    कल्याणी-लालची नहीं तो और क्या है। पूरा कसाई निर्दयीदगाबाज।

    कृष्णा-तब तो अम्मांबहुत अच्छा हुआ कि उसके घर बहन का ब्याह नहीं हुआ। बहन उसके साथ कैसे रहती? यह तो खुश होने की बात है अम्मां तुम रंज क्यों करती हो?

    कल्याणी ने पुत्री को स्नेहमयी दृष्टि से देखा। इनका कथन कितना सत्य है? भोले शब्दों में समस्या का कितना मार्मिक निरूपण है? सचमुच यह ते प्रसन्न होने की बात है कि ऐसे कुपात्रों से सम्बन्ध नहीं हुआरंज की कोई बात नहीं। ऐसे कुमानुसों के बीच में बेचारी निर्मला की न जाने क्या गति होती अपने नसीबों को रोती। जरा सा घी दाल में अधिक पड़ जातातो सारे घर में शोर मच जाताजरा खाना ज्यादा पक जातातो सास दनिया सिर पर उठा लेती। लड़का भी ऐसा लोभी है। बड़ी अच्छी बात हुई, नहींबेचारी को उम्र भर रोना पड़ता। कल्याणी यहां से उठीतो उसका हृदय हल्का हो गया था।

    लेकिन विवाह तो करना ही था और हो सके तो इसी सालनहीं तो दूसरे साल फिर नये सिरे से तैयारियां करनी पडेगी। अब अच्छे घर की जरूरत न थी। अच्छे वर की जरूरत न थी। अभागिनी को अच्छा घर-वर कहां मिलता! अब तो किसी भांति सिर का बोझा उतारना थाकिसी भांति लड़की को पार लगाना थाउसे कुएं में झोंकना था। यह रूपवती हैगुणशीला है, चतुर हैकुलीन हैतो हुआ करेंदहेज नहीं तो उसके सारे गुण दोष हैंदहेज हो तो सारे दोष गुण हैं। प्राणी का कोई मूल्य नहींकेवल देहज का मूल्य है। कितनी विषम भग्यलीला है!

    कल्याणी का दोष कुछ कम न था। अबला और विधवा होना ही उसे दोषों से मुक्त नहीं कर सकता। उसे अपने लड़के अपनी लड़कियों से कहीं ज्यादा प्यारे थे। लड़के हल के बैल हैंभूसे खली पर पहला हक उनका हैउनके खाने से जो बचे वह गायों का! मकान थाकुछ नकद थाकई हजार के गहने थेलेकिन उसे अभी दो लड़कों का पालन-पोषण करना थाउन्हें पढ़ाना-लिखाना था। एक कन्या और भी चार-पांच साल में विवाह करने योग्य हो जायेगी। इसलिए वह कोई बड़ी रकम दहेज में न दे सकती थीआखिर लड़कों को भी तो कुछ चाहिए। वे क्या समझेंगे कि हमारा भी कोई बाप था।

    पंडित मोटेराम को लखनऊ से लौटे पन्द्रह दिन बीत चुके थे। लौटने के बाद दूसरे ही दिन से वह वर की खोज में निकले थे। उन्होंने प्रण किया था कि मैं लखनऊ वालों को दिखा दूंगा कि संसार में तुम्हीं अकेले नहीं होतुम्हारे ऐसे और भी कितने पड़े हुए हैं। कल्याणी रोज दिन गिना करती थी। आज उसने उन्हें पत्र लिखने का निश्चय किया और कलम-दवात लेकर बैठी ही थी कि पंडित मोटेराम ने पदार्पण किया।

    कल्याणी-आइये पंड़ितजीमैं तो आपको खत लिखने जा रही थीकब लौटे?

    मोटेराम-लौटा तो प्रात:काल ही थापर इसी समय एक सेठ के यहां से निमन्त्रण आ गया। कई दिन से तर माल न मिले थे। मैंने कहा कि लगे हाथ यह भी काम निपटाता चलूं। अभी उधर ही से लौटा आ रहा हूंकोई पांच सौ ब्रह्राणों को पंगत थी।

    कल्याणी-कुछ कार्य भी सिद्ध हुआ या रास्ता ही नापना पड़ा।

    मोटेराम- कार्य क्यों न सिद्ध होगा? भलायह भी कोई बात है? पांच जगह बातचीत कर आया हूं। पांचों की नकल लाया हूं। उनमें से आप चाहे जिसे पसन्द करें। यह देखिए इस लड़के का बाप डाक के सीगे में सौ रूपये महीने का नौकर है। लड़का अभी कालेज में पढ़  रहा है। मगर नौकरी का भरोसा हैघर में कोई जायदाद नहीं। लड़का होनहार मालूम होता है। खानदान भी अच्छा है दो हजार में बात तय हो जायेगी। मांगते तो यह तीन हजार हैं।

    कल्याणी- लड़के के कोई भाई है?

    मोटे-नहींमगर तीन बहनें हैं और तीनों क्वांरी। माता जीवित है। अच्छा अब दूसरी नकल दिये। यह लड़का रेल के सीगे में पचास रूपये महीना पाता है। मां-बाप नहीं हैं। बहुत ही रूपवान् सुशील और शरीर से खूब हृष्ट-पुष्ट कसरती जवान है। मगर खानदान अच्छा नहींकोई कहता हैमां नाइन थीकोई कहता हैठकुराइन थी। बाप किसी रियासत में मुख्तार थे। घर पर थोड़ी सी जमींदारी हैमगर उस पर कई हजार का कर्ज है। वहां कुछ लेना-देना न पडेगा। उम्र कोई बीस साल होगी।

    कल्याणी-खानदान में दाग न होतातो मंजूर कर लेती। देखकर तो मक्खी नहीं निगली जाती।

    मोटे-तीसरी नकल देखिए। एक जमींदार का लड़का हैकोई एक हजार सालाना नफा है। कुछ खेती-बारी भी होती है। लड़का पढ़-लिखा तो थोड़ा ही हैकचहरी-अदालत के काम में चतुर है। दुहाजू हैपहली स्त्री को मरे दो साल हुए। उससे कोई संतान नहींलेकिन रहना-सहनमोटा है। पीसना-कूटना घर ही में होता है।

    कल्याणी- कुछ देहज मांगते हैं?

    मोटे-इसकी कुछ न पूछिए। चार हजार सुनाते हैं। अच्छा यह चौथी नकल दिये। लड़का वकील हैउम्र कोई पैंतीस साल होगी। तीन-चार सौ की आमदनी है। पहली स्त्री मर चुकी है उससे तीन लड़के भी हैं। अपना घर बनवाया है। कुछ जायदाद भी खरीदी है। यहां भी लेन-देन का झगड़ा नहीं है।

    कल्याणी- खानदान कैसा है?

    मोटे-बहुत ही उत्तमपुराने रईस हैं। अच्छायह पांचवीं नकल दिए। बाप का छापाखाना है। लड़का पढ़ा तो बी. ए. तक हैपर उस छापेखाने में काम करता है। उम्र अठारह साल की होगी। घर में प्रेस के सिवाय कोई जायदाद नहीं हैमगर किसी का कर्ज सिर पर नहीं। खानदान न बहुत अच्छा हैन बुरा। लड़का बहुत सुन्दर और सच्चरित्र है। मगर एक हजार से कम में मामला तय न होगामांगते तो वह तीन हजार हैं। अब बताइएआप कौन-सा वर पसन्द करती हैं?

    कल्याणी-आपकों सबों में कौन पसन्द है?

    मोटे-मुझे तो दो वर पसन्द हैं। एक वह जो रेलवई में है और दूसरा जो छापेखाने में काम करता है।

    कल्याणी-मगर पहले के तो खानदान में आप दोष बताते हैं?

    मोटे-हांयह दोष तो है। छापेखाने वाले को ही रहने दीजिये।

    कल्याणी-यहां एक हजार देने को कहां से आयेगा? एक हजार तो आपका अनुमान हैशायद वह और मुंह फैलाये। आप तो इस घर की दशा देख ही रहे हैंभोजन मिलता जायेयही गनीमत है। रूपये कहां से आयेंगे? जमींदार साहब चार हजार सुनाते हैंडाक बाबू भी दो हजार का सवाल करते हैं। इनको जाने दीजिए। बसवकील साहब ही बच सकते हैं। पैंतीस साल की उम्र भी कोई ज्यादा नहीं। इन्हीं को क्यों न रखिए।

मोटेराम-आप खूब सोच-विचार लें। मैं यों आपकी मर्जी का ताबेदार हूं। जहां कहिएगा वहां जाकर टीका कर आऊंगा। मगर हजार का मुंह न देखिएछापेखाने वाला लड़का रत्न है। उसके साथ कन्या का जीवन सफल हो जाएगा। जैसी यह रूप और गुण की पूरी हैवैसा ही लड़का भी सुन्दर और सुशील है।

    कल्याणी-पसन्द तो मुझे भी यही है महाराजपर रुपये किसके घर से आयें! कौन देने वाला है! है कोई दानी? खानेवाले खा-पीकर चंपत हुए। अब किसी की भी सूरत नहीं दिखाई देतीबल्कि और मुझसे बुरा मानते हैं कि हमें निकाल दिया। जो बात अपने बस के बाहर हैउसके लिए हाथ ही क्यों फैलाऊं? सन्तान किसको प्यारी नहीं होती? कौन उसे सुखी नहीं देखना चाहता? पर जब अपना काबू भी हो। आप ईश्वर का नाम लेकर वकील साहब को टीका कर आइये। आयु कुछ अधिक है, लेकिन मरना-जीना विधि के हाथ है। पैंतीस साल का आदमी बुढ्डा नहीं कहलाता। अगर लड़की के भाग्य में सुख भोगना बदा हैतो जहां जायेगी सुखी रहेगीदु:ख भोगना हैतो जहां जायेगी दु:ख झेलेगी। हमारी निर्मला को बच्चों से प्रेम है। उनके बच्चों को अपना समझेगी। आप शुभ मुहूर्त देखकर टीका कर आयें।

 

पांच

 

नि

र्मला का विवाह हो गया। ससुराल आ गयी। वकील साहब का नाम था मुंशी तोताराम। सांवले रंग के मोटे-ताजे आदमी थे। उम्र तो अभी चालीस से अधिक न थीपर वकालत के कठिन परिश्रम ने सिर के बाल पका दिये थे। व्यायाम करने का उन्हें अवकाश न मिलता था। वहां तक कि कभी कहीं घूमने भी न जातेइसलिए तोंद निकल आई थी। देह के स्थून होते हुए भी आये दिन कोई-न-कोई शिकायत रहती थी। मंदग्नि और बवासीर से तो उनका चिरस्थायी सम्बन्ध था। अतएव बहुत फूंक-फूंककर कदम रखते थे। उनके तीन लड़के थे। बड़ा मंसाराम सोहल वर्ष का थामंझला जियाराम बारह और सियाराम सात वर्ष का। तीनों अंग्रेजी पढ़ते थे। घर में वकील साहब की विधवा बहिन के सिवा और कोई औरत न थी। वही घर की मालकिन थी। उनका नाम था रुकमिणी और अवस्था पचास के ऊपर थी। ससुराल में कोई न था। स्थायी रीति से यहीं रहती थीं।

    तोताराम दम्पति-विज्ञान में कुशल थे। निर्मला के प्रसन्न रखने के लिए उनमें जो स्वाभाविक कमी थीउसे वह उपहारों से पूरी करना चाहते थे। यद्यपि वह बहु ही मितव्ययी पुरूष थेपर निर्मला के लिए कोई-न-कोई तोहफा रोज लाया करते। मौके पर धन की परवाइ न करते थे। लड़के के लिए थोड़ा दूध आता थापर निर्मला के लिए मेवेमुरब्बेमिठाइयां-किसी चीज की कमी न थी। अपनी जिन्दगी में कभी सैर-तमाशे देखने न गये थेपर अब छुट्टियों में निर्मला को सिनेमा, सरकसएटरदिखाने ले जाते थे। अपने बहुमूल्य समय का थोडा-सा हिस्सा उसके साथ बैंठकर ग्रामोफोन बजाने में व्यतीत किया करते थे।

    लेकिन निर्मला को न जाने क्यों तोताराम के पास बैठने और हंसने-बोलने में संकोच होता था। इसका कदाचित् यह कारण था कि अब तक ऐसा ही एक आदमी उसका पिता थाजिसके सामने वह सिर-झुकाकरदेह चुराकर निकलती थीअब उनकी अवस्था का एक आदमी उसका पति था। वह उसे प्रेम की वस्तु नहीं सम्मान की वस्तु समझती थी। उनसे भागती फिरतीउनको देखते ही उसकी प्रफुल्लता पलायन कर जाती थी।

    वकील साहब को नके दम्पत्ति-विज्ञान न सिखाया था कि युवती के सामने खूब प्रेम की बातें करनी चाहिये। दिल निकालकर रख देना चहियेयही उसके वशीकरण का मुख्य मंत्र है। इसलिए वकील साहब अपने प्रेम-प्रदर्शन में कोई कसर न रखते थेलेकिन निर्मला को इन बातों से घृणा होती थी। वही बातेंजिन्हें किसी युवक के मुख से सुनकर उनका हृदय प्रेम से उन्मत्त हो जातावकील साहब के मुंह से निकलकर उसके हृदय पर शर के समान आघात करती थीं। उनमें रस न था उल्लास न थाउन्माद न थाहृदय न थाकेवल बनावट थीघोखा था और शुष्कनीरस शब्दाडम्बर। उसे इत्र और तेल बुरा न लगतासैर-तमाशे बुरे न लगते, बनाव-सिंगार भी बुरा न लगता थाबुरा लगता थातो केवल तोताराम के पास बैठना। वह अपना रूप और यौवन उन्हें न दिखाना चाहती थीक्योंकि वहां देखने वाली आंखें न थीं। वह उन्हें इन रसों का आस्वादन लेने योग्य न समझती थी। कली प्रभात-समीर ही के सपर्श से खिलती है। दोनों में समान सारस्य है। निर्मला के लिए वह प्रभात समीर कहां था?

    पहला महीना गुजरते ही तोताराम ने निर्मला को अपना खजांची बना लिया। कचहरी से आकर दिन-भर की कमाई उसे दे देते। उनका ख्याल था कि निर्मला इन रूपयों को देखकर फूली न समाएगी। निर्मला बड़े शौक से इस पद का काम अंजाम देती। एक-एक पैसे का हिसाब लिखतीअगर कभी रूपये कम मिलतेतो पूछती आज कम क्यों हैं। गृहस्थी के सम्बन्ध में उनसे खूब बातें करती। इन्हीं बातों के लायक वह उनको समझती थी। ज्योंही कोई विनोद की बात उनके मुंह से निकल जातीउसका मुख लिन हो जाता था।

    निर्मला जब वस्त्राभूष्णों से अलंकृत होकर आइने के सामने खड़ी होती और उसमें अपने सौंन्दर्य की सुषमापूर्ण आभा देखतीतो उसका हृदय एक सतृष्ण कामना से तड़प उठता था। उस वक्त उसके हृदय में एक ज्वाला-सी उठती। मन में आता इस घर में आग लगा दूं। अपनी माता पर क्रोध आतापर सबसे अधिक क्रोध बेचारे निरपराध तोताराम पर आता। वह सदैव इस ताप से जला करती। बांका सवार लद्रदू-टट्टू पर सवार होना कब पसन्द करेगाचाहे उसे पैदल ही क्यों न चलना पड़े? निर्मला की दशा उसी बांके सवार की-सी थी। वह उस पर सवार होकर उड़ना चाहती थीउस उल्लासमयी विद्यत् गति का आनन्द उठाना चाहती थीटट्टू के हिनहिनाने और कनौतियां खड़ी करने से क्या आशा होती? संभव था कि बच्चों के साथ हंसने-खेलने से वह अपनी दशा को थोड़ी देर के लिए भूल जातीकुछ मन हरा हो जाता, लेकिन रुकमिणी देवी लड़कों को उसके पास फटकने तक न देतींमानो वह कोई पिशाचिनी है, जो उन्हें निगल जायेगी। रुकमिणी देवी का स्वभाव सारे संसार से निराला थायह पता लगाना कठिन था कि वह किस बात से खुश होती थीं और किस बात से नाराज। एक बार जिस बात से खुश हो जाती थींदूसरी बार उसी बात से जल जाती थी। अगर निर्मला अपने कमरे में बैठी रहतीतो कहतीं कि न जाने कहां की मनहूसिन है! अगर वह कोठे पर चढ़ जाती या महरियों से बातें करतीतो छाती पीटने लगतीं-न लाज हैन शरमनिगोड़ी ने हया भून खाई! अब क्या कुछ दिनों में बाजार में नाचेगी! जब से वकील साहब ने निर्मला के हाथ में रुपये-पैसे देने शुरू कियेरुकमिणी उसकी आलोचना करने पर आरूढ़ हो गयी। उन्हें मालूम होता था। कि अब प्रलय होने में बहुत थोड़ी कसर रह गयी है। लड़कों को बार-बार पैसों की जरूरत पड़ती। जब तक खुद स्वामिनी थींउन्हें बहला दिया करती थीं। अब सीधे निर्मला के पास भेज देतीं। निर्मला को लड़कों के चटोरापन अच्छा न लगता था। कभी-कभी पैसे देने से इन्कार कर देती। रुकमिणी को अपने वाग्बाण सर करने का अवसर मिल जाता-अब तो मालकिन हुई हैलड़के काहे को जियेंगे। बिना मां के बच्चे को कौन पूछे? रूपयों की मिठाइयां खा जाते थेअब धेले-धेले को तरसते हैं। निर्मला अगर चिढ़कर किसी दिन बिना कुछ पूछे-ताछे पैसे दे देतीतो देवीजी उसकी दूसरी ही आलोचना करतीं-इन्हें क्यालड़के मरे या जियेंइनकी बला सेमां के बिना कौन समझाये कि बेटाबहुत मिठाइयां मत खाओ। आयी-गयी तो मेरे सिर जायेगीइन्हें क्या? यहीं तक होतातो निर्मला शायद जब्त कर जातीपर देवीजी तो खुफिया पुलिस से सिपाही की भांति निर्मला का पीछा करती रहती थीं। अगर वह कोठे पर खड़ी हैतो अवश्य ही किसी पर निगाह डाल रही होगीमहरी से बातें करती है, तो अवश्य ही उनकी निन्दा करती होगी। बाजार से कुछ मंगवाती हैतो अवश्य कोई विलास वस्तु होगी। यह बराबर उसके पत्र पढ़ने की चेष्टा किया करती। छिप-छिपकर बातें सुना करती। निर्मला उनकी दोधरी तलवार से कांपती रहती थी। यहां तक कि उसने एक दिन पति से कहा-आप जरा जीजी को समझा दीजिएक्यों मेरे पीछे पड़ रहती हैं?

    तोताराम ने तेज होकर कह- तुम्हें कुछ कहा हैक्या?

    रोज ही कहती हैं। बात मुंह से निकालना मुश्किल है। अगर उन्हें इस बात की जलन हो कि यह मालकिन क्यों बनी हुई हैतो आप उन्हीं को रूपये-पैसे दीजियेमुझे न चाहियेयही मालकिन बनी रहें। मैं तो केवल इतना चाहती हूं कि कोई मुझे ताने-मेहने न दिया करे।

    यह कहते-कहते निर्मला की आंखों से आंसू बहने लगे। तोताराम को अपना प्रेम दिखाने का यह बहुत ही अच्छा मौका मिला। बोले-मैं आज ही उनकी खबर लूंगा। साफ कह दूंगामुंह बन्द करके रहना हैतो रहोनहीं तो अपनी राह लो। इस घर की स्वामिनी वह नहीं हैतुम हो। वह केवल तुम्हारी सहायता के लिए हैं। अगर सहायता करने के बदले तुम्हें दिक करती हैंतो उनके यहां रहने की जरूरत नहीं। मैंने सोचा था कि विधवा हैंअनाथ हैंपाव भर आटा खायेंगीपड़ी रहेंगी। जब और नौकर-चाकर खा रहे हैंतो वह तो अपनी बहिन ही है। लड़कों की देखभाल के लिए एक औरत की जरूरत भी थीरख लियालेकिन इसके यह माने नहीं कि वह तुम्हारे ऊपर शासन करें।

    निर्मला ने फिर कहा-लड़कों को सिखा देती हैं कि जाकर मां से पैसे मांगेकभी कुछ-कभी कुछ। लड़के आकर मेरी जान खाते हैं। घड़ी भर लेटना मुश्किल हो जाता है। डांटती हूंतो वह आखें लाल-पीली करके दौड़ती हैं। मुझे समझती हैं कि लड़कों को देखकर जलती है। ईश्वर जानते होंगे कि मैं बच्चों को कितना प्यार करती हूं। आखिर मेरे ही बच्चे तो हैं। मुझे उनसे क्यों जलन होने लगी?

    तोताराम क्रोध से कांप उठे। बोल-तुम्हें जो लड़का दिक करेउसे पीट दिया करो। मैं भी देखता हूं कि लौंडे शरीर हो गये हैं। मंसाराम को तो में बोर्डिंग हाउस में भेज दूंगा। बाकी दोनों को तो आज ही ठीक किये देता हूं।

    उस वक्त तोताराम कचहरी जा रहे थेडांट-डपट करने का मौका न थालेकिन कचहरी से लौटते ही उन्होंने घर में रुक्मिणी से कहा-क्यों बहिनतुम्हें इस घर में रहना है या नहीं? अगर रहना हैशान्त होकर रहो। यह क्या कि दूसरों का रहना मुश्किल कर दो।

    रुक्मिणी समझ गयीं कि बहू ने अपना वार कियापर वह दबने वाली औरत न थीं। एक तो उम्र में बड़ी तिस पर इसी घर की सेवा में जिन्दगी काट दी थी। किसकी मजाल थी कि उन्हें बेदखल कर दे! उन्हें भाई की इस क्षुद्रता पर आश्चर्य हुआ। बोलीं-तो क्या लौंडी बनाकर रखेगे? लौंडी बनकर रहना हैतो इस घर की लौंडी न बनूंगी। अगर तुम्हारी यह इच्छा हो कि घर में कोई आग लगा दे और मैं खड़ी देखा करूंकिसी को बेराह चलते देखूं; तो चुप साध लूंजो जिसके मन में आये करेमैं मिट्टी की देवी बनी रहूंतो यह मुझसे न होगा। यह हुआ क्याजो तुम इतना आपे से बाहर हो रहे हो? निकल गयी सारी बुद्धिमानीकल की लौंडिया चोटी पकड़कर नचाने लगी? कुछ पूछना न ताछना, बसउसने तार खींचा और तुम काठ के सिपाही की तरह तलवार निकालकर खड़े हो गये।

    तोता-सुनता हूंकि तुम हमेशा खुचर निकालती रहती होबात-बात पर ताने देती हो। अगर कुछ सीख देनी होतो उसे प्यार सेमीठे शब्दों में देनी चाहिये। तानों से सीख मिलने के बदले उलटा और जी जलने लगता है।

    रुक्मिणी-तो तुम्हारी यह मर्जी है कि किसी बात में न बोलूंयही सहीकिन फिर यह न कहनाकि तुम घर में बैठी थींक्यों नहीं सलाह दी। जब मेरी बातें जहर लगती हैंतो मुझे क्या कुत्ते ने काटा हैजो बोलूं? मसल है- नाटों खेतीबहुरियों घर। मैं भी देखूंबहुरिया कैसे कर चलाती है!

    इतने में सियाराम और जियाराम स्कूल से आ गये। आते ही आते दोनों बुआजी के पास जाकर खाने को मांगने लगे।

    रुक्मिणी ने कहा-जाकर अपनी नयी अम्मां से क्यों नहीं मांगतेमुझे बोलने का हुक्म नहीं है।

    तोता-अगर तुम लोगों ने उस घर में कदम रखातो टांग तोड़ दूंगा। बदमाशी पर कमर बांधी है।

    जियाराम जरा शोख था। बोला-उनको तो आप कुछ नहीं कहतेहमीं को धमकाते हैं। कभी पैसे नहीं देतीं।

    सियाराम ने इस कथन का अनुमोदन किया-कहती हैंमुझे दिक करोगे तो कान काट लूंगी। कहती है कि नहीं जिया?

    निर्मला अपने कमरे से बोली-मैंने कब कहा था कि तुम्हारे कान काट लूंगी अभी से झूठ बोलने लगे?

    इतना सुनना था कि तोताराम ने सियाराम के दोनों कान पकड़कर उठा लिया। लड़का जोर से चीख मारकार रोने लगा।

    रुक्मिणी ने दौड़कर बच्चे को मुंशीजी के हाथ से छुड़ा लिया और बोलीं- बसरहने भी दोक्या बच्चे को मार डालोगे? हाय-हाय! कान लाल हो गया। सच कहा हैनयी बीवी पाकर आदमी अन्धा हो जाता है। अभी से यह हाल हैतो इस घर के भगवान ही मालिक हैं।

    निर्मला अपनी विजय पर मन-ही-मन प्रसन्न हो रही थीलेकिन जब मुंशी जी ने बच्चे का कान पकड़कर उठा लियातो उससे न रहा गया। छुड़ाने को दौड़ीपर रुक्मिणी पहले ही पहुंच गयी थीं। बोलीं-पहले आग लगा दीअब बुझाने दौड़ी हो। जब अपने लड़के होंगेतब आंखें खुलेंगी। पराई पीर क्या जानो?

निर्मला- खड़े तो हैंपूछ लो नमैंने क्या आग लगा दी? मैंने इतना ही कहा था कि लड़के मुझे पैसों के लिए बार-बार दिक करते हैंइसके सिवाय जो मेरे मुंह से कुछ निकला होतो मेरे आंखें फूट जायें।

    तोता-मैं खुद इन लौंडों की शरारत देखा करता हूंअन्धा थोड़े ही हूं। तीनों जिद्दी और शरीर हो गये हैं। बड़े मियां को तो मैं आज ही होस्टल में भेजता हूं।

    रुक्मिणी-अब तक तुम्हें इनकी कोई शरारत न सूझी थीआज आंखें क्यों इतनी तेज हो गयीं?

    तोताराम- तुम्हीं न इन्हें इतना शोख कर रखा है।

    रुकमिणी- तो मैं ही विष की गांठ हूं। मेरे ही कारण तुम्हारा घर चौपट हो रहा है। लो मैं जाती हूंतुम्हारे लड़के हैंमारो चाहे काटोन बोलूंगी।

    यह कहकर वह वहां से चली गयीं। निर्मला बच्चे को रोते देखकर विहृल हो उठी। उसने उसे छाती से लगा लिया और गोद में लिए हुए अपने कमरे में लाकर उसे चुमकारने लगीलेकिन बालक और भी सिसक-सिसक कर रोने लगा। उसका अबोध हृदय इस प्यार में वह मातृ-स्नेह न पाता था, जिससे दैव ने उसे वंचित कर दिया था। यह वात्सल्य न थाकेवल दया थी। यह वह वस्तु थीजिस पर उसका कोई अधिकार न थाजो केवल भिक्षा के रूप में उसे दी जा रही थी। पिता ने पहले भी दो-एक बार मारा थाजब उसकी मां जीवित थीलेकिन तब उसकी मां उसे छाती से लगाकर रोती न थी। वह अप्रसन्न होकर उससे बोलना छोड़ देतीयहां तक कि वह स्वयं थोड़ी ही देर के बाद कुछ भूलकर फिर माता के पास दौड़ा जाता था। शरारत के लिए सजा पाना तो उसकी समझ में आता थालेकिन मार खाने पार चुमकारा जाना उसकी समझ में न आता था। मातृ-प्रेम में कठोरता होती थीलेकिन मृदुलता से मिली हुई। इस प्रेम में करूणा थीपर वह कठोरता न थीजो आत्मीयता का गुप्त संदेश है। स्वस्थ अंग की पारवाह कौन करता है? लेकिन वही अंग जब किसी वेदना से टपकने लगता हैतो उसे ठेस और घक्के से बचाने का यत्न किया जाता है। निर्मला का करूण रोदन बालक को उसके अनाथ होने की सूचना दे रहा था। वह बड़ी देर तक निर्मला की गोद में बैठा रोता रहा और रोते-रोते सो गया। निर्मला ने उसे चारपाई पर सुलाना चाहातो बालक ने सुषुप्तावस्था में अपनी दोनों कोमल बाहें उसकी गर्दन में डाल दीं और ऐसा चिपट गयामानो नीचे कोई गढ़ा हो। शंका और भय से उसका मुख विकृत हो गया। निर्मला ने फिर बालक को गोद में उठा लियाचारपाई पर न सुला सकी। इस समय बालक को गोद में लिये हुए उसे वह तुष्टि हो रही थीजो अब तक कभी न हुई थीआज पहली बार उसे आत्मवेदना हुईजिसके ना आंख नहीं खुलतीअपना कर्त्तव्य-मार्ग नहीं समझता। वह मार्ग अब दिखायी देने लगा।

 

छह

 

स दिन अपने प्रगाढ़ प्रणय का सबल प्रमाण देने के बाद मुंशी तोताराम को आशा हुई थी कि निर्मला के मर्म-स्थल पर मेरा सिक्का जम जायेगालेकिन उनकी यह आशा लेशमात्र भी पूरी न हुई बल्कि पहले तो वह कभी-कभी उनसे हंसकर बोला भी करती थीअब बच्चों ही के लालन-पालन में व्यस्त रहने लगी। जब घर आते, बच्चों को उसके पास बैठे पाते। कभी देखते कि उन्हें ला रही हैकभी कपड़े पहना रही हैकभी कोई खेलखेला रही है और कभी कोई कहानी कह रही है। निर्मला का तृषित हृदय प्रणय की ओर से निराश होकर इस अवलम्ब ही को गनीमत समझने लगाबच्चों के साथ हंसने-बोलने में उसकी मातृ-कल्पना तृप्त होती थीं। पति के साथ हंसने-बोलने में उसे जो संकोचजो अरुचि तथा जो अनिच्छा होती थीयहां तक कि वह उठकर भाग जाना चाहती, उसके बदले बालकों के सच्चेसरल स्नेह से चित्त प्रसन्न हो जाता था। पहले मंसाराम उसके पास आते हुए झिझकता थालेकिन मानसिक विकास में पांच साल छोटा। हॉकी और फुटबाल ही उसका संसारउसकी कल्पनाओं का मुक्त-क्षेत्र तथा उसकी कामनाओं का हरा-भरा बाग था। इकहरे बदन का छरहरासुन्दरहंसमुखलज्जशील बालक थाजिसका घर से केवल भोजन का नाता थाबाकी सारे दिन न जाने कहां घूमा करता। निर्मला उसके मुंह से खेल की बातें सुनकर थोड़ी देर के लिए अपनी चिन्ताओं को भूल जाती और चाहती थी एक बार फिर वही दिन आ जातेजब वह गुड़िया खेलती और उसके ब्याह रचाया करती थी और जिसे अभी थोड़े आहबहुत ही थोड़े दिन गुजरे थे।

    मुंशी तोताराम अन्य एकान्त-सेवी मनुष्यों की भांति विषयी जीव थे। कुछ दिनों तो वह निर्मला को सैर-तमाशे दिखाते रहेलेकिन जब देखा कि इसका कुछ फल नहीं होतातो फिर एकान्त-सेवन करने लगे। दिन-भर के कठिन मासिक परिश्रम के बाद उनका चित्त आमोद-प्रमोद के लिए लालयित हो जातालेकिन जब अपनी विनोद-वाटिका में प्रवेश करते और उसके फूलों को मुरझायापौधों को सूखा और क्यारियों से धूल उड़ती हुई देखतेतो उनका जी चाहता-क्यों न इस वाटिका को उजाड़ दूं? निर्मला उनसे क्यों विरक्त रहती हैइसका रहस्य उनकी समझ में न आता था। दम्पति शास्त्र के सारे मन्त्रों की परीक्षा कर चुकेपर मनोरथ पूरा न हुआ। अब क्या करना चाहियेयह उनकी समझ में न आता था।

    एक दिन वह इसी चिंता में बैठे हुए थे कि उनके सहपाठी मित्र नयनसुखराम आकर बैठ गये और सलाम-वलाम के बाद मुस्कराकर बोले-आजकल तो खूब गहरी छनती होगी। नयी बीवी का आलिंगन करके जवानी का मजा आ जाता होगा? बड़े भाग्यवान हो! भई रूठी हुई जवानी को मनाने का इससे अच्छा कोई उपाय नहीं कि नया विवाह हो जाये। यहां तो जिन्दगी बवाल हो रही है। पत्नी जी इस बुरी तरह चिमटी हैं कि किसी तरह पिण्ड ही नहीं छोड़ती। मैं तो दूसरी शादी की फिक्र में हूं। कहीं डौल होतो ठीक-ठाक कर दो। दस्तूरी में एक दिन तुम्हें उसके हाथ के बने हुए पान खिला देंगे।

    तोताराम ने गम्भीर भाव से कहा-कहीं ऐसी हिमाकत न कर बैठनानहीं तो पछताओगे। लौंडियां तो लौंडों से ही खुश रहती हैं। हम तुम अब उस काम के नहीं रहे। सच कहता हूं मैं तो शादी करके पछता रहा हूंबुरी बला गले पड़ी! सोचा थादो-चार साल और जिन्दगी का मजा उठा लूंपर उलटी आंतें गले पड़ीं।

    नयनसुख-तुम क्या बातें करते हो। लौडियों को पंजों में लाना क्या मुश्किल बात हैजरा सैर-तमाशे दिखा दोउनके रूप-रंग की तारीफ कर दोबसरंग जम गया।

    तोता-यह सब कुछ कर-धरके हार गया।

    नयन-अच्छाकुछ इत्र-तेलफूल-पत्तेचाट-वाट का भी मजा चखाया?

    तोता-अजीयह सब कर चुका। दम्पत्ति-शास्त्र के सारे मन्त्रों का इम्तहान ले चुकासब कोरी गप्पे हैं।

    नयन-अच्छातो अब मेरी एक सलाह मानोजरा अपनी सूरत बनवा लो। आजकल यहां एक बिजली के डॉक्टर आये हुए हैंजो बुढ़ापे के सारे निशान मिटा देते हैं। क्या मजाल कि चेहरे पर एक झुर्रीया या सिर का बाल पका रह जाये। न जाने क्या जादू कर देते हैं कि आदमी का चोला ही बदल जाता है।

    तोता-फीस क्या लेते हैं?

    नयन-फीस तो सुना हैशायद पांच सौ रूपये!

    तोता-अजीकोई पाखण्डी होगाबेवकूफों को लूट रहा होगा। कोई रोगन लगाकर दो-चार दिन के लिए जरा चेहरा चिकना कर देता होगा। इश्तहारी डॉक्टरों पर तो अपना विश्वास ही नहीं। दस-पांच की बात होतीतो कहताजरा दिल्लगी ही सही। पांच सौ रूपये बड़ी रकम है।

    नयन-तुम्हारे लिए पांच सौ रूपये कौन बड़ी बात है। एक महीने की आमदनी है। मेरे पास तो भाई पांच सौ रूपये होतेतो सबसे पहला काम यही करता। जवानी के एक घण्टे की कीमत पांच सौ रूपये से कहीं ज्यादा है।

    तोता-अजीकोई सस्ता नुस्खा बताओकोई फकीरी जुड़ी-बूटी जो कि बिना हर्र-फिटकरी के रंग चीखा हो जाये। बिजली और रेडियम बड़े आदमियों के लिए रहने दो। उन्हीं को मुबारक हो।

    नयन-तो फिर रंगीलेपन का स्वांग रचो। यह ढीला-ढाला कोट फेंकोंतंजेब की चुस्त अचकन हो, चुन्नटदार पाजामागले में सोने की जंजीर पड़ी हुईसिर पर जयपुरी साफा बांधा हुआ, आंखों में सुरमा और बालों में हिना का तेल पड़ा हुआ। तोंद का पिचकना भी जरूरी है। दोहरा कमरबन्द बांधे। जरा तकलीफ तो होगीपार अचकन सज उठेगी। खिजाब मैं ला दूंगा। सौ-पचास गजलें याद कर लो और मौके-मौके से शेर पढ़ी। बातों में रस भरा हो। ऐसा मालूम हो कि तुम्हें दीन और दुनिया की कोई फिक्र नहीं हैबसजो कुछ हैप्रियतमा ही है। जवांमर्दी और साहस के काम करने का मौका ढूंढते रहो। रात को झूठ-मूठ शोर करो-चोर-चोर और तलवार लेकर अकेले पिल पड़ो। हांजरा मौका देख लेनाऐसा न हो कि सचमुच कोई चोर आ जाये और तुम उसके पीछे दौड़ोनहीं तो सारी कलई खुल जायेगी और मुफ्त के उल्लू बनोगे। उस वक्त तो जवांमर्दी इसी में है कि दम साधे खड़े रहोजिससे वह समझे कि तुम्हें खबर ही नहीं हुईलेकिन ज्योंही चोर भाग खड़ा होतुम भी उछलकर बाहर निकलो और तलवार लेकर कहां? कहां?’ कहते दौड़ो। ज्यादा नहींएक महीना मेरी बातों का इम्तहान करके देखें। अगर वह तुम्हारी दम न भरने लगेतो जो जुर्माना कहोवह दूं।

    तोताराम ने उस वक्त तो यह बातें हंसी में उड़ा दींजैसा कि एक व्यवहार कुशल मनुष्य को करना चहिए थालेकिन इसमें की कुछ बातें उसके मन में बैठ गयी। उनका असर पड़ने में कोई संदेह न था। धीरे-धीरे रंग बदलने लगेजिसमें लोग खटक न जायें। पहले बालों से शुरू कियाफिर सुरमे की बारी आयीयहां तक कि एक-दो महीने में उनका कलेवर ही बदल गया। गजलें याद करने का प्रस्ताव तो हास्यास्पद थालेकिन वीरता की डींग मारने में कोई हानि न थी।

    उस दिन से वह रोज अपनी जवांमर्दी का कोई-न-कोई प्रसंग अवश्य छेड़ देते। निर्मला को सन्देह होने लगा कि कहीं इन्हें उन्माद का रोग तो नहीं हो रहा है। जो आदमी मूंग की दाल और मोटे आटे के दो फुलके खाकर भी नमक सुलेमानी का मुहताज होउसके छैलेपन पर उन्माद का सन्देह होतो आश्चर्य ही क्या? निर्मला पर इस पागलपन का और क्या रंग जमता? हों उसे उन पार दया आजे लगी। क्रोध और घृणा का भाव जाता रहा। क्रोध और घृणा उन पर होती हैजो अपने होश में होपागल आदमी तो दया ही का पात्र है। वह बात-बात में उनकी चुटकियां लेतीउनका मजाक उड़ातीजैसे लोग पागलों के साथ किया करते हैं। हांइसका ध्यान रखती थी कि वह समझ न जायें। वह सोचतीबेचारा अपने पाप का प्रायश्चित कर रहा है। यह सारा स्वांग केवल इसलिए तो है कि मैं अपना दु:ख भूल जाऊं।  आखिर अब भाग्य तो बदल सकता नहींइस बेचारे को क्यों जलाऊं?

एक दिन रात को नौ बजे तोताराम बांके बने हुए सैर करके लौटे और निर्मला से बोले-आज तीन चोरों से सामना हो गया। जरा शिवपुर की तरफ चला गया था। अंधेरा था ही। ज्योंही रेल की सड़क के पास पहुंचातो तीन आदमी तलवार लिए हुए न जाने किधर से निकल पड़े। यकीन मानोतीनों काले देव थे। मैं बिल्कुल अकेलापास में सिर्फ यह छड़ी थी। उधर तीनों तलवार बांधे हुएहोश उड़ गये। समझ गया कि जिन्दगी का यहीं तक साथ थामगर मैंने भी सोचामरता ही हूंतो वीरों की मौत क्यों न मरुं। इतने में एक आदमी ने ललकार कर कहा-रख दे तेरे पास जो कुछ हो और चुपके से चला जा।

    मैं छड़ी संभालकर खड़ा हो गया और बोला-मेरे पास तो सिर्फ यह छड़ी है और इसका मूल्य एक आदमी का सिर है।

    मेरे मुंह से इतना निकलना था कि तीनों तलवार खींचकर मुझ पर झपट पड़े और मैं उनके वारों को छड़ी पर रोकने लगा। तीनों झल्ला-झल्लाकर वार करते थेखटाके की आवाज होती थी और मैं बिजली की तरह झपटकर उनके तारों को काट देता था। कोई दस मिनट तक तीनों ने खूब तलवार के जौहर दिखायेपर मुझ पर रेफ तक न आयी। मजबूरी यही थी कि मेरे हाथ में तलवार न थी। यदि कहीं तलवार होतीतो एक को जीता न छोड़ता। खैरकहां तक बयान करुं। उस वक्त मेरे हाथों की सफाई देखने काबिल थी। मुझे खुद आश्चर्य हो रहा था कि यह चपलता मुझमें कहां से आ गयी। जब तीनों ने देखा कि यहां दाल नहीं गलने कीतो तलवार म्यान में रख ली और पीठ ठोककर बोले-जवानतुम-सा वीर आज तक नहीं देखा। हम तीनों तीन सौ पर भारी गांव-के-गांव ढोल बजाकर लूटते हैंपर आज तुमने हमें नीचा दिखा दिया। हम तुम्हारा लोहा मान गए। यह कहकर तीनों फिर नजरों से गायब हो गए।

    निर्मला ने गम्भीर भाव से मुस्कराकर कहा-इस छड़ी पर तो तलवार के बहुत से निशान बने हुए होंगे?

    मुंशीजी इस शंका के लिए तैयार न थेपर कोई जवाब देना आवश्यक थाबोले-मैं वारों को बराबर खाली कर देता। दो-चार चोटें छड़ी पर पड़ीं भीतो उचटती हुईजिनसे कोई निशान नहीं पड़ सकता था।

    अभी उनके मुंह से पूरी बात भी न निकली थी कि सहसा रुक्मिणी देवी बदहवास दौड़ती हुई आयीं और हांफते हुए बोलीं-तोता है कि नहीं? मेरे कमरे में सांप निकल आया है। मेरी चारपाई के नीचे बैठा हुआ है। मैं उठकर भागी। मुआ कोई दो गज का होगा। फन निकाले फुफकार रहा हैजरा चलो तो। डंडा लेते चलना।

    तोताराम के चेहरे का रंग उड़ गयामुंह पर हवाइयां छुटने लगींमगर मन के भावों को छिपाकर बोले-सांप यहां कहां? तुम्हें धोखा हुआ होगा। कोई रस्सी होगी।

    रुक्मिणी-अरेमैंने अपनी आंखों देखा है। जरा चलकर देख लो न। हैंहैं। मर्द होकर डरते हो?

    मुंशीजी घर से तो निकलेलेकिन बरामदे में फिर ठिठक गये। उनके पांव ही न उठते थे कलेजा धड़-धड़ कर रहा था। सांप बड़ा क्रोधी जानवर है। कहीं काट ले तो मुफ्त में प्राण से हाथ धोना पड़े। बोले-डरता नहीं हूं। सांप ही तो हैशेर तो नहींमगर सांप पर लाठी नहीं असर करतीजाकर किसी को भेजूंकिसी के घर से भाला लाये।

    यह कहकर मुंशीजी लपके हुए बाहर चले गये। मंसाराम बैठा खाना खा रहा था। मुंशीजी तो बाहर चले गयेइधर वह खाना छोड़अपनी हॉकी का डंडा हाथ में लेकमरे में घुस ही तो पड़ा और तुरंत चारपाई खींच ली। सांप मस्त थाभागने के बदले फन निकालकर खड़ा हो गया। मंसाराम ने चटपट चारपाई की चादर उठाकर सांप के ऊपर फेंक दी और ताबड़तोड़ तीन-चार डंडे कसकर जमाये। सांप चादर के अंदर तड़प कर रह गया। तब उसे डंडे पर उठाये हुए बाहर चला। मुंशीजी कई आदमियों को साथ लिये चले आ रहे थे। मंसाराम को सांप लटकाये आते देखातो सहसा उनके मुंह से चीख निकल पड़ीमगर फिर संभल गये और बोले-मैं तो आ ही रहा थातुमने क्यों जल्दी की? दे दोकोई फेंक आए।

    यह कहकर बहादुरी के साथ रुक्मिणी के कमरे के द्वार पर जाकर खड़े हो गये और कमरे को खूब देखभाल कर मूंछों पर ताव देते हुए निर्मला के पास जाकर बोले-मैं जब तक आऊं-जाऊं, मंसाराम ने मार डाला। बेसमझ् लड़का डंडा लेकर दौड़ पड़ा। सांप हमेशा भाले से मारना चाहिए। यही तो लड़कों में ऐब है। मैंने ऐसे-ऐसे कितने सांप मारे हैं। सांप को खिला-खिलाकर मारता हूं। कितनों ही को मुट्ठी से पकड़कर मसल दिया है।

    रुक्मिणी ने कहा-जाओ भीदेख ली तुम्हारी मर्दानगी।

    मुंशीजी झेंपकर बोले-अच्छा जाओमैं डरपोक ही सहीतुमसे कुछ इनाम तो नहीं मांग रहा हूं। जाकर महाराज से कहाखाना निकाले।

    मुंशीजी तो भोजन करने गये और निर्मला द्वार की चौखट पर खड़ी सोच रही थी-भगवान्। क्या इन्हें सचमुच कोई भीषण रोग हो रहा है? क्या मेरी दशा को और भी दारुण बनाना चाहते हो? मैं इनकी सेवा कर सकती हूंसम्मान कर सकी हूंअपना जीवन इनके चरणों पर अर्पण कर सकती हूंलेकिन वह नहीं कर सकतीजो मेरे किये नहीं हो सकता। अवस्था का भेद मिटाना मेरे वश की बात नहीं । आखिर यह मुझसे क्या चाहते हैं-समझ् गयी। आह यह बात पहले ही नहीं समझी थीनहीं तो इनको क्यों इतनी तपस्या करनी पड़ती क्यों इतने स्वांग भरने पड़ते।

 

सात

 

स दिन से निर्मला का रंग-ढंग बदलने लगा। उसने अपने को कर्त्तव्य पर मिटा देने का निश्चय कर दिया। अब तक नैराश्य के संताप में उसने कर्त्तव्य पर ध्यान ही न दिया था उसके हृदय में विप्लव की ज्वाला-सी दहकती रहती थीजिसकी असह्य वेदना ने उसे संज्ञाहीन-सा कर रखा था। अब उस वेदना का वेग शांत होने लगा। उसे ज्ञात हुआ कि मेरे लिए जीवन का कोई आंनद नहीं। उसका स्वप्न देखकर क्यों इस जीवन को नष्ट करुं। संसार में सब-के-सब प्राणी सुख-सेज ही पर तो नहीं सोते। मैं भी उन्हीं अभागों में से हूं। मुझे भी विधाता ने दुख की गठरी ढोने के लिए चुना है। वह बोझ सिर से उतर नहीं सकता। उसे फेंकना भी चाहूंतो नहीं फेंक सकती। उस कठिन भार से चाहे आंखों में अंधेरा छा जायेचाहे गर्दन टूटने लगेचाहे पैर उठाना दुस्तर हो जायेलेकिन वह गठरी ढोनी ही पड़ेगी ? उम्र भर का कैदी कहां तक रोयेगा? रोये भी तो कौन देखता है?  किसे उस पर दया आती है? रोने से काम में हर्ज होने के कारण उसे और यातनाएं ही तो सहनी पड़ती हैं।

    दूसरे दिन वकील साहब कचहरी से आये तो देखा-निर्मला की सहास्य मूर्ति अपने कमरे के द्वार पर खड़ी है। वह अनिन्द्य छवि देखकर उनकी आंखें तृप्त हा गयीं। आज बहुत दिनों के बाद उन्हें यह कमल खिला हुआ दिखलाई दिया। कमरे में एक बड़ा-सा आईना दीवार में लटका हुआ था। उस पर एक परदा पड़ा रहता था। आज उसका परदा उठा हुआ था। वकील साहब ने कमरे में कदम रखातो शीशे पर निगाह पड़ी। अपनी सूरत साफ-साफ दिखाई दी। उनके हृदय में चोट-सी लग गयी। दिन भर के परिश्रम से मुख की कांति मलिन हो गयी थीभांति-भांति के पौष्टिक पदार्थ खाने पर भी गालों की झुर्रियां साफ दिखाई दे रही थीं। तोंद कसी होने पर भी किसी मुंहजोर घोड़े की भांति बाहर निकली हुई थी। आईने के ही सामने किन्तू दूसरी ओर ताकती हुई निर्मला भी खड़ी हुई थी। दोनों सूरतों में कितना अंतर था। एक रत्न जटित विशाल भवनदूसरा टूटा-फूटा खंडहर। वह उस आईने की ओर न देख सके। अपनी यह हीनावस्था उनके लिए असह्य थी। वह आईने के सामने से हट गयेउन्हें अपनी ही सूरत से घृणा होने लगी। फिर इस रूपवती

कामिनी का उनसे घृणा करना कोई आश्चर्य की बात न थी। निर्मला की ओर ताकने का भी उन्हें साहस न हुआ। उसकी यह अनुपम छवि उनके हृदय का शूल बन गयी।

    निर्मला ने कहा-आज इतनी देर कहां लगायी? दिन भर राह देखते-देखते आंखे फूट जाती हैं।

    तोताराम ने खिड़की की ओर ताकते हुए जवाब दिया-मुकदमों के मारे दम मारने की छुट्टी नहीं मिलती। अभी एक मुकदमा और थालेकिन मैं  सिरदर्द का बहाना करके भाग खड़ा हुआ।

    निर्मला-तो क्यों इतने मुकदमे लेते हो? काम उतना ही करना चाहिए जितना आराम से हो सके। प्राण देकर थोड़े ही काम किया जाता है। मत लिया करोबहुत मुकदमे। मुझे रुपयों का लालच नहीं। तुम आराम से रहोगेतो रुपये बहुत मिलेंगे।

    तोताराम-भईआती हुई लक्ष्मी भी तो नहीं ठुकराई जाती।

    निर्मला-लक्ष्मी अगर रक्त और मांस की भेंट लेकर आती हैतो उसका न आना ही अच्छा। मैं धन की भूखी नहीं हूं।

    इस वक्त मंसाराम भी स्कूल से लौटा। धूप में चलने के कारण मुख पर पसीने की बूंदे आयी हुई थींगोरे मुखड़े पर खून की लाली दौड़ रही थीआंखों से ज्योति-सी निकलती मालूम होती थी। द्वार पर खड़ा होकर बोला-अम्मां जीलाइएकुछ खाने का निकालिएजरा खेलने जाना है।

    निर्मला जाकर गिलास में पानी लाई और एक तश्तरी में कुछ मेवे रखकर मंसाराम को दिए। मंसाराम जब खाकर चलने लगातो निर्मला ने पूछा-कब तक आओगे?

    मंसाराम-कह नहीं सकतागोरों के साथ हॉकी का मैच है। बारक यहां से बहुत दूर है।

    निर्मला-भईजल्द आना। खाना ठण्डा हो जायेगातो कहोगे मुझे भूख नहीं है।

    मंसाराम ने निर्मला की ओर सरल स्नेह भाव से देखकर कहा-मुझे देर हो जाये तो समझ लीजिएगा, वहीं खा रहा हूं। मेरे लिए बैठने की जरुरत नहीं।

    वह चला गयातो निर्मला बोली-पहले तो घर में आते ही न थेमुझसे बोलते शर्माते थे। किसी चीज की जरुरत होतीतो बाहर से ही मंगवा भेजते। जब से मैंनें बुलाकर कहातब से आने लगे हैं।

    तोताराम ने कुछ चिढ़कर कहा-यह तुम्हारे पास खाने-पीने की चीजें मांगने क्यों आता है? दीदी से क्यों नही कहता?

    निर्मला ने यह बात प्रशंसा पाने के लोभ से कही थी। वह यह दिखाना चाहती थी कि मैं तुम्हारे लड़कों को कितना चाहती हूं। यह कोई बनावटी प्रेम न था। उसे लड़कों से सचमुच स्नेह था। उसके चरित्र में अभी तक बाल-भाव ही प्रधान थाउसमें वही उत्सुकतावही चंचलतावही विनोदप्रियता विद्यमान थी और बालकों के साथ उसकी ये बालवृत्तियां प्रस्फुटित होती थीं। पत्नी-सुलभ ईर्ष्या अभी तक उसके मन में उदय नहीं हुई थीलेकिन पति के प्रसन्न होने के बदले नाक-भौं सिकोड़ने का आशय न समझ्कर बोली-मैं क्या जानूंउनसे क्यों नहीं मांगते? मेरे पास आते हैंतो दुत्कार नहीं देती। अगर ऐसा करुंतो यही होगा कि यह लड़कों को देखकर जलती है।

    मुंशीजी ने इसका कुछ जवाब न दियालेकिन आज उन्होंने  मुवक्किलों से बातें नहीं कींसीधे मंसाराम के पास गये और उसका इम्तहान लेने लगे। यह जीवन में पहला ही अवसर था कि इन्होंने मंसाराम या किसी लड़के की शिक्षोन्नति के विषय में इतनी दिलचस्पी दिखायी हो। उन्हें अपने काम से सिर उठाने की फुरसत ही न मिलती थी। उन्हें इन विषयों को पढ़े हुए चालीस वर्ष के लगभग हो गये थे। तब से उनकी ओर आंख तक न उठायी थी। वह कानूनी पुस्तकों और पत्रों के सिवा और कुछ पड़ते ही न थे। इसका समय ही न मिलतापर आज उन्हीं विषयों में मंसाराम की परीक्षा लेने लगे। मंसाराम जहीन था और इसके साथ ही मेहनती भी था। खेल में भी टीम का कैप्टन होने पर भी वह क्लास में प्रथम रहता था। जिस पाठ को एक बार देख लेतापत्थर की लकीर हो जाती थी। मुंशीजी को उतावली में ऐसे मार्मिक प्रश्न तो सूझे नहींजिनके उत्तर देने में चतुर लड़के को भी कुछ सोचना पड़ता और ऊपरी प्रश्नों को मंसाराम से चुटकियों में उड़ा दिया। कोई सिपाही अपने शत्रु पर वार खाली जाते देखकर जैसे झल्ला-झल्लाकर और भी तेजी से वार करता हैउसी भांति मंसाराम के जवाबों को सुन-सुनकर वकील साहब भी झल्लाते थे। वह कोई ऐसा प्रश्न करना चाहते थेजिसका जवाब मंसाराम से न बन पड़े। देखना चाहते थे कि इसका कमजोर पहलू कहां है। यह देखकर अब उन्हें संतोष न हो सकता था कि वह क्या करता है। वह यह देखना चाहते थे कि यह क्या नहीं कर सकता। कोई अभ्यस्त परीक्षक मंसाराम की कमजोरियों को आसानी से दिखा देतापर वकील साहब अपनी आधी शताब्दी की भूली हुई शिक्षा के आधार पर इतने सफल कैसे होते? अंत में उन्हें अपना गुस्सा उतारने के लिए कोई बहाना न मिला तो बोले-मैं देखता हूंतुम सारे दिन इधर-उधर मटरगश्ती किया करते होमैं तुम्हारे चरित्र को तुम्हारी बुद्धि से बढ़कर समझता हूं और तुम्हारा यों आवारा घूमना मुझे कभी गवारा नहीं हो सकता।

    मंसाराम ने निर्भीकता से कहा-मैं शाम को एक घण्टा खेलने के लिए जाने के सिवा दिन भर कहीं नहीं जाता। आप अम्मां या बुआजी से पूछ लें। मुझे खुद इस तरह घूमना पसंद नहीं। हां, खेलने के लिए हेड मास्टर साहब से आग्रह करके बुलाते हैंतो मजबूरन जाना पड़ता है। अगर आपको मेरा खेलने जाना पसंद नहीं हैतो कल से न जाऊंगा।

    मुंशीजी ने देखा कि बातें दूसरी ही रुख पर जा रही हैंतो तीव्र स्वर में बोले-मुझे इस बात का इतमीनान क्योंकर हो कि खेलने के सिवा कहीं नहीं घूमने जाते? मैं बराबर शिकायतें सुनता हूं।

    मंसाराम ने उत्तेजित होकर कहा-किन महाशय ने आपसे यह शिकायत की हैजरा मैं भी तो सुनूं?

    वकील-कोई होइससे तुमसे कोई मतलब नहीं। तुम्हें इतना विश्वास होना चाहिए कि मैं झूठा आक्षेप नहीं करता।

    मंसाराम-अगर मेरे सामने कोई आकर कह दे कि मैंने इन्हें कहीं घूमते देखा है, तो मुंह न दिखाऊं।

    वकील-किसी को ऐसी क्या गरज पड़ी है कि तुम्हारी मुंह पर तुम्हारी शिकायत करे और तुमसे बैर मोल ले? तुम अपने दो-चार साथियों को लेकर उसके घर की खपरैल फोड़ते फिरो। मुझसे इस किस्म की शिकायत एक आदमी ने नहींकई आदमियों ने की है और कोई वजह नहीं है कि मैं अपने दोस्तों की बात पर विश्वास न करुं। मैं चाहता हूं कि तुम स्कूल ही में रहा करो।

    मंसाराम ने मुंह गिराकर कहा-मुझे वहां रहने में कोई आपत्ति नहीं हैजब से कहियेचला जाऊं।

    वकील- तुमने मुंह क्यों लटका लिया? क्या वहां रहना अच्छा नहीं लगता? ऐसा मालूम होता हैमानों वहां जाने के भय से तुम्हारी नानी मरी जा रही है। आखिर बात क्या हैवहां तुम्हें क्या तकलीफ होगी?

    मंसाराम छात्रालय में रहने के लिए उत्सुक नहीं थालेकिन जब मुंशीजी ने यही बात कह दी और इसका कारण पूछासो वह अपनी झेंप मिटाने के लिए प्रसन्नचित्त होकर बोला-मुंह क्यों लटकाऊं? मेरे लिए जैसे बोर्डिंग हाउस। तकलीफ भी कोई नहींऔर हो भी तो उसे सह सकता हूं। मैं कल से चला जाऊंगा। हां अगर जगह न खाली हुई तो मजबूरी है।

    मुंशीजी वकील थे। समझ गये कि यह लौंडा कोई ऐसा बहाना ढूंढ रहा हैजिसमें मुझे वहां जाना भी न पड़े और कोई इल्जाम भी सिर पर न आये। बोले-सब लड़कों के लिए जगह है तुम्हारे ही लिये जगह न होगी?

    मंसाराम- कितने ही लड़कों को जगह नहीं मिली और वे बाहर किराये के मकानों में पड़े हुए हैं। अभी बोर्डिंग हाउस में एक लड़के का नाम कट गया थातो पचास अर्जियां उस जगह के लिए आयी थीं।

    वकील साहब ने ज्यादा तर्क-वितर्क करना उचित नहीं समझा। मंसाराम को कल तैयार रहने की आज्ञा देकर अपनी बग्घी तैयार करायी और सैर करने चल गये। इधर कुछ दिनों से वह शाम को प्राय: सैर करने चले जाया करते थे। किसी अनुभवी प्राणी ने बतलाया था कि दीर्घ जीवन के लिए इससे बढ़कर कोई मंत्र नहीं है। उनके जाने के बाद मंसाराम आकर रुक्मिणी से बोला बुआजीबाबूजी ने मुझे कल से स्कूल में रहने को कहा है।

    रुक्मिणी ने विस्मित होकर पूछा-क्यों?

    मंसाराम-मैं क्या जानू? कहने लगे कि तुम यहां आवारों की तरह इधर-उधर फिरा करते हो।

    रुक्मिणी-तूने कहा नहीं कि मैं कहीं नहीं जाता।

    मंसाराम-कहा क्यों नहींमगर वह जब मानें भी।

    रुक्मिणी-तुम्हारी नयी अम्मा जी की कृपा होगी और क्या?

    मंसाराम-नहींबुआजीमुझे उन पर संदेह नहीं हैवह बेचारी भूल से कभी कुछ नहीं कहतीं। कोई चीज़ मांगने जाता हूंतो तुरन्त उठाकर दे देती हैं।

    रुक्मिणी-तू यह त्रिया-चरित्र क्या जानेयह उन्हीं की लगाई हुई आग है। देख, मैं जाकर पूछती हूं।

    रुक्मिणी झल्लाई हुई निर्मला के पास जा पहुंची। उसे आड़े हाथों लेने काकांटों में घसीटने कातानों से छेदने कारुलाने का सुअवसर वह हाथ से न जाने देती थी। निर्मला उनका आदर करती थीउनसे दबती थीउनकी बातों का जवाब तक न देती थी। वह चाहती थी कि यह सिखावन की बातें कहेंजहां मैं भूलूं वहां सुधारेंसब कामों की देख-रेख करती रहेंपर रुक्मिणी उससे तनी ही रहती थी।

    निर्मला चारपाई से उठकर बोली-आइए दीदीबैठिए।

    रुक्मिणी ने खड़े-खड़े कहा-मैं पूछती हूं क्या तुम सबको घर से निकालकर अकेले ही रहना चाहती हो?

    निर्मला ने कातर भाव से कहा-क्या हुआ दीदी जी? मैंने तो किसी से कुछ नहीं कहा।

    रुक्मिणी-मंसाराम को घर से निकाले देती होतिस पर कहती होमैंने तो किसी से कुछ नहीं कहा। क्या तुमसे इतना भी देखा नहीं जाता?

    निर्मला-दीदी जीतुम्हारे चरणों को छूकर कहती हूंमुझे कुछ नहीं मालूम। मेरी आंखे फूट जायेंअगर उसके विषय में मुंह तक खोला हो।

    रुक्मिणी-क्यों व्यर्थ कसमें खाती हो। अब तक तोताराम कभी लड़के से नहीं बोलते थे। एक हफ्ते के लिए मंसाराम ननिहाल चला गया थातो इतने घबराए कि खुद जाकर लिवा लाए। अब इसी मंसाराम को घर से निकालकर स्कूल में रखे देते हैं। अगर लड़के का बाल भी बांका हुआतो तुम जानोगी। वह कभी बाहर नहीं रहाउसे न खाने की सुध रहती हैन पहनने की-जहां बैठतावहीं सो जाता है। कहने को तो जवान हो गयापर स्वभाव बालकों-सा है। स्कूल में उसकी मरन हो जायेगी। वहां किसे फिक्र है कि इसने खोया या नहींकहां कपड़े उतारेकहां सो रहा है। जब घर में कोई पूछने वाला नहींतो बाहर कौन पूछेगा मैंने तुम्हें चेता दियाआगे तुम जानोतुम्हारा काम जाने।

    यह कहकर रुक्मिणी वहां से चली गयी।

    वकील साहब सैर करके लौटेतो निर्मला न तुरंत यह विषय छेड़ दिया-मंसाराम से वह आजकल थोड़ी अंग्रेजी पढ़ती थी। उसके चले जाने पर फिर उसके पढ़ने का हरज न होगा? दूसरा कौन पढ़ायेगा? वकील साहब को अब तक यह बात न मालूम थी। निर्मला ने सोचा था कि जब कुछ अभ्यास हो जायेगातो वकील साहब को एक दिन अंग्रेजी में बातें करके चकित कर दूंगी। कुछ थोड़ा-सा ज्ञान तो उसे अपने भाइयों से ही हो गया था। अब वह नियमित रूप से पढ़ रही थी। वकील साहब की छाती पर सांप-सा लोट गयात्योरियां बदलकर बोले-वे कब से पढ़ा रहा हैतुम्हें। मुझसे तुमने कभी नही कहा।

    निर्मला ने उनका यह रूप केवल एक बार देखा थाजब उन्होने सियाराम को मारते-मारते बेदम कर दिया था। वही रूप और भी विकराल बनकर आज उसे फिर दिखाई दिया। सहमती हुई बोली-उनके पढ़ने में तो इससे कोई हरज नहीं होतामैं उसी वक्त उनसे पढ़ती हूं जब उन्हें फुरसत रहती है। पूछ लेती हूं कि तुम्हारा हरज होता होतो जाओ। बहुधा जब वह खेलने जाने लगते हैंतो दस मिनट के लिए रोक लेती हूं। मैं खुद चाहती हूं कि उनका नुकसान न हो।

    बात कुछ न थीमगर वकील साहब हताश से होकर चारपाई पर गिर पड़े और माथे पर हाथ रखकर चिंता में मग्न हो गये। उन्होंनं जितना समझा थाबात उससे कहीं अधिक बढ़ गयी थी। उन्हें अपने ऊपर क्रोध आया कि मैंने पहले ही क्यों न इस लौंडे को बाहर रखने का प्रबंध किया। आजकल जो यह महारानी इतनी खुश दिखाई देती हैंइसका रहस्य अब समझ में आया। पहले कभी कमरा इतना सजा-सजाया न रहता थाबनाव-चुनाव भी न करती थींपर अब देखता हूं कायापलट-सी हो गयी है। जी में तो आया कि इसी वक्त चलकर मंसाराम को निकाल दें, लेकिन प्रौढ़ बुद्धि ने समझाया कि इस अवसर पर क्रोध की जरूरत नहीं। कहीं इसने भांप लियातो गजब ही हो जायेगा। हांजरा इसके मनोभावों को टटोलना चाहिए। बोले-यह तो मैं जानता हूं कि तुम्हें दो-चार मिनट पढ़ाने से उसका हरज नहीं होतालेकिन आवारा लड़का हैअपना काम न करने का उसे एक बहाना तो मिल जाता है। कल अगर फेल हो गयातो साफ कह देगा-मैं तो दिन भर पढ़ाता रहता था। मैं तुम्हारे लिए कोई मिस नौकर रख दूंगा। कुछ ज्यादा खर्च न होगा। तुमने मुझसे पहले कहा ही नहीं। यह तुम्हें भला क्या पढ़ाता होगादो-चार शब्द बताकर भाग जाता होगा। इस तरह तो तुम्हें कुछ भी न आयेगा।

    निर्मला ने तुरन्त इस आक्षेप का खण्डन किया-नहींयह बात तो नहीं। वह मुझे दिल लगा कर पढ़ाते हैं और उनकी शैली भी कुछ ऐसी है कि पढ़ने में मन लगता है। आप एक दिन जरा उनका समझाना देखिए। मैं तो समझती हूं कि मिस इतने ध्यान से न पढ़ायेगी।

    मुंशीजी अपनी प्रश्न-कुशलता पर मूंछों पर ताव देते हुए बोले-दिन में एक ही बार पढ़ाता है या कई बार?

    निर्मला अब भी इन प्रश्नों का आशय न समझी। बोली-पहले तो शाम ही को पढ़ा देते थेअब कई दिनों से एक बार आकर लिखना भी देख लेते हैं। वह तो कहते हैं कि मैं अपने क्लास में सबसे अच्छा हूं। अभी परीक्षा में इन्हीं को प्रथम स्थान मिला थाफिर आप कैसे समझते हैं कि उनका पढ़ने में जी नहीं लगता? मैं इसलिए और भी कहती हूं कि दीदी समझेंगीइसी ने यह आग लगाई है। मुफ्त में मुझे ताने सुनने पड़ेंगे। अभी जरा ही देर हुईधमकाकर गयी हैं।

    मुंशीजी ने दिल में कहा-खूब समझता हूं। तुम कल की छोकरी होकर मुझे चराने चलीं। दीदी का सहारा लेकर अपना मतलब पूरा करना चाहती हैं। बोले-मैं नहीं समझताबोर्डिंग का नाम सुनकर क्यों लौंडे की नानी मरती है। और लड़के खुश होते हैं कि अब अपने दोस्तों में रहेंगेयह उलटे रो रहा है। अभी कुछ दिन पहले तक यह दिल लगाकर पढ़ता थायह उसी मेहनत का नतीजा है कि अपने क्लास में सबसे अच्छा हैलेकिन इधर कुछ दिनों से इसे सैर-सपाटे का चस्का पड़ चला है। अगर अभी से रोकथाम न की गयीतो पीछे करते-धरते न बन पड़ेगा। तुम्हारे लिए मैं एक मिस रख दूंगा।

    दूसरे दिन मुंशीजी प्रात:काल कपड़े-लत्ते पहनकर बाहर निकले। दीवानखाने में कई मुवक्किल बैठे हुए थे। इनमें एक राजा साहब भी थेजिनसे मुंशीजी को कई हजार सालाना मेहनताना मिलता थामगर मुंशीजी उन्हें वहीं बैठे छोड़ दस मिनट में आने का वादा करके बग्घी पर बैठकर स्कूल के हेडमास्टर के यहां जा पहुंचे। हेडमास्टर साहब बड़े सज्जन पुरुष थे। वकील साहब का बहुत आदर-सत्कार कियापर उनके यहा एक लड़के की भी जगह खाली न थी। सभी कमरे भरे हुए थे। इंस्पेक्टर साहब की कड़ी ताकीद थी कि मुफस्सिल के लड़कों को जगह देकर तब शहर के लड़कों को दिया जाये। इसीलिए यदि कोई जगह खाली भी हुईतो भी मंसाराम को जगह न मिल सकेगीक्योंकि कितने ही बाहरी लड़कों के प्रार्थना-पत्र रखे हुए थे। मुंशीजी वकील थेरात दिन ऐसे प्राणियों से साबिका रहता थाजो लोभवश असंभव का भी संभवअसाध्य को भी साध्य बना सकते हैं। समझे शायद कुछ दे-दिलाकर काम निकल जायेदफ्तर क्लर्क से ढंग की कुछ बातचीत करनी चाहिएपर उसने हंसकर कहा- मुंशीजी यह कचहरी नहींस्कूल है, हैडमास्टर साहब के कानों में इसकी भनक भी पड़ गयीतो जामे से बाहर हो जायेंगे और मंसाराम को खड़े-खड़े निकाल देंगे। संभव हैअफसरों से शिकायत कर दें। बेचारे मुंशीजी अपना-सा मुंह लेकर रह गये। दस बजते-बजते झुंझलाये हुए घर लौटे। मंसाराम उसी वक्त घर से स्कूल जाने को निकला मुंशीजी ने कठोर नेत्रों से उसे देखामानो वह उनका शत्रु हो और घर में चले गये।

    इसके बाद दस-बारह दिनों तक वकील साहब का यही नियम रहा कि कभी सुबह कभी शामकिसी-न-किसी स्कूल के हेडमास्टर से मिलते और मंसाराम को बोर्डिंग हाउस में दाखिल करने कल चेष्टा करतेपर किसी स्कूल में जगह न थी। सभी जगहों से कोरा जवाब मिल गया। अब दो ही उपाय थे-या तो मंसाराम को अलग किराये के मकान में रख दिया जाये या किसी दूसरे स्कूल में भर्ती करा दिया जाये। ये दोनों बातें आसान थीं। मुफस्सिल के स्कूलों में जगह अक्सर खाली रहेती थीलेकिन अब मुंशीजी का शंकित हृदय कुछ शांत हो गया था। उस दिन से उन्होंने मंसाराम को कभी घर में जाते न देखा। यहां तक कि अब वह खेलने भी न जाता था। स्कूल जाने के पहले और आने के बादबराबर अपने कमरे में बैठा रहता। गर्मी के दिन थेखुले हुए मैदान में भी देह से पसीने की धारें निकलती थींलेकिन मंसाराम अपने कमरे से बाहर न निकलता। उसका आत्माभिमान आवारापन के आक्षेप से मुक्त होने के लिए विकल हो रहा था। वह अपने आचरण से इस कलंक को मिटा देना चाहता था।

    एक दिन मुंशीजी बैठे भोजन कर रहे थेकि मंसाराम भी नहाकर खाने आयामुंशीजी ने इधर उसे महीनों से नंगे बदन न देखा था। आज उस पर निगाह पड़ीतो होश उड़ गये। हड्डियों का ढांचा सामने खड़ा था। मुख पर अब भी ब्रह्राचर्य का तेज थापर देह घुलकर कांटा हो गयी थी। पूछा-आजकल तुम्हारी तबीयत अच्छी नहीं हैक्या? इतने दुर्बल क्यों हो?

    मंसाराम ने धोती ओढ़कर कहा-तबीयत तो बिल्कुल अच्छी है।

    मुंशीजी-फिर इतने दुर्बल क्यों हो?

    मंसाराम- दुर्बल तो नहीं हूं। मैं इससे ज्यादा मोटा कब था?

    मुंशीजी-वाहआधी देह भी नहीं रही और कहते होमैं दुर्बल नहीं हूं? क्यों दीदीयह ऐसा ही था?

    रुक्मिणी आंगन में खड़ी तुलसी को जल चढ़ा रही थीबोली-दुबला क्यों होगाअब तो बहुत अच्छी तरह लालन-पालन हो रहा है। मैं गंवारिन थीलडकों को खिलाना-पिलाना नहीं जानती थी। खोमचा खिला-खिलाकर इनकी आदत बिगाड़ देते थी। अब तो एक पढ़ी-लिखीगृहस्थी के कामों में चतुर औरत पान की तरह फेर रही है न। दुबला हो उसका दुश्मन।

    मुंशीजी-दीदीतुम बड़ा अन्याय करती हो। तुमसे किसने कहा कि लड़कों को बिगाड़ रही हो। जो काम दूसरों के किये न हो सकेवह तुम्हें खुद करने चाहिए। यह नहीं कि घर से कोई नाता न रखो। जो अभी खुद लड़की हैवह लड़कों की देख-रेख क्या करेगी? यह तुम्हारा काम है।

    रुक्मिणी-जब तक अपना समझती थीकरती थी। जब तुमने गैर समझ लियातो मुझे क्या पड़ी है कि मैं तुम्हारे गले से चिपटूं? पूछोकै दिन से दूध नहीं पिया? जाके कमरे में देख आओनाश्ते के लिए जो मिठाई भेजी गयी थीवह पड़ी सड़ रही है। मालकिन समझती हैंमैंने तो खाने का सामान रख दिया, कोई न खाये तो क्या मैं मुंह में डाल दूं? तो भैयाइस तरह वे लड़के पलते होंगेजिन्होंने कभी लाड़-प्यार का सुख नहीं देखा। तुम्हारे लड़के बराबर पान की तरह फेरे जाते रहे हैं, अब अनाथों की तरह रहकर सुखी नहीं रह सकते। मैं तो बात साफ कहती हूं। बुरा मानकर ही कोई क्या कर लेगा? उस पर सुनती हूं कि लड़के को स्कूल में रखने का प्रबंध कर रहे हो। बेचारे को घर में आने तक की मनाही है। मेरे पास आते भी डरता हैऔर फिर मेरे पास रखा ही क्या रहता हैजो जाकर खिलाऊंगी।

    इतने में मंसाराम दो फुलके खाकर उठ खड़ा हुआ। मुंशीजी ने पूछा-क्या दो ही फुलके तो लिये थे। अभी बैठे एक मिनट से ज्यादा नहीं हुआ। तुमने खाया क्यादो ही फुलके तो लिये थे।

    मंसाराम ने सकुचाते हुए कहा-दाल और तरकारी भी तो थी। ज्यादा खा जाता हूंतो गला जलने लगता हैखट्टी डकारें आने लगतीं हैं।

    मुंशीजी भोजन करके उठे तो बहुत चिंतित थे। अगर यों ही दुबला होता गयातो उसे कोई भंयकर रोग पकड़ लेगा। उन्हें रुक्मिणी पर इस समय बहुत क्रोध आ रहा था। उन्हें यही जलन है कि मैं घर की मालकिन नहीं हूं। यह नहीं समझतीं कि मुझे घर की मालकिन बनने का क्या अधिकार है? जिसे रुपया का हिसाब तक नहीं अतावह घर की स्वामिनी कैसे हो सकती है? बनीं तो थीं साल भर तक मालकिनएक पाई की बचत न होती थी। इस आमदनी में रूपकला दो-ढाई सौ रुपये बचा लेती थी। इनके राज में वही आमदनी खर्च को भी पूरी न पड़ती थी। कोई बात नहींलाड़-प्यार ने इन लड़कों को चौपट कर दिया। इतने बड़े-बड़े लड़कों को इसकी क्या जरूरत कि जब कोई खिलाये तो खायें। इन्हें तो खुद अपनी फिक्र करनी चाहिए। मुंशी जी दिनभर उसी उधेड़-बुन में पड़े रहे। दो-चार मित्रों से भी जिक्र किया। लोगों ने कहा-उसके खेल-कूद में बाधा न डालिएअभी से उसे कैद न कीजिएखुली हवा में चरित्र के भ्रष्ट होने की उससे कम संभावना हैजितना बन्द कमरे में। कुसंगत से जरूर बचाइएमगर यह नहीं कि उसे घर से निकलने ही न दीजिए। युवावस्था में एकान्तवास चरित्र के लिए बहुत ही हानिकारक है। मुंशीजी को अब अपनी गलती मालूम हुई। घर लौटकर मंसाराम के पास गये। वह अभी स्कूल से आया था और बिना कपड़े उतारेएक किताब सामने खोलकरसामने खिड़की की ओर ताक रहा था। उसकी दृष्टि एक भिखारिन पर लगी हुई थीजो अपने बालक को गोद में लिए भिक्षा मांग रही थी। बालक माता की गोद में बैठा ऐसा प्रसन्न थामानो वह किसी राजसिंहासन पर बैठा हो। मंसाराम उस बालक को देखकर रो पड़ा। यह बालक क्या मुझसे अधिक सुखी नहीं है? इस अन्नत विश्व में ऐसी कौन-सी वस्तु हैजिसे वह इस गोद के बदले पाकर प्रसन्न हो? ईश्वर भी ऐसी वस्तु की सृष्टि नहीं कर सकते। ईश्वर ऐसे बालकों को जन्म ही क्यों देते होजिनके भाग्य में मातृ-वियोग का दुख भोगना बडा? आज मुझ-सा अभागा संसार में और कौन है? किसे मेरे खाने-पीने कीमरने-जीने की सुध है। अगर मैं आज मर भी जाऊंतो किसके दिल को चोट लगेगी। पिता को अब मुझे रुलाने में मजा आता हैवह मेरी सूरत भी नहीं देखना चाहतेमुझे घर से निकाल देने की तैयारियां हो रही हैं। आह माता। तुम्हारा लाड़ला बेटा आज आवारा कहां जा रहा है। वही पिताजीजिनके हाथ में तुमने हम तीनों भाइयों के हाथ पकड़ाये थेआज मुझे आवारा और बदमाश कह रहे हैं। मैं इस योग्य भी नहीं कि इस घर में रह सकूं। यह सोचते-सोचते मंसाराम अपार वेदना से फूट-फूटकर रोने लगा।

    उसी समय तोताराम कमरे में आकर खड़े हो गये। मंसाराम ने चटपट आंसू पोंछ डाले और सिर झुकाकर खड़ा हो गया। मुंशीजी ने शायद यह पहली बार उसके कमरे में कदम रखा था। मंसाराम का दिल धड़धड़ करने लगा कि देखें आज क्या आफत आती है। मुंशीजी ने उसे रोते देखातो एक क्षण के लिए उनका वात्सल्य घेर निद्रा से चौंक पड़ा घबराकर बोले-क्योंरोते क्यों हो बेटा। किसी ने कुछ कहा है?

    मंसाराम ने बड़ी मुश्किल से उमड़ते हुए आंसुओं को रोककर कहा- जी नहींरोता तो नहीं हूं।

    मुंशीजी-तुम्हारी अम्मां ने तो कुछ नहीं कहा?

    मंसाराम-जी नहींवह तो मुझसे बोलती ही नहीं।

    मुंशीजी-क्या करुं बेटाशादी तो इसलिए की थी कि बच्चों को मां मिल जायेगी, लेकिन वह आशा पूरी नहीं हुईतो क्या बिल्कुल नहीं बोलतीं?

    मंसाराम-जी नहींइधर महीनों से नहीं बोलीं।

    मुंशीजी-विचित्र स्वभाव की औरत हैमालूम ही नहीं होता कि क्या चाहती है? मैं जानता कि उसका ऐसा मिजाज होगातो कभी शादी न करता रोज एक-न-एक बात लेकर उठ खड़ी होती है। उसी ने मुझसे कहा था कि यह दिन भर न जाने कहां गायब रहता है। मैं उसके दिल की बात क्या जानता था? समझातुम कुसंगत में पड़कर शायद दिनभर घूमा करते हो। कौन ऐसा पिता हैजिसे अपने प्यारे पुत्र को आवारा फिरते देखकर रंज न हो? इसीलिए मैंने तुम्हें बोर्डिंग हाउस में रखने का निश्चय किया था। बसऔर कोई बात नहीं थीबेटा। मैं तुम्हारा खेलन-कूदना बंद नहीं करना चाहता था। तुम्हारी यह दशा देखकर मेरे दिल के टुकड़े हुए जाते हैं। कल मुझे मालूम हुआ मैं भ्रम में था। तुम शौक से खेलो, सुबह-शाम मैदान में निकल जाया करो। ताजी हवा से तुम्हें लाभ होगा। जिस चीज की जरूरत हो मुझसे कहोउनसे कहने की जरूरत नहीं। समझ लो कि वह घर में है ही नहीं। तुम्हारी माता छोड़कर चली गयी तो मैं तो हूं।

    बालक का सरल निष्कपट हृदय पितृ-प्रेम से पुलकित हो उठा। मालूम हुआ कि साक्षात् भगवान् खड़े हैं। नैराश्य और क्षोभ से विकल होकर उसने मन में अपने पिता का निष्ठुर और न जाने क्या-क्या समझ रखा। विमाता से उसे कोई गिला न था। अब उसे ज्ञात हुआ कि मैंने अपने देवतुल्य पिता के साथ कितना अन्याय किया है। पितृ-भक्ति की एक तरंग-सी हृदय में उठीऔर वह पिता के चरणों पर सिर रखकर रोने लगा। मुंशीजी करुणा से विह्वल हो गये। जिस पुत्र को क्षण भर आंखों से दूर देखकर उनका हृदय व्यग्र हो उठता थाजिसके शील, बुद्धि और चरित्र का अपने-पराये सभी बखान करते थेउसी के प्रति उनका हृदय इतना कठोर क्यों हो गया? वह अपने ही प्रिय पुत्र को शत्रु समझने लगेउसको निर्वासन देने को तैयार हो गये। निर्मला पुत्र और पिता के बी में दीवार बनकर खड़ी थी। निर्मला को अपनी ओर खींचने के लिए पीछे हटना पड़ता थाऔर पिता तथा पुत्र में अंतर बढ़ता जाता था। फलत: आज यह दशा हो गयी है कि अपने अभिन्न पुत्र उन्हें इतना छल करना पड़ रहा है। आज बहुत सोचने के बाद उन्हें एक एक ऐसी युक्ति सूझी हैजिससे आशा हो रही है कि वह निर्मला को बीच से निकालकर अपने दूसरे बाजू को अपनी तरफ खींच लेंगे। उन्होंने उस युक्ति का आरंभ भी कर दिया हैलेकिन इसमें अभीष्ट सिद्ध होगा या नहींइसे कौन जानता है।

    जिस दिन से तोतोराम ने निर्मला के बहुत मिन्नत-समाजत करने पर भी मंसाराम को बोर्डिंग हाउस में भेजने का निश्चय किया थाउसी दिन से उसने मंसाराम से पढ़ना छोड़ दिया। यहां तक कि बोलती भी न थी। उसे स्वामी की इस अविश्वासपूर्ण तत्परता का कुछ-कुछ आभास हो गया था। ओफ्फोह। इतना शक्की मिजाज। ईश्वर ही इस घर की लाज रखें। इनके मन में ऐसी-ऐसी दुर्भावनाएं भरी हुई हैं। मुझे यह इतनी गयी-गुजरी समझते हैं। ये बातें सोच-सोचकर वह कई दिन रोती रही। तब उसने सोचना शूरू कियाइन्हें क्या ऐसा संदेह हो रहा है? मुझ में ऐसी कौन-सी बात हैजो इनकी आंखों में खटकती है। बहुत सोचने पर भी उसे अपने में कोई ऐसी बात नजर न आयी। तो क्या उसका मंसाराम से पढ़नाउससे हंसना-बोलना ही इनके संदेह का कारण हैतो फिर मैं पढ़ना छोड़ दूंगी, भूलकर भी मंसाराम से न बोलूंगीउसकी सूरत न दखूंगी।

    लेकिन यह तपस्या उसे असाध्य जान पड़ती थी। मंसाराम से हंसने-बोलने में उसकी विलासिनी कल्पना उत्तेजित भी होती थी और तृप्त भी। उसे बातें करते हुए उसे अपार सुख का अनुभव होता थाजिसे वह शब्दों में प्रकट न कर सकती थी। कुवासना की उसके मन में छाया भी न थी। वह स्वप्न में भी मंसाराम से कलुषित प्रेम करने की बात न सोच सकती थी। प्रत्येक प्राणी को अपने हमजोलियों के साथहंसने-बोलने की जो एक नैसर्गिक तृष्णा होती है, उसी की तृप्ति का यह एक अज्ञात साधन था। अब वह अतृप्त तृष्णा निर्मला के हृदय में दीपक की भांति जलने लगी। रह-रहकर उसका मन किसी अज्ञात वेदना से विकल हो जाता। खोयी हुई किसी अज्ञात वस्तु की खोज में इधर-उधर घूमती-फिरतीजहां बैठतीवहां बैठी ही रह जातीकिसी काम में जी न लगता। हांजब मुंशीजी आ जातेवह अपनी सारी तृष्णाओं को नैराश्य में डुबाकरउनसे मुस्कराकर इधर-उधर की बातें करने लगती।

    कल जब मुंशीजी भोजन करके कचहरी चले गयेतो रुक्मिणी ने निर्मला को खुब तानों से छेदा-जानती तो थी कि यहां बच्चों का पालन-पोषण करना पड़ेगातो क्यों घरवालों से नहीं कह दिया कि वहां मेरा विवाह न करो? वहां जाती जहां पुरुष के सिवा और कोई न होता। वही यह बनाव-चुनाव और छवि देखकर खुश होताअपने भाग्य को सराहता। यहां बुड्ढा आदमी तुम्हारे रंग-रूपहाव-भाव पर क्या लट्टू होगा? इसने इन्हीं बालकों की सेवा करने के लिए तुमसे विवाह किया हैभोग-विलास के लिए नहीं वह बड़ी देर तक घाव पर नमक छिड़कती रहीपर निर्मला ने चूं तक न की। वह अपनी सफाई तो पेश करना चाहती थीपर न कर सकती थी। अगर कहे कि मैं वही कर रही हूंजो मेरे स्वामी की इच्छा है तो घर का भण्डा फूटता है। अगर वह अपनी भूल स्वीकार करके उसका सुधार करती हैतो भय है कि उसका न जाने क्या परिणाम हो? वह यों बड़ी स्पष्टवादिनी थीसत्य कहने में उसे संकोच या भय न होता थालेकिन इस नाजुक मौके पर उसे चुप्पी साधनी पड़ी। इसके सिवा दूसरा उपाय न था। वह देखती थी मंसाराम बहुत विरक्त और उदास रहता हैयह भी देखती थी कि वह दिन-दिन दुर्बल होता जाता हैलेकिन उसकी वाणी और कर्म दोनों ही पर मोहर लगी हुई थी। चोर के घर चोरी हो जाने से उसकी जो दशा होती है, वही दशा इस समय निर्मला की हो रही थी।

 

आठ

 

ब कोई बात हमारी आशा के विरुद्ध होती हैतभी दुख होता है। मंसाराम को निर्मला से कभी इस बात की आशा न थी कि वे उसकी शिकायत करेंगी। इसलिए उसे घोर वेदना हो रही थी। वह क्यों मेरी शिकायत करती है? क्या चाहती है? यही न कि वह मेरे पति की कमाई खाता हैइसके पढ़ान-लिखाने में रुपये खर्च होते हैंकपड़ा पहनता है। उनकी यही इच्छा होगी कि यह घर में न रहे। मेरे न रहने से उनके रुपये बच जायेंगे। वह मुझसे बहुत प्रसन्नचित्त रहती हैं। कभी मैंने उनके मुंह से कटु शब्द नहीं सुने। क्या यह सब कौशल है? हो सकता है? चिड़िया को जाल में फंसाने के पहले शिकारी दाने बिखेरता है। आह। मैं नहीं जानता था कि दाने के नीचे जाल हैयह मातृ-स्नेह केवल मेरे निर्वासन की भूमिका है।

    अच्छा, मेरा यहां रहना क्यों बुरा लगता है? जो उनका पति हैक्या वह मेरा पिता नहीं है? क्या पिता-पुत्र का संबंध स्त्री-पुरुष के संबंध से कुछ कम घनिष्ट है? अगर मुझे उनके संपूर्ण आधिपत्य से ईर्ष्या नहीं होती, वह जो चाहे करेंमैं मुंह नहीं खोल सकतातो वह मुझे एक अगुंल भर भूमि भी देना नहीं चाहतीं। आप पक्के महल में रहकर क्यों मुझे वृक्ष की छाया में बैठा नहीं देख सकतीं।

    हांवह समझती होंगी कि वह बड़ा होकर मेरे पति की सम्पत्ति का स्वामी हो जायेगाइसलिए अभी से निकाल देना अच्छा है। उनको कैसे विश्वास दिलाऊं कि मेरी ओर से यह शंका न करें। उन्हें क्योंकर बताऊं कि मंसाराम विष खाकर प्राण दे देगाइसके पहले कि उनका अहित कर। उसे चाहे कितनी ही कठिनाइयां सहनी पडें वह उनके हृदय का शूल न बनेगा। यों तो पिताजी ने मुझे जन्म दिया है और अब भी मुझ पर उनका स्नेह कम नहीं हैलेकिन क्या मैं इतना भी नहीं जानता कि जिस दिन पिताजी ने उनसे विवाह कियाउसी दिन उन्होंने हमें अपने हृदय से बाहर निकाल दिया? अब हम अनाथों की भांति यहां पड़े रह सकते हैंइस घर पर हमारा कोई अधिकार नहीं है। कदाचित् पूर्व संस्कारों के कारण यहां अन्य अनाथों से हमारी दशा कुछ अच्छी हैपर हैं अनाथ ही। हम उसी दिन अनाथ हुएजिस दिन अम्मां जी परलोक सिधारीं। जो कुछ कसर रह गयी थीवह इस विवाह ने पूरी कर दी। मैं तो खुद पहले इनसे विशेष संबंध न रखता था। अगरउन्हीं दिनों पिताजी से मेरी शिकायत की होतीतो शायद मुझे इतना दुख न होता। मैं तो उसे आघात के लिए तैयार बैठा था। संसार में क्या मैं मजदूरी भी नहीं कर सकता? लेकिन बुरे वक्त में इन्होंने चोट की। हिंसक पशु भी आदमी को गाफिल पाकर ही चोट करते हैं। इसीलिए मेरी आवभगत होती थी, खाना खाने के लिए उठने में जरा भी देर हो जाती थीतो बुलावे पर बुलावे आते थे, जलपान के लिए प्रात: हलुआ बनाया जाता थाबार-बार पूछा जाता था-रुपयों की जरूरत तो नहीं है? इसीलिए वह सौ रुपयों की घड़ी मंगवाई थी।

    मगर क्या इन्हें क्या दूसरी शिकायत न सूझीजो मुझे आवारा कहा? आखिर उन्होंने मेरी क्या आवारगी देखी? यह कह सकती थीं कि इसका मन पढ़ने-लिखने में नहीं लगताएक-न-एक चीज के लिए नित्य रुपये मांगता रहता है। यही एक बात उन्हें क्यों सूझी? शायद इसीलिए कि यही सबसे कठोर आघात हैजो वह मुझ पर कर सकती हैं। पहली ही बार इन्होंने मुझे पर अग्निबाण चला दियाजिससे कहीं शरण नहीं। इसीलिए न कि वह पिता की नजरों से गिर जाये? मुझे बोर्डिंग-हाउस में रखने का तो एक बहाना था। उद्देश्य यह था कि इसे दूध की मक्खी की तरह निकाल दिया जाये। दो-चार महीने के बाद खर्च-वर्च देना बंद कर दिया जायेफिर चाहे मरे या जिये। अगर मैं जानता कि यह प्रेरणा इनकी ओर से हुई हैतो कहीं जगह न रहने पर भी जगह निकाल लेता। नौकरों की कोठरियों में तो जगह मिल जातीबरामदे में पड़े रहने के लिए बहुत जगह मिल जाती। खैरअब सबेरा है। जब स्नेह नहीं रहातो केवल पेट भरने के लिए यहां पड़े रहना बेहयाई हैयह अब मेरा घर नहीं। इसी घर में पैदा हुआ हूंयही खेला हूंपर यह अब मेरा नहीं। पिताजी भी मेरे पिता नहीं हैं। मैं उनका पुत्र हूंपर वह मेरे पिता नहीं हैं। संसार के सारे नाते स्नेह के नाते हैं। जहां स्नेह नहींवहां कुछ नहीं। हायअम्मांजीतुम कहां हो?

    यह सोचकर मंसाराम रोने लगा। ज्यों-ज्यों मातृ स्नेह की पूर्व-स्मृतियां जागृत होती थींउसके आंसू उमड़ते आते थे। वह कई बार अम्मां-अम्मां पुकार उठामानो वह खड़ी सुन रही हैं। मातृ-हीनता के दु:ख का आज उसे पहली बार अनुभव हुआ। वह आत्माभिमानी थासाहसी थापर अब तक सुख की गोद में लालन-पालन होने के कारण वह इस समय अपने आप को निराधार समझ रहा था।

    रात के दस बज गये थे। मुंशीजी आज कहीं दावत खाने गये हुए थे। दो बार महरी मंसाराम को भोजन करने के लिए बुलाने आ चुकी थी। मंसाराम ने पिछली बार उससे झुंझलाकर कह दिया था-मुझे भूख नहीं हैकुछ न खाऊंगा। बार-बार आकर सिर पर सवार हो जाती है। इसीलिए जब निर्मला ने उसे फिर उसी काम के लिए भेजना चाहातो वह न गयी।

    बोली-बहूजीवह मेरे बुलाने से न आवेंगे।

    निर्मला-आयेंगे क्यों नहीं? जाकर कह दे खाना ठण्डा हुआ जाता है। दो चार कौर खा लें।

महरी-मैं यह सब कह के हार गयीनहीं आते।

    निर्मला-तूने यह कहा था कि वह बैठी हुई हैं।

    महरी-नहीं बहूजीयह तो मैंने नहीं कहाझूठ क्यों बोलूं।

    निर्मला-अच्छातो जाकर यह कह देनावह बैठी तुम्हारी राह देख रही हैं। तुम न खाओगे तो वह रसोई उठाकर सो रहेंगी। मेरी भूंगीसुनअबकी और चली जा। (हंसकर) न आवेंतो गोद में उठा लाना।

    भूंगी नाक-भौं सिकोड़ते गयीपर एक ही क्षण में आकर बोली-अरे बहूजीवह तो रो रहे हैं। किसी ने कुछ कहा है क्या?

    निर्मला इस तरह चौककर उठी और दो-तीन पग आगे चलीमानो किसी माता ने अपने बेटे के कुएं में गिर पड़ने की खबर पायी होफिर वह ठिठक गयी और भूंगी से बोली-रो रहे हैं? तूने पूछा नहीं क्यों रो रहे हैं?

    भूंगी- नहीं बहूजीयह तो मैंने नहीं पूछा। झूठ क्यों बोलूं?

    वह रो रहे हैं। इस निस्तबध रात्रि में अकेले बैठै हुए वह रो रहे हैं। माता की याद आयी होगी? कैसे जाकर उन्हें समझाऊं? हायकैसे समझाऊं? यहां तो छींकते नाक कटती है। ईश्वरतुम साक्षी हो अगर मैंने उन्हें भूल से भी कुछ कहा होतो वह मेरे गे आये। मैं क्या करुं? वह दिल में समझते होंगे कि इसी ने पिताजी से मेरी शिकायत की होगी। कैसे विश्वास दिलाऊं कि मैंने कभी तुम्हारे विरुद्ध एक शब्द भी मुंह से नहीं निकाला? अगर मैं ऐसे देवकुमार के-से चरित्र रखने वाले युवक का बुरा चेतूंतो मुझसे बढ़कर राक्षसी संसार में न होगी। 

    निर्मला देखती थी कि मंसाराम का स्वास्थ्य दिन-दिन बिगड़ता जाता हैवह दिन-दिन दुर्बल होता जाता हैउसके मुख की निर्मल कांति दिन-दिन मलिन होती जाती हैउसका सहास बदन संकुचित होता जाता है। इसका कारण भी उससे छिपा न थापर वह इस विषय में अपने स्वामी से कुछ न कह सकती थी। यह सब देख-देखकर उसका हृदय विदीर्ण होता रहता थापर उसकी जबान न खुल सकती थी। वह कभी-कभी मन में झुंझलाती कि मंसाराम क्यों जरा-सी बात पर इतना क्षोभ करता है? क्या इनके आवारा कहने से वह आवारा हो गया? मेरी और बात हैएक जरा-सा शक मेरा सर्वनाश कर सकता हैपर उसे ऐसी बातों की इतनी क्या परवाह?

 

सके जी में प्रबल इच्छा हुई कि चलकर उन्हें चुप कराऊं और लाकर खाना खिला दूं। बेचारे रात-भर भूखे पड़े रहेंगे। हाय। मैं इस उपद्रव की जड़ हूं। मेरे आने के पहले इस घर में शांति का राज्य था। पिता बालकों पर जान देता था, बालक पिता को प्यार करते थे। मेरे आते ही सारी बाधाएं आ खड़ी हुईं। इनका अंत क्या होगा? भगवान् ही जाने। भगवान् मुझे मौत भी नहीं देते। बेचारा अकेले भूखों पड़ा है। उस वक्त भी मुंह जुठा करके उठ गया था। और उसका आहार ही क्या हैजितना वह खाता हैउतना तो साल-दो-साल के बच्चे खा जाते हैं।

    निर्मला चली। पति की इच्छा के विरुद्ध चली। जो नाते में उसका पुत्र होता थाउसी को मनाने जाते उसका हृदय कांप रहा था। उसने पहले रुक्मिणी के कमरे की ओर देखावह भोजन करके बेखबर सो रही थींफिर बाहर कमरे की ओर गयी। वहां सन्नाटा था। मुंशी अभी न आये थे। यह सब देख-भालकर वह मंसाराम के कमरे के सामने जा पहुंची। कमरा खुला हुआ थामंसाराम एक पुस्तक सामने रखे मेज पर सिर झुकाये बैठा हुआ थामानो शोक और चिन्ता की सजीव मूर्ति हो। निर्मला ने पुकारना चाहा पर उसके कंठ से आवाज़ न निकली।

    सहसा मंसाराम ने सिर उठाकर द्वार की ओर देखा। निर्मला को  देखकर अंधेरे में पहचान न सका। चौंककर बोला-कौन?

    निर्मला ने कांपते हुए स्वर में कहा-मैं तो हूं। भोजन करने क्यों नहीं चल रहे हो? कितनी रात गयी।

    मंसाराम ने मुंह फेरकर कहा-मुझे भूख नहीं है।      

    निर्मला-यह तो मैं तीन बार भूंगी से सुन चुकी हूं।

    मंसाराम-तो चौथी बार मेरे मुंह से सुन लीजिए।

    निर्मला-शाम को भी तो कुछ नहीं खाया थाभूख क्यों नहीं लगी?

    मंसाराम ने व्यंग्य की हंसी हंसकर कहा-बहुत भूख लगेगीतो आयेग कहां से?

    यह कहते-कहते मंसाराम ने कमरे का द्वार बंद करना चाहालेकिन निर्मला किवाड़ों को हटाकर कमरे में चली आयी और मंसाराम का हाथ पकड़ सजल नेत्रों से विनय-मधुर स्वर में बोली-मेरे कहने से चलकर थोड़ा-सा खा लो। तुम न खाओगेतो मैं भी जाकर सो रहूंगी। दो ही कौर खा लेना। क्या मुझे रात-भर भूखों मारना चाहते हो?

    मंसाराम सोच में पड़ गया। अभी भोजन नहीं कियामेरे ही इंतजार में बैठी रहीं। यह स्नेह, वात्सल्य और विनय की देवी हैं या ईर्ष्या और अमंगल की मायाविनी मूर्ति? उसे अपनी माता का स्मरण हो आया। जब वह रुठ जाता थातो वे भी इसी तरह मनाने आ करती थीं और जब तक वह न जाता थावहां से न उठती थीं। वह इस विनय को अस्वीकार न कर सका। बोला-मेरे लिए आपको इतना कष्ट हुआइसका मुझे खेद है। मैं जानता कि आप मेरे इंतजार में भूखी बैठी हैंतो तभी खा आया होता।

निर्मला ने तिरस्कार-भाव से कहा-यह तुम कैसे समझ सकते थे कि तुम भूखे रहोगे और मैं खाकर सो रहूंगी? क्या विमाता का नाता होने से ही मैं ऐसी स्वार्थिनी हो जाऊंगी? 

    सहसा मर्दाने कमरे में मुंशीजी के खांसने की आवाज आयी। ऐसा मालूम हुआ कि वह मंसाराम के कमरे की ओर आ रहे हैं। निर्मला के चेहरे का रंग उड़ गया। वह तुरंत कमरे से निकल गयी और भीतर जाने का मौका न पाकर कठोर स्वर में बोली-मैं लौंडी नहीं हूं कि इतनी रात तक किसी के लिए रसोई के द्वार पर बैठी रहूं। जिसे न खाना होवह पहले ही कह दिया करे।

    मुंशीजी ने निर्मला को वहां खड़े देखा। यह अनर्थ। यह यहां क्या करने आ गयी? बोले-यहां क्या कर रही हो?

    निर्मला ने कर्कश स्वर में कहा-कर क्या रही हूंअपने भाग्य को रो रही हूं। बससारी बुराइयों की जड़ मैं ही हूं। कोई इधर रुठा हैकोई उधर मुंह फुलाये खड़ा है। किस-किस को मनाऊं और कहां तक मनाऊं।

    मुंशीजी कुछ चकित होकर बोले-बात क्या है?

    निर्मला-भोजन करने नहीं जाते और क्या बात है? दस दफे महरी को भेआखिर आप दौड़ी आयी। इन्हें तो इतना कह देना आसान हैमुझे भूख नहीं हैयहां तो घर भर की लौंडी हूंसारी दुनिया मुंह में कालिख पोतने को तैयार। किसी को भूख न होपर कहने वालों को यह कहने से कौन रोकेगा कि पिशाचिनी किसी को खाना नहीं देती।

    मुंशीजी ने मंसाराम से कहा-खाना क्यों नहीं खा लेते जी? जानते हो क्या वक्त है?

    मंसाराम स्त्म्भित-सा खड़ा था। उसके सामने एक ऐसा रहस्य हो रहा थाजिसका मर्म वह कुछ भी न समझ सकताथा। जिन नेत्रों में एक क्षण पहले विनय के आंसू भरे हुए थेउनमें अकस्मात् ईर्ष्या  की ज्वाला कहां से आ गयी? जिन अधरों से एक क्षण पहले सुधा-वृष्टि हो रही थीउनमें से विष प्रवाह क्यों होने लगा? उसी अर्ध चेतना की दशा में बोला-मुझे भूख नहीं है।  

    मुंशीजी ने घुड़ककर कहा-क्यों भूख नहीं है? भूख नहीं थीतो शाम को क्यों न कहला दिया? तुम्हारी भूख के इंतजार में कौन सारी रात बैठा रहे? तुममें पहले तो यह आदत न थी। रुठना कब से सीख लिया? जाकर खा लो।

    मंसाराम-जी नहींमुझे जरा भी भूख नहीं है।

    तोताराम-ने दांत पीसकर कहा-अच्छी बात हैजब भूख लगे तब खाना। यह कहते हुए एवह अंदर चले गये। निर्मला भी उनके पीछे ही चली गयी। मुंशीजी तो लेटने चले गये, उसने जाकर रसोई उठा दी और कुल्लाकरपान खा मुस्कराती हुई आ पहुंची। मुंशीजी ने पूछा-खाना खा लिया न?

    निर्मला-क्या करतीकिसी के लिए अन्न-जल छोड़ दूंगी?

    मुंशीजी-इसे न जाने क्या हो गया हैकुछ समझ में नहीं आता? दिन-दिन घुलता चला जाता हैदिन भर उसी कमरे में पड़ा रहता है।

    निर्मला कुछ न बोली। वह चिंता के अपार सागर में डुबकियां खा रही थी। मंसाराम ने मेरे भाव-परिवर्तन को देखकर दिल में क्या-क्या समझा होगा? क्या उसके मन में यह प्रश्न उठा होगा कि पिताजी को देखते ही इसकी त्योरियं क्यों बदल गयीं? इसका कारण भी क्या उसकी समझ में आ गया होगा? बेचारा खाने आ रहा थातब तक यह महाशय न जाने कहां से फट पड़े? इस रहस्य को उसे कैसे समझाऊं समझाना संभव भी है? मैं किस विपत्ति में फंस गयी?

    सवेरे वह उठकर घर के काम-धंधे में लगी। सहसा नौ बजे भूंगी ने आकर कहा-मंसा बाबू तो अपने कागज-पत्तर सब इक्के पर लाद रहे हैं।

    भूंगी-मैंने पूछा तो बोलेअब स्कूल में ही रहूंगा।

    मंसाराम प्रात:काल उठकर अपने स्कूल के हेडमास्टर साहब के पास गया था और अपने रहने का प्रबंध कर आया था। हेडमास्टर साहब ने पहले तो कहा-यहां जगह नहीं हैतुमसे पहले के कितने ही लड़कों के प्रार्थना-पत्र पडे हुए हैंलेकिन जब मंसाराम ने कहा-मुझे जगह न मिलेगीतो कदाचित् मेरा पढ़ना न हो सके और मैं इम्तहान में शरीक न हो सकूंतो हेडमास्टर साहब को हार माननी पड़ी। मंसाराम के प्रथम श्रेणी में पास होने की आशा थी। अध्यापकों को विश्वास था कि वह उस शाला की कीर्ति को उज्जवल करेगा। हेडमास्टर साहब ऐसे लड़कों को कैसे छोड़ सकते थे? उन्होने अपने दफ्तर का कमरा खाली करा दिया। इसीलिए मंसाराम वहां से आते ही अपना सामान इक्के पर लादने लगा।

    मुंशीजी ने कहा-अभी ऐसी क्या जल्दी है? दो-चार दिन में चले जाना। मैं चाहता हूंतुम्हारे लिए कोई अच्छा सा रसोइया ठीक कर दूं।

    मंसाराम-वहां का रसोइया बहुत अच्छा भोजन पकाता है।

    मुंशीजी-अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना। ऐसा न हो कि पढ़ने के पीछे स्वास्थ्य खो बैठो।

    मंसाराम-वहां नौ बजे के बाद कोई पढ़ने नहीं पाता और सबको नियम के साथ खेलना पड़ता है।

    मुंशी जी-बिस्तर क्यों छोड़ देते हो? सोओगे किस पर?

    मंसाराम-कंबल लिए जाता हूं। बिस्तर जरुरत नहीं।

    मुंशी जी-कहार जब तक तुम्हारा सामान रख रहा हैजाकर कुछ खा लो। रात भी तो कुछ नहीं खाया था।

मंसाराम-वहीं खा लूंगा। रसोइये से भोजन बनाने को कह आया हूं यहां खाने लगूंगा तो देर होगी।

    घर में जियाराम और सियाराम भी भाई के साथ जाने के जिद कर रहे थे निर्मला उन दोनों के बहला रही थी-बेटावहां छोटे नहीं रहतेसब काम अपने ही हाथ से करना पड़ता है।

    एकाएक रुक्मिणी ने आकर कहा-तुम्हारा वज्र का हृदय हैमहारान। लड़के ने रात भी कुछ नहीं खायाइस वक्त भी बिना खाय-पीये चला जा रहा है और तुम लड़को के लिए बातें कर रही हो? उसको तुम जानती नहीं हो। यह समझ लो कि वह स्कूल नहीं जा रहा हैबनवास ले रहा हैलौटकर फिर न आयेगा। यह उन लड़कों में नहीं हैजो खेल में मार भूल जाते हैं। बात उसके दिल पर पत्थर की लकीर हो जाती है।

    निर्मला ने कातर स्वर में कहा-क्या करुंदीदीजी? वह किसी की सुनते ही नहीं। आप जरा जाकर बुला लें। आपके बुलाने से आ जायेंगे।

    रुक्मिणी- आखिर हुआ क्याजिस पर भागा जाता है? घर से उसका जी कभ उचाट न होता था। उसे तो अपने घर के सिवा और कहीं अच्छा ही न लगता था। तुम्हीं ने उसे कुछ कहा होगाया उसकी कुछ शिकायत की होगी। क्यों अपने लिए कांटे बो रही हो? रानीघर को मिट्टी में मिलाकर चैन से न बैठने पाओगी।

    निर्मला ने रोकर कहा-मैंने उन्हें कुछ कहा होतो मेरी जबान कट जाये। हांसौतेली मां होने के कारण बदनाम तो हूं ही। आपके हाथ जोड़ती हूं जरा जाकर उन्हें बुला लाइये।

    रुक्मिणी ने तीव्र स्वर में कहा- तुम क्यों नहीं बुला लातीं? क्या छोटी हो जाओगी? अपना होतातो क्या इसी तरह बैठी रहती?

     निर्मला की दशा उस पंखहीन पक्षी की तरह हो रही थीजो सर्प को अपनी ओर आते देख कर उड़ना चाहता हैपर उड़ नहीं सकताउछलता है और गिर पड़ता हैपंख फड़फड़ाकर रह जाता है। उसका हृदय अंदर ही अंदर तड़प रहा थापर बाहर न जा सकती थी।

    इतने में दोनों लड़के आकर बोले-भैयाजी चले गये।

    निर्मला मूर्तिवत् खड़ी रहीमानो संज्ञाहीन हो गयी हो। चले गये? घर में आये तक नहींमुझसे मिले तक नहीं चले गये। मुझसे इतनी घृणा। मैं उनकी कोई न सहीउनकी बुआ तो थीं। उनसे तो मिलने आना चाहिए था? मैं यहां थी न। अंदर कैसे कदम रखते? मैं देख लेती न। इसीलिए चले गये।

 

नौ

 

मं

साराम के जाने से घर सूना हो गया। दोनों छोटे लड़के उसी स्कूल में पढ़ते थे। निर्मला रोज उनसे मंसाराम का हाल पूछती। आशा थी कि छुट्टी के दिन वह आयेगालेकिन जब छुट्टी के दिन गुजर गये और वह न आयातो निर्मला की तबीयत घबराने लगी। उसने उसके लिए मूंग के लड्डू बना रखे थे। सोमवार को प्रात: भूंगी का लड्डू देकर मदरसे भेजा। नौ बजे भूंगी लौट आयी। मंसाराम ने लड्डू ज्यों-के-त्यों लौटा दिये थे।

    निर्मला ने पूछा-पहले से कुछ हरे हुए हैंरे?

    भूंगी-हरे-वरे तो नहीं हुएऔर सूख गये हैं।

    निर्मला- क्या जी अच्छा नहीं है?

    भूंगी-यह तो मैंने नहीं पूछा बहूजीझूठ क्यों बोलूं? हांवहां का कहार मेरा देवर लगता है । वह कहता था कि तुम्हारे बाबूजी की खुराक कुछ नहीं है। दो फुलकियां खाकर उठ जाते हैंफिर दिन भर कुछ नहीं खाते। हरदम पढ़ते रहते हैं।

    निर्मला-तूने पूछा नहींलड्डू क्यों लौटाये देते हो?

    भूंगी- बहूजीझूठ क्यों बोलूं? यह पूछने की तो मुझे सुध ही न रही। हांयह कहते थे कि अब तू यहां कभी न आनान मेरे लिए कोई चीज लाना और अपनी बहूजी से कह देना कि मेरे पास कोई चिट्ठी-पत्तरी न भेजें। लड़कों से भी मेरे पास कोई संदेशा न भेजें और एक ऐसी बात कही कि मेरे मुंह से निकल नहीं सकती,  फिर रोने लगे।

    निर्मला-कौन बात थी कह तो?

    भूंगी-क्या कहूं कहते थे मेरे जीने को धीक्कार है? यही कहकर रोने लगे।

    निर्मला के मुंह से एक ठंडी सांस निकल गयी। ऐसा मालूम हुआमानो कलेजा बैठा जाता है। उसका रोम-रोम आर्तनाद करने लगा। वह वहां बैठी न रह सकी। जाकर बिस्तर पर मुंह ढांपकर लेट रही और फूट-फूटकर रोने लगी। वह भी जान गये। उसके अन्त:करण में बार-बार यही आवाज़ गूंजने लगी-वह भी जान गये। भगवान् अब क्या होगा? जिस संदेह की आग में वह भस्म हो रही थीअब शतगुण वेग से धधकने लगी। उसे अपनी कोई चिंता न थी। जीवन में अब सुख की क्या आशा थीजिसकी उसे लालसा होती? उसने अपने मन को इस विचार से समझाया था कि यह मेरे पूर्व कर्मों का प्रायश्चित है। कौन प्राणी ऐसा निर्लज्ज होगाजो इस दशा में बहुत दिन जी सके? कर्त्तव्य की वेदी पर उसने अपना जीवन और उसकी सारी कामनाएं होम कर दी थीं। हृदय रोता रहता थापर मुख पर हंसी का रंग भरना पड़ता था। जिसका मुंह देखने को जी न चाहता थाउसके सामने हंस-हंसकर बातें करनी पड़ती थीं।  जिस देह का स्पर्श उसे सर्प के शीतल स्पर्श के समान लगता थाउससे आलिंगित होकर उसे जितनी घृणाजितनी मर्मवेदना होती थीउसे कौन जान सकता है? उस समय उसकी यही इच्छा थी कि धरती फट जाये और मैं उसमें समा जाऊं। लेकिन सारी विडम्बना अब तक अपने ही तक थी। अपनी चिंता उसन छोड़ दी थीलेकिन वह समस्या अब अत्यंत भयंकर हो गयी थी। वह अपनी आंखों से मंसाराम की आत्मपीड़ा नहीं देख सकती थी। मंसाराम जैसे मनस्वीसाहसी युवक पर इस आक्षेप का जो असर पड़ सकता थाउसकी कल्पना ही से उसके प्राण कांप उठते थे। अब चाहे उस पर कितने ही संदेह क्यों न होंचाहे उसे आत्महत्या ही क्यों न करनी पड़ेपर वह चुप नहीं बैठ सकती। मंसाराम की रक्षा करने के लिए वह विकल हो गयी। उसने संकोच और लज्जा की चादर उतारकर फेंक देने का निश्चय कर लिया।

    वकील साहब भोजन करके कचहरी जाने के पहले एक बार उससे अवश्य मिल लिया करते थे। उनके आने का समय हो गया था। आ ही रहे होंगेयह सोचकर निर्मला द्वार पर खड़ी हो गयी और उनका इंतजार करने लगी लेकिन यह क्या? वह तो बाहर चले जा रहे है। गाड़ी जुतकर आ गयीयह हुक्म वह यहीं से दिया करते थे। तो क्या आज वह न आयेंगेबाहर-ही-बाहर चले जायेंगे। नहींऐसा नहीं होने पायेगा। उसने भूंगी से कहा-जाकर बाबूजी को बुला ला। कहनाएक जरुरी काम हैसुन लीजिए।

    मुंशीजी जाने को तैयार ही थे। यह संदेशा पाकर अंदर आयेपर कमरे में न आकर दूर से ही पूछा-क्या बात है भाई? जल्दी कह दोमुझे एक जरुरी काम से जाना है। अभी थोड़ी देर हुईहेडमास्टर साहब का एक पत्र आया है कि मंसाराम को ज्वर आ गया हैबेहतर हो कि आप घर ही पर उसका इलाज करें। इसलिए उधर ही से हाता हुआ कचहरी जाऊंगा। तुम्हें कोई खास बात तो नहीं कहनी है।

    निर्मला पर मानो वज्र गिर पड़ा। आंसुओं के आवेग और कंठ-स्वर में घोर संग्राम होने लगा। दोनों पहले निकलने पर तुले हुए थे। दो में से कोई एक कदम भी पीछे हटना नहीं चाहता था। कंठ-स्वर की दुर्बलता और आंसुओं की सबलता देखकर यह निश्चय करना कठिन नहीं था कि एक क्षण यही संग्राम होता रहा तो मैदान किसके हाथ रहेगा। अखीर दोनों साथ-साथ निकले, लेकिन बाहर आते ही बलवान ने निर्बल को दबा लिया। केवल इतना मुंह से निकला-कोई खास बात नहीं थी। आप तो उधर जा ही रहे हैं।

    मुंशीजी- मैंने लड़कों पूछा थातो वे कहते थेकल बैठे पढ़ रहे थेआज न जाने क्या हो गया।

    निर्मला ने आवेश से कांपते हुए कहा-यह सब आप कर रहे हैं

    मुंशीजी ने त्योरियां बदलकर कहा-मैं कर रहा हूं? मैं क्या कर रहा हूं?

    निर्मला-अपने दिल से पूछिए।

    मुंशीजी-मैंने तो यही सोचा था कि यहां उसका पढ़ने में जी नहीं लगतावहां और लड़कों के साथ खामाख्वह पढ़ेगा ही। यह तो बुरी बात न थी और मैंने क्या किया?

     निर्मला-खूब सोचिएइसीलिए आपने उन्हें वहां भेजा था? आपके मन में और कोई बात न थी।

    मुंशीजी जरा हिचकिचाए और अपनी दुर्बलता को छिपाने के लिए मुस्कराने की चेष्टा करके बोले-और क्या बात हो सकती थी? भला तुम्हीं सोचो।

    निर्मला-खैरयही सही। अब आप कृपा करके उन्हें आज ही लेते आइयेगावहां रहने से उनकी बीमारी बढ़ जाने का भय है। यहां दीदीजी जितनी तीमारदारी कर सकती हैंदूसरा नहीं कर सकता।

    एक क्षण के बाद उसने सिर नीचा करके कहा-मेरे कारण न लाना चाहते होंतो मुझे घर भेज दीजिए। मैं वहां आराम से रहूंगी।

    मुंशीजी ने इसका कुछ जवाब न दिया। बाहर चले गयेऔर एक क्षण में गाड़ी स्कूल की ओर चली।

    मन। तेरी गति कितनी विचित्र हैकितनी रहस्य से भरी हुईकितनी दुर्भेद्य। तू कितनी जल्द रंग बदलता है? इस कला में तू निपुण है। आतिशबाजी की चर्खी को भी रंग बदलते कुछ देरी लगती हैपर तुझे रंग बदलने में उसका लक्षांश समय भी नहीं लगता। जहां अभी वात्सल्य थावहां  फिर संदेह ने आसन जमा लिया।

    वह सोचते थे-कहीं उसने बहाना तो नहीं किया है?

 

दस

 

मं

साराम दो दिन तक गहरी चिंता में डूबा रहा। बार-बार अपनी माता की याद आतीन खाना अच्छा लगतान पढ़ने ही में जी लगता। उसकी कायापलट-सी हो गई। दो दिन गुजर गये और छात्रालय में रहते हुए भी उसने वह काम न कियाजो स्कूल के मास्टरों ने घर से कर लाने को दिया था। परिणाम स्वरुप उसे बेंच पर खड़ा रहना पड़ा। जो बात कभी न हुई थीवह आज हो गई। यह असह्य अपमान भी उसे सहना पड़ा।

    तीसरे दिन वह इन्हीं चिंताओं में मग्न हुआ अपने मन को समझा रहा था-कहा संसार में अकेले मेरी ही माता मरी है? विमाताएं तो सभी इसी प्रकार की होती हैं। मेरे साथ कोई नई बात नहीं हो रही है। अब मुझे पुरुषों की भांति द्विगुण परिश्रम से अपना म करना चाहिएजैसे माता-पिता राजी रहें, वैसे उन्हें राजी रखना चाहिए। इस साल अगर छात्रवृति मिल गईतो मुझे घर से कुछ लेने की जरुरत ही न रहेगी। कितने ही लड़के अपने ही बल पर बड़ी-बड़ी उपाधियां प्राप्त कर लेते हैं। भागय के नाम को रोने-कोसने से क्या होगा।

    इतने में  जियाराम आकर खड़ा हो गया।

    मंसाराम ने पूछा-घर का क्या हाल है जिया? नई अम्मांजी तो बहुत प्रसन्न होंगी?  

    जियाराम-उनके मन का हाल तो मैं नहीं जानतालेकिन जब से तुम आये होउन्होने एक जून भी खाना नहीं खाया। जब देखोतब रोया करती हैं। जब बाबूजी आते हैंतब अलबत्ता हंसने लगती हैं। तुम चले आये तो मैंने भी शाम को अपनी किताबें संभाली। यहीं तुम्हारे साथ रहना चाहता था। भूंगी चुड़ैल ने जाकर अम्मांजी से कह दिया। बाबूजी बैठे थेउनके सामने ही अम्मांजी ने आकर मेरी किताबें छीन लीं और रोकर बोलींतुम भी चले जाओगेतो इस घर में कौन रहेगा? अगर मेरे कारण तुम लोग घर छोड़-छोड़कर भागे जा रहे तो लोमैं ही कहीं चली जाती हूं। मैं तो झल्लाया हुआ था हीवहां अब बाबूजी भी न थे, बिगड़कर बोलाआप क्यों कहीं चली जायेंगी? आपका तो घर हैआप आराम से रहिए। गैर तो हमीं लोग हैंहम न रहेंगेतब तो आपको आराम-आराम ही होग।

    मंसाराम-तुमने खूब कहाबहुत ही अच्छा कहा। इस पर और भी झल्लाई होंगी और जाकर बाबूजी से शिकायत की होगी।

    जियाराम-नहींयह कुछ नहीं हुआ। बेचारी जमीन पर बैठकर रोने लगीं। मुझे भी करुणा आ गयी। मैं भी रो पड़ा। उन्होने आंचल से मेरे आंसू पोंछे और बोलींजिया। मैं ईश्वर को साक्षी देकर कहती हूं कि मैंने तुम्हारे भैया केइविषय में तुम्हारे बाबूजी से एक शब्द भी नहीं कहा। मेरे भाग में कलंक लिखा हुआ हैवही भाग रही हूं। फिर और न जाने क्या-क्या कहाजा मेरी समझ में नहीं आया। कुछ बाबुजी की बात थी।

    मंसाराम ने उद्विग्नता से पूछा-बाबूजी के विषय में क्या कहा? कुछ याद है?

जियाराम-बातें तो भईमुझे याद नहीं आती। मेरी मेमोरी कौन बड़ी ते हैलेकिन उनकी बातों का मतलब कुछ ऐसा मालूम होता था कि उन्हें बाबूजी को प्रसन्न रखने के लिए यह स्वांग भरना पड़ रहा है। न जाने धर्म-अधर्म की कैसी बातें करती थीं जो मैं बिल्कुल न समझ सका। मुझे तो अब इसका विश्वास आ गया है कि उनकी इच्छा तुम्हें यहां भेजन की न थी।

    मंसाराम- तुम इन चालों का मतलब नहीं समझ सकते। ये बड़ी गहरी चालें हैं।

    जियाराम- तुम्हारी समझ में होंगीमेरी समझ में नहीं हैं।

    मंसाराम- जब तुम ज्योमेट्री नहीं समझ सकतेतो इन बातों को क्या समझ सकोगे? उस रात को जब मुझे खाना खाने के लिए बुलाने आयी थीं औरउनके आग्रह पर मैं जाने को तैयार भी हो गया थाउस वक्त बाबूजी को देखते ही उन्होने जो कैंडा बदलावह क्या मैं कभी भी भूल सकता हूं?

    जियाराम-यही बात मेरी समझ में नहीं आती। अभी  कल ही मैं यहां से गयातो लगीं तुम्हारा हाल पूछने। मैंने कहावह तो कहते थे कि अब कभी इस घर में कदम न रखूंगा। मैंने कुछ झूठ तो कहा नहींतुमने मुझसे कहा ही था। इतना सुनना था कि फूट-फूटकर रोने लगीं मैं दिल में बहुत पछताया कि कहां-से-कहां मैंने यह बात कह दी। बार-बार यही कहती थींक्या वह मेरे कारण घर छोड़ देंगे? मुझसे इतने नाराज है।? चले गये और मझसे मिले तक नहीं। खाना तैयार थाखाने तक नहीं आये। हाय। मैं क्या बताऊंकिस विपत्ति में हूं। इतने में बाबूजी आ गये। बस तुरन्त आंखें पोंछकर मुस्कुराती हुई उनके पास चली गई। यह बात मेरी समझ में नहीं आती। आज मुझे बड़ी मिन्नत की कि उनको साथ लेते आना। आज मैं तुम्हें खींच ले चलूंगा। दो दिन में वह कितनी दुबली हो गयी हैंतुम्हें यह देखकर उन पर दया आयी। तो चलोगे न?

    मंसाराम ने कुछ जवाब न दिया। उसके पैर कांप रहे थे। जियाराम तो हाजिरी की घंटी सुनकर भागा, पर वह बेंच पर लेट गया और इतनी लम्बी सांस लीमानो बहुत देर से उसने सांस ही नहीं ली है। उसके मुख से दुस्सह वेदना में डूबे हुए शब्द निकले-हाय ईश्वर। इस नाम के सिवा उसे अपना जीवन निराधार मालूम होता था। इस एक उच्छवास में कितना नैराश्य था, कितनी संवेदनाकितनी करुणाकितनी दीन-प्रार्थना भरी हुई थीइसका कौन अनुमान कर सकता है। अब सारा रहस्य उसकी समझ में आ रहा था और बार-बार उसका पीड़ित हृदय आर्तनाद कर रहा था-हाय ईश्वर। इतना घोर कलंक।

    क्या जीवन में इससे बड़ी विपत्ति की कल्पना की जा सकती है? क्या संसार में इससे घोरतम नीचता की कल्पना हो सकती है? आज तक किसी पिता ने अपने पुत्र पर इतना निर्दय कलंक न लगाया होगा। जिसके चरित्र की सभी प्रशंसा करते थेजो अन्य युवकों के लिए आदर्श समझा जाता थाजिसने कभी अपवित्र विचारों को अपने पास नहीं फटकने दियाउसी पर यह घोरतम कलंक। मंसाराम को ऐसा मालूम हुआमानों उसका दिल फटा जाता है।   

    दूसरी घंटी भी बज गई। लड़के अपने-अपने कमरे में गएपर मंसाराम हथेली पर गाल रखे अनिमेष नेत्रों से भूमि की ओर देख रहा थामानो उसका सर्वस्व जलमग्न हो गया होमानो वह किसी को मुंह न दिखा सकता हो। स्कूल में गैरहाजिरी हो जायेगीजुर्माना हो जायेगा, इसकी उसे चिंता नहींजब उसका सर्वस्व लुट गयातो अब इन छोटी-छोटी बातों का क्या भय? इतना बड़ा कलंक लगने पर भी अगर जीता रहूंतो मेरे जीने को धिक्कार है।

    उसी शोकातिरेक दशा में वह चिल्ला पड़ा-माताजी। तुम कहां हो? तुम्हारा बेटाजिस पर तुम प्राण देती थींजिसे तुम अपने जीवन का आधार समझती थींआज घोर संकट में है। उसी का पिता उसकी गर्दन पर छुरी फेर रहा है। हायतुम हो?

    मंसाराम फिर शांतचित्त से सोचने लगा-मुझ पर यह संदेह क्यों हो रहा है? इसका क्या कारण है? मुझमें ऐसी कौन-सी बात उन्होंने देखीजिससे उन्हें यह संदेह हुआ? वह हमारे पिता हैंमेरे शत्रु नहीं हैजो अनायास ही मझ पर यह अपराध लगाने बैठ जायें। जरुर उन्होनें कोई-कोई बात देखी या सुनी है। उनका मुझ पर कितना स्नेह था। मेरे बगैर भोजन न करते थेवही मेरे शत्रु हो जायेंयह बात अकारण नहीं हो सकती।

     अच्छाइस संदेह का बीजारोपण किस दिन हुआ?  मुझे बोर्डिंग हाउस में ठहराने की बात तो पीछे की है। उस दिन रात को वह मेरे कमरे में आकर मेरी परीक्षा लेने लगे थेउसी दिन उनकी त्योरियां बदली हुईं थीं। उस दिन ऐसी कौन-सी बात हुईजो अप्रिय लगी हो। मैं नई अम्मां से कुछ खाने को मांगने गया था। बाबूजी उस समय वहां बैठे थे। हांअब याद आती हैउसी वक्त उनका चेहरा तमतमा गया था। उसी दिन से नई अम्मां ने मुझसे पढ़ना छोड़ दिया। अगर मैं जानता कि मेरा घर में आना-जानाअम्मांजी से कुछ कहना-सुनना और उन्हें पढ़ाना-लिखाना पिताजी को बुरा लगता हैतो आज क्यों यह नौबत आती? और नई अम्मां। उन पर क्या बीत रही होगी?

    मंसाराम ने अब तक निर्मला की ओर ध्यान नहीं दिया था। निर्मला का ध्यान आते ही उसके रोंये खड़े हो गये। हाय उनका सरल स्नेहशील हृदय यह आघात कैसे सह सकेगा? आह। मैं कितने भ्रम में था। मैं उनके स्नेह को कौशल समझता था। मुझे क्या मालूम था कि उन्हें पिताजी का भ्रम शांत करने के लिए मेरे प्रति इतना कटु व्यवहार करना पड़ता है। आह। मैंने उन पर कितना अन्याय किया है। उनकी दशा तो मुझसे भी खराब हो रही होगी। मैं तो यहां चला आय, मगर वह कहां जायेंगी? जिया कहता थाउन्होंने दो दिन से भोजन नहीं किया। हरदम रोया करती हैं। कैसे जाकर समझाऊं। वह इस अभागे के पीछे क्यों अपने सिर यह विपत्ति ले रही हैं? वह बार-बार मेरा हाल पूछती हैं? क्यों बार-बार मुझे बुलाती हैं? कैसे कह दूं कि माता मुझे तुमसे जरा भी शिकायत नहीं, मेरा दिल तुम्हारी तरफ से साफ है।

    वह अब भी बैठी रो रही होंगी। कितना बड़ा अनर्थ है। बाबूजी को  यह क्या हो रहा है? क्या इसीलिए विवाह किया था? एक बालिका की हत्या करने के लिए ही उसे लाये थे? इस कोमल पुष्प को मसल डालने के लिए ही तोड़ा था।

    उनका उद्वार कैसे होगा। उस निरपराधिनी का मुख कैस उज्जवल होगा? उन्हें केवल मेरे साथ स्नेह का व्यवहार करने के लिए यह दंड दिया जा रहा है। उनकी सज्जनता का उन्हें यह उपहार मिल रहा है। मैं उन्हें इस  प्रकार निर्दय आघात सहते देखकर बैठा रहूंगा? अपनी मान-रक्षा के लिए न सहीउनकी आत्म-रक्षा के लिए इन प्राणों का बलिदान करना पड़ेगा। इसके सिवाय उद्धार का काई उपाय नहीं। आह। दिल में कैसे-कैसे अरमान थे। वे सब खाक में मिला देने होंगे। एक सती पर संदेह किया जा रहा है और मेरे कारण। मुझे अपनी प्राणों से उनकी रक्षा करनी होगीयही मेरा कर्त्तव्य है। इसी में सच्ची वीरता है। मातामैं अपने रक्त से इस कालिमा को धो दूंगा। इसी में मेरा और तुम्हारा दोनों का कल्याण है।

    वह दिन भर इन्हीं विचारों मे डूबा रहा। शाम को उसके दोनों भाई आकर घर चलने के लिए आग्रह करने लगे।

    सियाराम-चलते क्यां नही? मेरे भैयाजीचले चलो न।

    मंसाराम-मुझे फुरसत नहीं है कि तुम्हारे कहने से चला चलूं।

    जियाराम-आखिर कल तो इतवार है ही।

    मंसाराम-इतवार को भी काम है।

    जियाराम-अच्छाकल आआगे न?

    मंसाराम-नहींकल मुझे एक मैच में जाना है।

    सियाराम-अम्मांजी मूंग के लड्डू बना रही हैं। न चलोगे तो एक भी  पाआगे। हम तुम मिल के खा जायेंगेजिया इन्हें न देंगे।

    जियाराम-भैयाअगर तुम कल न गये तो शायद अम्मांजी यहीं चली आयें।

    मंसाराम-सच। नहीं ऐसा क्यों करेंगी। यहां आयींतो बड़ी परेशानी होगी। तुम कह देनावह कहीं मैच देखने गये हैं।

    जियाराम-मैं झूठ क्यों बोलने लगा। मैं कह दूंगावह मुंह फुलाये बैठे थे। देख ले उन्हें साथ लाता हूं कि नहीं।

सियाराम-हम कह देंगे कि आज पढ़ने नहीं गये। पड़े-पड़े सोते रहे।

    मंसाराम ने इन दूतों से कल आने का वादा करके गला छुड़ाया। जब दोनों चले गयेतो फिर चिंता में डूबा। रात-भर उसे करवटें बदलते गुजरी। छुट्टी का दिन भी बैठे-बैठे कट गयाउसे दिन भर शंका होती रहती कि कहीं अम्मांजी सचमुच न चली आयें। किसी गाड़ी की खड़खड़ाहट सुनतातो उसका कलेजा धकधक करने लगता। कहीं आ तो नहीं गयीं?

    छात्रालय में एक छोटा-सा औषधालय था। एक डांक्टर साहब संध्या समय एक घण्टे के लिए आ जाया करते थे। अगर कोई लड़का बीमार होता तो उसे दवा देते। आज वह आये तो मंसाराम कुछ सोचता हुआ उनके पास जाकर खड़ा हो गया। वह मंसाराम को अच्छी तरह जानते थे। उसे देखकर आश्चर्य से बोले-यह तुम्हारी क्या हालत है जी? तुम तो मानो गले जा रहे हो। कहीं बाजार का का चस्का तो नहीं पड़ गया? आखिर तुम्हें हुआ क्या? जरा यहां तो आओ।

    मंसाराम ने मुस्कराकर कहा-मुझे जिन्दगी का रोग है। आपके पास इसकी भी तो कोई दवा है?

    डाक्टर-मैं तुम्हारी परीक्षा करना चाहता हूं। तुम्हारी सूरत ही बदल गयी है, पहचाने भी नहीं जाते।  

    यह कहकर, उन्होने मंसाराम का हाथ पकड़ लिया और छातीपीठआंखेंजीभ सब बारी-बारी से देखीं। तब चिंतित होकर बोले-वकील साहब से मैं आज ही मिलूंगा। तुम्हें थाइसिस हो रहा है। सारे लक्षण उसी के हैं।

    मंसाराम ने बड़ी उत्सुकता से पूछा-कितने दिनों में काम तमाम हो जायेगाडक्टर साहब?

    डाक्टर-कैसी बात करते हो जी। मैं वकील साहब से मिलकर तुम्हें किसी पहाड़ी जगह भेजने की सलाद दूंगा। ईश्वर ने चाहातो बहुत जल्द अच्छे हो जाओगे। बीमारी अभी पहले स्टेज में है।

    मंसाराम-तब तो अभी साल दो साल की देर मालूम होती है। मैं तो इतना इंतजार नहीं कर सकता। सुनिएमुझे थायसिस-वायसिस कुछ नहीं हैन कोई दूसरी शिकायत ही है, आप बाबूजी को नाहक तरद्रदुद में न डालिएगा। इस वक्त मेरे सिर में दर्द हैकोई दवा दीजिए। कोई ऐसी दवा होजिससे नींद भी आ जाये। मुझे दो रात से नींद नहीं आती।

    डॉक्टर ने जहरीली दवाइयों की आलमारी खोली और शीशी से थोड़ी सी दवा निकालकर मंसाराम को दी। मंसाराम ने पूछा-यह तो कोई जहर है भला इस कोई पी ले तो मर जाये?

    डॉक्टर-नहींमर तो नहीं जायेपर सिर में चक्कर जरूर आ जाये।

मंसाराम-कोई ऐसी दवा भी इसमें हैजिसे पीते ही प्राण निकल जायें?

    डॉक्टर-ऐसी एक-दो नहीं कितनी ही दवाएं हैं। यह जो शीशी देख रहे होइसकी एक बूंद भी पेट में चली जायेतो जान न बचे। आनन-फानन में मौत हो जाये।

    मंसाराम-क्यों डॉक्टर साहबजो लोग जहर खा लेते हैंउन्हें बड़ी तकलीफ होती होगी?

    डॉक्टर-सभी जहरों में तकलीफ नहीं होती। बाज तो ऐसे हैं कि पीते ही आदमी ठंडा हो जाता है। यह शीशी इसी किस्म की हैइस पीते ही आदमी बेहोश हो जाता हैफिर उसे होश नहीं आता।

    मंसाराम ने सोचा-तब तो प्राण देना बहुत आसान हैफिर क्यों लोग इतना डरते हैं? यह शीशी कैसे मिलेगी? अगर दवा का नाम पूछकर शहर के किसी दवा-फरोश से लेना चाहूंतो वह कभी न देगा। ऊंहइसे मिलने में कोई दिक्कत नहीं। यह तो मालूम हो गया कि प्राणों का अन्त बड़ी आसानी से किया जा सकता है। मंसाराम इतना प्रसन्न हुआमानो कोई इनाम पा गया हो। उसके दिल पर से बोझ-सा हट गया। चिंता की मेघ-राशि जो सिर पर मंडरा रही थीछिन्न-भिन्न्  हो गयी। महीनों बाद आज उसे मन में एक स्फूर्ति का अनुभव हुआ। लड़के थियेटर देखने जा रहे थे, निरीक्षक से आज्ञा ले ली थी। मंसाराम भी उनके साथ थियेटर देखने चला गया। ऐसा खुश थामानो उससे ज्यादा सुखी जीव संसार में कोई नहीं है। थियेटर में नकल देखकर तो वह हंसते-हंसते लोट गया। बार-बार तालियां बजाने और वन्स मोर की हांक लगाने में पहला नम्बर उसी का था। गाना सुनकर वह मस्त हो जाता थाऔर ओहो हो। करके चिल्ला उठता था। दर्शकों की निगाहें  बार-बार उसकी तरफ उठ जाती थीं। थियेटर के पात्र भी उसी की ओर ताकते थे और यह जानने को उत्सुक थे कि कौन महाशय इतने रसिक और भावुक हैं। उसके मित्रों को उसकी उच्छृंखलता पर आश्चर्य हो रहा था। वह बहुत ही शांतचित्तगम्भीर स्वभाव का युवक था। आज वह क्यों इतना हास्यशील हो गया हैक्यों उसके विनोद का पारावार नहीं है।

    दो बजे रात को थियेटर से लौटने पर भी उसका हास्योन्माद कम नहीं हुआ। उसने एक लड़के की चारपाई उलट दीकई लड़कों के कमरे के द्वार बाहर से बंद कर दिये और उन्हें भीतर से खट-खट करते सुनकर हंसता रहा। यहां तक कि छात्रालय के अध्यक्ष महोदय करी नींद में भी शोरगुल सुनकर खुल गयी और उन्होंने मंसाराम की शरारत पर खेद प्रकट किया। कौन जानता है कि उसके अन्त:स्थल में कितनी भीषण क्रांति हो रही है? संदेह के निर्दय आघात ने उसकी लज्जा और आत्मसम्मान को कुचल डाला है। उसे अपमान और तिरस्कार का लेशमात्र भी भय नहीं है। यह विनोद नहींउसकी आत्मा का करुण विलाप है। जब और सब लड़के सो गयेतो वह भी चारपाई पर लेटालेकिन उसे नींद नहीं आयी। एक क्षण के बाद वह बैठा और अपनी सारी पुस्तकें बांधकर संदूक में रख दीं। जब मरना ही हैतो पढ़कर क्या होगा? जिस जीवन में ऐसी-एसी बाधाएं हैंऐसी-ऐसी यातनाएं हैंउससे मृत्यु कहीं अच्छी।

    यह सोचते-सोचते तड़का हो गया। तीन रात से वह एक क्षण भी न सोया था। इस वक्त वह उठा तो उसके पैर थर-थर कांप रहे थे और सिर में चक्कर सा आ रहा था। आंखें जल रही थीं और शरीर के सारे अंग शिथिल हो रहे थे। दिन चढ़ता जाता था और उसमें इतनी शक्ति दिन चढ़ता जाता था और उसमें इतनी शक्ति भी न थी कि उठकर मुंह हाथ धो डाले। एकाएक उसने भूंगी को रूमाल में कुछ लिए हुए एक कहार के साथ आते देखा। उसका कलेजा सन्न रह गया। हाय। ईश्वर वे आ गयीं। अब क्या होगा? भूंगी अकेले नहीं आयी होगी? बग्घी जरूर बाहर खड़ी होगी? कहां तो उससे उठा प्रश्न जाता थाकहां भूंगी को देखते ही दौड़ा और घबराई हुई आवाज में बोला-अम्मांजी भी आयी हैंक्या रे? जब मालूम हुआ कि अम्मांजी नहीं आयीतब उसका चित्त शांत हुआ।

    भूंगी ने कहा-भैया। तुम कल गये नहीबहूजी तुम्हारी राह देखती रह गयीं। उनसे क्यों रुठे हो भैया? कहती हैंमैंने उनकी कुछ भी शिकायत नहीं की है। मुझसे आज रोकर कहने लगीं-उनके पास यह मिठाई लेती जा और कहना, मेरे कारण क्यों घर छोड़ दिया है? कहां रख दूं यह थाली?

    मंसाराम ने रुखाई से कहा-यह थाली अपने सिर पर पटक दे चुड़ैल। वहां से चली है मिठाई लेकर। खबरदारजो फिर कभी इधर आयी। सौगात लेकर चली है। जाकर कह देनामुझे उनकी मिठाई नहीं चाहिए। जाकर कह देनातुम्हारा घर है तुम रहोवहां वे बड़े आराम से हैं। खूब खाते और मौज करते हैं। सुनती हैबाबूजी की मुंह पर कहनासमझ गयी? मुझे किसी का डर नहीं हैऔर जो करना चाहें, कर डालेंजिससे दिल में कोई अरमान न रह जाये। कहें तो इलाहाबादलखनऊकलकत्ता चला जाऊं। मेरे लिए जैसे बनारस वैसे दूसरा शहर। यहां क्या रखा है?

    भूंगी-भैयामिठाई रख लोनहीं रो-रोकर मर जायेंगी। सच मानो रो-रोकर मर जायेंगी।

    मंसाराम ने आंसुओं के उठते हुए वेग को दबाकर कहा-मर जायेंगीमेरी बला से। कौन मुझे बड़ा सुख दे दिया हैजिसके लिए पछताऊं। मेरा तो उन्होंने सर्वनाश कर दिया। कह देना, मेरे पास कोई संदेशा न भेजेंकुछ जरूरत नहीं।

    भूंगी- भैयातुम तो कहते हो यहां खूब खाता हूं और मौज करता हूंमगर देह तो आधी भी न रही। जैसे आये थेउससे आधे भी न रहे।

मंसाराम-यह तेरी आंखों का फेर है। देखनादो-चार दिन में मुटाकर कोल्हू हो जाता हूं कि नहीं। उनसे यह भी कह देना कि रोना-धोना बंद करें। जो मैंने सुना कि रोती हैं और खाना नहीं खातींमुझसे बुरा कोई नहीं। मुझे घर से निकाला हैतो आप न से रहें। चली हैंप्रेम दिखाने। मैं ऐसे त्रिया-चरित्र बहुत पढ़े बैठा हूं।

    भूंगी चली गयी। मंसाराम को उससे बातें करते ही कुछ ठण्ड मालूम होने लगी थी। यह अभिनय करने के लिए उसे अपने मनोभावों को जितना दबाना पड़ा थावह उसके लिए असाध्य था। उसका आत्म-सम्मान उसे इस कुटिल व्यवहार का जल्द-से-जल्द अंत कर देने के लिए बाध्य कर रहा थापर इसका परिणाम क्या होगा? निर्मला क्या यह आघात सह सकेगी? अब तक वह मृत्यु की कल्पना करते समय किसी अन्य प्राणी का विचार न करता थापर आज एकाएक ज्ञान हुआ कि मेरे जीवन के साथ एक और प्राणी का जीवन-सूत्र भी बंधा हुआ है। निर्मला यह समझेगी कि मेरी निष्ठुरता ही ने इनकी जान ली। यह समझकर उसका कोमल हृदय फट न जायेगा? उसका जीवन तो अब भी संकट  में है। संदेह के कठोर पंजे में फंसी हुई अबला क्या अपने का हत्यारिणी समझकर बहुत दिन जीवित रह सकती है?

    मंसाराम ने चारपाई पर लेटकर लिहाफ ओढ़ लियाफिर भी सर्दी से कलेजा कांप रहा था। थोड़ी ही देर में उसे जोर से ज्वर चढ़ आयावह बेहोश हो गया। इस अचेत दशा में उसे भांति-भांति के स्वप्न दिखाई देने लगे। थोड़ी-थोड़ी देर के बाद चौंक पड़ताआंखें खुल जातीफिर बेहोश हो जाता।

    सहसा वकील साहब की आवाज सुनकर वह चौंक पड़ा। हांवकील साहब की आवाज थी। उसने लिहाफ फेंक दिया और चारपाई से उतरकर नीचे खड़ा हो गया। उसके मन में एक आवेग हुआ कि इस वक्त इनके सामने प्राण दे दूं। उसे ऐसा मालूम हुआ कि मैं मर जाऊंतो इन्हें सच्ची खुशी होगी। शायद इसीलिए वह देखने आये हैं कि मेरे मरने में कितनी देर है। वकील साहब ने उसका हाथ पकड़ लियाजिससे वह गिर न पड़े और पूछा-कैसी तबीयत है लल्लू। लेटे क्यों न रहे? लेट न जाओतुम खड़े क्यों हो गये?

    मंसाराम-मेरी तबीयत तो बहुत अच्छी है। आपको व्यर्थ ही कष्ट हुआ।    मुंशी जी ने कुछ जवाब न दिया। लड़के की दशा देखकर उनकी आंखों से आंसू निकल आये। वह हृष्ट-पुष्ट बालकजिसे देखकर चित्त प्रसन्न हो जाता थाअब सूखकर कांटा हो गया था। पांच-छ: दिन में ही वह इतना दुबला हो गया था कि उसे पहचानना कठिन था। मुंशीजी ने उसे आहिस्ता से चारपाई पर लिटा दिया और लिहाफ अच्छी तरह उसे उढ़ाकर सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। कहीं लड़का हाथ से तो नहीं जाएगा। यह ख्याल करके वह शोक विह्ववल हो गये और स्टूल पर बैठकर फूट-फूटकर रोने लगे। मंसाराम भी लिहाफ में मुंह लपेटे रो रहा था। अभी थोड़े ही दिनों पहले उसे देखकर पिता का हृदय गर्व से फूल उठता थालेकिन आज उसे इस दारुण दशा में देखकर भी वह सोच रहे हैं कि इसे घर ले चलूं या नहीं। क्या यहां दवा नहीं हो सकती? मैं यहां चौबीसों घण्टे बैठा रहूंगा। डॉक्टर साहब यहां हैं ही। कोई दिक्कत न होगी। घर ले चलने से में उन्हें बाधाएं-ही-बाधाएं दिखाई देती थींसबसे बड़ा भय यह था कि वहां निर्मला इसके पास हरदम बैठी रहेगी और मैं मना न कर सकूंगायह उनके लिए असह्य था।

    इतने में अध्यक्ष ने आकर कहा-मैं तो समझता हूं कि आप इन्हें अपने साथ ले जायें। गाड़ी है ही, कोई तकलीफ न होगी। यहां अच्छी तरह देखभाल न हो सकेगी।   

    मुंशीजी-हांआया तो मैं इसी खयाल से थालेकिन इनकी हालत बहुत ही नाजुक मालूम होती है। जरा-सी असावधानी होने से सरसाम हो जाने का भय है।

    अध्यक्ष-यहां से इन्हें ले जाने में थोड़ी-सी दिक्कत जरुर हैलेकिन यह तो आप खुद सोच सकते हैं कि घर पर जो आराम मिल सकता हैवह यहां किसी तरह नहीं मिल सकता। इसके अतिरिक्त किसी बीमार लड़के को यहां रखना नियम-विरुद्ध भी है।

    मुंशीजी- कहिए तो मैं हेडमास्टर से आज्ञा ले लूं। मुझे इनका यहां से इस हालत में ले जाना किसी तरह मुनासिब नहीं मालूम होता।

    अध्यक्ष ने हेडमास्टर का नाम सुनातो समझे कि यह महाशय धमकी दे रहे हैं। जरा तिनककर बोले-हेडमास्टर नियम-विरुद्व कोई बात नहीं कर सकते। मैं इतनी बड़ी जिम्मेदारी कैसे ले सकता हूं?

    अब क्या हो? क्या घर ले जाना ही पड़ेगा? यहां रखने का तो यह बहाना था कि ले जाने बीमारी बढ़ जाने की शंका है। यहां से ले जाकर हस्पताल में ठहराने का कोई बहाना नहीं है। जो सुनेगावह यही कहेगा कि डाक्टर की फीस बचाने के लिए लड़के को अस्पताल फेंक आयेपर अब ले जाने के सिवा  और कोई उपाय न था। अगर अध्यक्ष महोदय इस वक्त रिश्वत लेने पर तैयार हो जातेतो शायद दो-चार साल का वेतन ले लेतेलेकिन कायदे के पाबंद लोगों में इतनी बुद्विइतनी चतुराई कहां। अगर इस वक्त मुंशीजी को कोई आदमी ऐसा उज्र सुझा देताजिसमें उनहें मंसाराम को घर न ले जाना पड़ेतो वह आजीवन असका एहसान मानते। सोचने का समय भी न था। अध्यक्ष महोदय शैतान की तरह सिर पर सवार था।  विवश होकर मुंशीजी ने दोनों साईसों को बुलाया और मंसाराम को उठाने लगे। मंसाराम अर्धचेतना की दशा में थाचौककर बोला, क्या है? कोन है?

मुंशीजी-कोई नहीं है बेटामैं तुम्हें घर ले चलना चाहता हूंआओगोद में उठा लूं।

    मंसाराम- मुझे क्यों घर ले चलते हैं? मैं वहां नहीं जाऊंगा।

    मुंशीजी- यहां तो रह नहीं सकतनियम ही ऐसा है।

    मंसाराम- कुछ भी होवहां न जाऊंगा। मुझे और कहीं ले चलिएकिसी पेड़ के नीचेकिसी झोंपड़े मेंजहां चाहे रखिएपर घर पर न ले चलिए।

    अध्यक्ष ने मुंशीजी से कहा-आप इन बातों का ख्याल न करेंयह तो होश में नहीं है।  

    मंसाराम- कौन होश में नहीं है? मैं होश में नहीं हूं? किसी को गालियां देता हू? दांत काटता हूं? क्यों होश में नहीं हूं? मुझे यहीं पड़ा रहने दीजिएजो कुछ होना होगाअगरन ऐसा हैतो मुझे अस्पताल ले चलिएमैं वहां पड़ा रहूंगा। जीना होगाजीऊगामरना होगा मरुंगालेकिन घर किसी तरह भी न जाऊंगा।

    यह जोर पाकर मुंशीजी फिरा अध्यक्ष की मिन्नतें करने लगेलेकिन वह कायदे का पाबंदी आदमी कुछ सुनता ही न था। अगर छूत की बीमारी हुई और किसी दूसरे लड़के को छूत लग गयीतो कौन उसका जवाबदेह होगा। इस तर्क के सामने मुंशीजी की कानूनी दलीलें भी मात हो गयीं।

    आखिर मुंशीजी ने मंसाराम से कहा-बेटातुम्हें घर चलने से क्यों इंकार हो रहा है? वहां तो सभी तरह का आराम रहेगा। मुंशीजी ने कहने को तो यह बात कह दीलेकिन डर रहे थे कि कहीं सचमुच मंसाराम च लने पर राजी न हो जाये। मंसाराम को अस्पताल में रखने का कोई बहाना खोज रहे थे और उसकी जिम्मेदारी मंसाराम ही के सिर डालना चाहते थे। यह  अध्यक्ष के सामने की बात थीवह इस बात की साक्षी दे सकते थे कि मंसाराम अपनी जिद से अस्पताल जा रहा है। मुंशीजी का इसमे लेशमात्र भी दोष नहीं है।

    मंसाराम ने झल्लाकर हा-नहींनहीं सौ बार नहींमैं घ नहीं जाऊंगा। मुझे अस्पताल ले चलिए और घर के सब  आदमियों को मना कर दीजिए कि  मुझे देखने न आये। मुझे कुछ नहीं हुआ है, बिल्कुल बीमार नहीं हू। आप मुझे छोड़ दीजिएमैं अपने पांव से चल सकता हूं।

    वह उठ खड़ा हुआ और उन्मत्त की भांति द्वार की ओर चलालेकिन पैर लड़खडा गये। यदि मुंशीजी ने संभाल न लिया होतातो उसे बड़ी चोट आती। दोनों नौकरों की मदद से मुंशीजी उसे बग्घी के पास लाये और अंदर बैठा दिया।

    गाड़ी अस्पताल की ओर चली। वही हुआ जो मुंशीजी चाहते थे। इस शोक में भी उनका चित्त संतुष्ट था। लड़का अपनी इच्छा से अस्पताल जा रहा था क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं था कि घर में इसे कोई स्नेह नहीं है? क्या इससे यह सिद्ध नहीं होता कि मंसाराम निर्दोष है ? वह उसक पर अकारण ही भ्रम कर रहे थे।

    लेकिन जरा ही देर में इस तुष्टि की जगह उनके मन में ग्लानि का भाव जाग्रत हुआ। वह अपने प्राण-प्रिय पुत्र को घर न ले जाकर अस्पताल लिये जा रहे थे। उनके विशाल भवन में उनके पुत्र के लिए जगह न थीइस दशा में भी जबकि उसकी जीवल संकट में पड़ा हुआ था। कितनी विडम्बना है!

    एक क्षण के बाद एकाएक मुंशीजी के मन में प्रश्न उठा-कहीं मंसाराम उनके भावों को ताड़ तो नहीं गया? इसीलिए तो उसे घर से घृणा नहीं हो गेयी है? अगर ऐसा हैतो गजब हो जायेगा।

    उस अनर्थ की कल्पना ही से मुंशीजी के रोंए खड़े हो गये और कलेजा धक्धक करने लगा। हृदय में एक धक्का-सा लगा। अगर इस ज्वर का यही कारण हैतो ईश्वर ही मालिक है। इस समय उनकी दशा अत्यन्त दयनीय थी। वह आग जो उन्होंने अपने ठिठुरे हुए हाथों को सेंकने के लिए जलाई थी, अब उनके घर में लगी जा रही थी। इस करुणाशोकपश्चात्ताप और शंका से उनका चित्त घबरा उठा। उनके गुप्त रोदन की ध्वनि बाहर निकल सकतीतो सुनने वाले रो पड़ते। उनके आंसू बाहर निकल सकतेतो उनका तार बंध जाता। उन्होंने पुत्र के वर्ण-हीन मुख की ओर एक वात्सल्यूपर्ण नेत्रों से देखावेदना से विकल होकर उसे छाती से लगा लिया और इतना रोये कि हिचकी बंच गयी।

    सामने अस्पताल का फाटक दिखाई दे रहा था।

   

ग्यारह

 

मुं

शी तोताराम संध्या समय कचहरी से घर पहुंचेतो निर्मला ने पूछा- उन्हें देखाक्या हाल है? मुंशीजी ने देखा कि निर्मला के मुख पर नाममात्र को भी शोक याचिनता का चिन्ह नहीं है। उसका बनाव-सिंगार और दिनों से भी कुछ गाढ़ा हुआ है। मसलन वह गले का हार न पहनती थीपर आजा वह भी गले मे शोभ दे रहा था। झूमर से भी उसे बहुत प्रेम थावह आज वह भी महीन रेशमी साड़ी के नीचे, काले-काले केशों के ऊपरफानुस के दीपक की भांति चमक रहा था।

    मुंशीजी ने मुंह फेरकर कहा- बीमार है और क्या हाल बताऊं?

निर्मला- तुम तो उन्हें यहां लाने गये थे?

    मुंशीजी ने झुंझलाकर कहा- वह नहीं आतातो क्या मैं जबरदस्ती उठा लाता? कितना समझाया कि बेटा घर चलोवहां तुम्हें कोई तकलीफ न होने पावेगीलेकिन घर का नाम सुनकर उसे जैसे दूना ज्वर हो जाता था। कहने लगा- मैं यहां मर जाऊंगालेकिन घर न जाऊंगा। आखिर मजबूर होकर अस्पताल पहुंचा आया और क्या करता?

    रुक्मिणी भी आकर बरामदे में खड़ी हो गई थी। बोलीं- वह जन्म का हठी हैयहां किसी तरह न आयेगा और यह भी देख लेनावहां अच्छा भी न होगा?

    मुंशीजी ने कातर स्वर में कहा- तुम दो-चार दिन के लिए वहां चली जाओतो बड़ा अच्छा हो बहन, तुम्हारे रहने से उसे तस्कीन होती रहेगी। मेरी बहनमेरी यह विनय मान लो। अकेले वह रो-रोकर प्राण दे देगा। बस हाय अम्मां! हाय अम्मां! की रट लगाकर रोया करता है। मैं वहीं जा रहा हूंमेरे साथ ही चलो। उसकी दशा अच्छी नहीं। बहनवह सूरत ही नहीं रही। देखें ईश्वर क्या करते हैं?

    यह कहते-कहते मुंशीजी की आंखों से आंसू बहने लगेलेकिन रुक्मिणी अविचलित भाव से बोली- मैं जाने को तैयार हूं। मेरे वहां रहने से अगर मेरे लाल के प्राण बच जायेंतो मैं सिर के बल दौड़ी जाऊंलेकिन मेरा कहना गिरह में बांध लो भैयावहां वह अच्छा न होगा। मैं उसे खूब पहचानती हूं। उसे कोई बीमारी नहीं हैकेवल घर से निकाले जाने का शोक है। यही दु:ख ज्वर के रुप में प्रकट हुआ है। तुम एक नहींलाख दवा करोसिविल सर्जन को ही क्यों न दिखाओउसे कोई दवा असार न करेगी।

    मुंशीजी- बहन उसे घर से निकाला किसने है? मैंने तो केवल उसकी पढ़ाई के खयाल से उसे वहां भेजा था।

    रुक्मिणी- तुमने चाहे जिस खयाल से भेजा होलेकिन यह बात उसे लग गयी। मैं तो अब किसी गिनती में नहीं हूंमुझे किसी बात में बोलने का कोई अधिकार नहीं। मालिक तुममालकिन तुम्हारी स्त्री। मैं तो केवल तुम्हारी रोटियों पर पड़ी हुई अभगिनी विधवा हूं। मेरी कौन सुनेगा और कौन परवाह करेगा? लेकिन बिना बोले रही नहीं जाता। मंसा तभी अच्छा होगा: जब घर आयेगाजब तुम्हारा हृदय वही हो जायेगाजो पहले था।

    यह कहकर रुक्मिणी वहां से चली गयींउनकी ज्योतिहीनपर अनुभवपूर्ण आंखों के सामने जो चरित्र हो रहे थेउनका रहस्य वह खूब समझती थीं और उनका सारा क्रोध निरपराधिनी निर्मला ही पर उतरता था। इस समय भी वह कहते-कहते रुग गयींकि जब तक यह लक्ष्मी इस घर में रहेंगीइस घर की दशा बिगड़ती हो जायेगी। उसको प्रगट रुप से न कहने पर भी उसका आशय मुंशीजी से छिपा नहीं रहा। उनके चले जाने पर मुंशीजी ने सिर झुका लिया और सोचने लगे। उन्हें अपने ऊपर इस समय इतना क्रोध आ रहा था कि दीवार से सिर पटककर प्राणों का अन्त कर दें। उन्होंने क्यों विवाह किया था? विवाह करेन की क्या जरुरत थी? ईश्वर ने उन्हें एक नहींतीन-तीन पुत्र दिये थे? उनकी अवस्था भी पचास के लगभग पहुंच गेयी थी फिर उन्होंने क्यों विवाह किया? क्या इसी बहाने ईश्वर को उनका सर्वनाश करना मंजूर था? उन्होंने सिर उठाकर एक बार निर्मला को सहासपर निश्चल मूर्ति देखी और अस्पताल चले गये। निर्मला की सहासछवि ने उनका चित्त शान्त कर दिया था। आज कई दिनों के बाद उन्हें शान्ति मयसर हुई थी। प्रेम-पीड़ित हृदय इस दशा में क्या इतना शान्त और अविचलित रह सकता है? नहींकभी नहीं। हृदय की चोट भाव-कौशल से नहीं छिपाई जा सकती। अपने चित्त की दुर्बनजा पर इस समय उन्हें अत्यन्त क्षोभ हुआ। उन्होंने अकारण ही सन्देह को हृदय में स्थान देकर इतना अनर्थ किया। मंसाराम की ओर से भी उनका मन नि:शंक हो गया। हां उसकी जगह अब एक नयी शंका उत्पन्न हो गयी। क्या मंसाराम भांप तो नहीं गया? क्या भांपकर ही तो घर आने से इन्कार नहीं कर रहा है? अगर वह भांप गया हैतो महान् अनर्थ हो जायेगा। उसकी कल्पना ही से उनका मन दहल उठा। उनकी देह की सारी हड्डियां मानों इस हाहाकार पर पानी डालने के लिए व्याकुल हो उठीं। उन्होंने कोचवान से घोड़े को तेज चलाने को कहा। आज कई दिनों के बाद उनके हृदय मंडल पर छाया हुआ सघन फट गया था और प्रकाश की लहरें अन्दर से निकलने के लिए व्यग्र हो रही थीं। उन्होंने बाहर सिर निकाल कर देखा, कोचवान सो तो नहीं रहा ह। घोड़े की चाल उन्हें इतनी मन्द कभी न मालूम हुई थी।

    अस्पताल पहुंचकर वह लपके हुए मंसाराम के पास गये। देखा तो  डॉक्टर साहब उसके सामने चिन्ता में मग्न खड़े थे। मुंशीजी के हाथ-पांव फूल गये। मुंह से शब्द न निकल सका। भरभराई हुई आवाज में बड़ी मुश्किल से बोले- क्या हाल हैडॉक्टर साहब? यह कहते-कहते वह रो पड़े और जब डॉक्टर साहब को उनके प्रश्न का उत्तर देने में एक क्षण का विलम्बा हुआतब तो उनके प्राण नहों में समा गये। उन्होंने पलंग पर बैठकर अचेत बालक को गोद में उठा लिया और बालक की भांति सिसक-सिसककर रोने लगे। मंसाराम की देह तवे की तरह जल रही थी। मंसाराम ने एक बार आंखें खोलीं। आहकितनी भयंकर और उसके साथ ही कितनी दी दृष्टि थी। मुंशीजी ने बालक को कण्ठ से लगाकर डॉक्टर से पूछा-क्या हाल हैसाहब! आप चुप क्यों हैं?

    डॉक्टर ने संदिग्ध स्वर से कहा- हाल जो कुछ हैवह आपे देख ही रहे हैं। 106 डिग्री का ज्वर है और मैं क्या बताऊं? अभी ज्वर का प्रकोप बढ़ता ही जाता है। मेरे किये जो कुद हो सकता हैकर रहा हूं। ईश्वर मालिक है। जबसे आप गये हैंमैं एक मिनट के लिए भी यहां से नहीं हिला। भोजन तक नहीं कर सका। हालत इतनी नाजुक है कि एक मिनट में क्या हो जायेगानहीं कहा जा सकता? यह महाज्वर हैबिलकुल होश नहीं है। रह-रहकर डिलीरियम का दौरा-सा हो जाता है। क्या घर में इन्हें किसी ने कुछ कहा है! बार-बारअम्मांजीतुम कहां हो! यही आवाज मुंह से निकली है।

डॉक्टर साहब यह कह ही रहे थे कि सहसा मंसाराम उठकर बैठ गया और धक्के से मुंशीज को चारपाई के नीचे ढकेलकर उन्मत्त स्वर से बोला- क्यों धमकाते हैंआप! मार डालिएमार डालि, अभी मार डालिए। तलवार नहीं मिलती! रस्सी का फन्दा है या वह भी नहीं। मैं अपने गले में लगा लूंगा। हाय अम्मांजीतुम कहां हो! यह कहते-कहते वह फिर अचेते होकर गिर पड़ा।

    मुंशीजी एक क्षण तक मंसाराम की शिथिल मुद्रा की ओर व्यथित नेत्रों से ताकते रहेफिर सहस उन्होंने डॉक्टर साहब का हाथ पकड़ लिया और अत्यन्त दीनतापूर्ण आग्रह से बोले-डॉक्टर साहबइस लड़के को बचा लीजिएईश्वर के लिए बचा लीजिएनहीं मेरा सर्वनाश हो जायेगा। मैं अमीर नहीं हूं लेकिन आप जो कुछ कहेंगेवह हाजिर करुंगाइसे बचा लीजिए। आप बड़े-से-बड़े  डॉक्टर को बुलाइए और उनकी राय लीजिएक मैं सब खर्च दूंगा। इसीक अब नहीं देखी जाती। हायमेरा होनहार बेटा!

डॉक्टर साहब ने करुण स्वर में कहा- बाबू साहबमैं आपसे सत्य कह रहा हूं कि मैं इनके लिए अपनी तरफ से कोई बात उठा नहीं रख रहा हूं। अब आप दूसरे डॉक्टरों से सलाह लेने को कहते हैं। अभी डॉक्टर लाहिरीडॉक्टर भाटिया और डॉक्टर माथुर को बुलाता हूं। विनायक शास्त्री को भी बुलाये लेता हूंलेकिन मैं आपको व्यर्थ का आश्वासन नहीं देना चाहताहालत नाजुक है।

    मंशीजी ने रोते हुए कहा- नहींडॉक्टर साहबयह शब्द मुंह से न निकालिए। हाल इसके दुश्मनों की नाजुक हो। ईश्वर मुझ पर इतना कोप न करेंगे। आप कलकत्ता और बम्बई के डॉक्टरों को तारा दीजिएमैं जिन्दगी भर आपकी गुलामी करुंगा। यही मेरे कुल का दीपक है। यही मेरे जीवन का आधार है। मेरा हृदय फटा जा रहा है। कोई ऐसी दवा दीजिएजिससे इसे होश आ जाये। मैं जरा अपने कानों से उसकी बाते सुनूं जानूं कि उसे क्या कष्ट हो रहा है? हायमेरा बच्चा!

    डॉक्टर- आप जरा दिल को तस्कीन दीजिए। आप बुजुर्ग आदमी हैंयों हाय-हाय करने और डॉक्टरों की फौज जमा करने से कोई नतीजा न निकलेगा। शान्त होकर बैठिएमैं शहर के लोगों को बुला रहा हूंदेखिए क्या कहते हैं? आप तो खुद ही बदहवास हुए जाते हैं।

मुंशीजी- अच्छाडॉक्टर साहब! मैं अब न बोलूंगजबान तब तक न खोलूंगाआप जो चाहे करेंबच्चा अब हाथ में है। आप ही उसकी रक्षा कर सकते हैं। मैं इतना ही चाहता हूं कि जरा इसे होश आ जायेमुझे पहचान लेमेरी बातें समझने लगे। क्या कोई ऐसी संजीवनी बूटी नहीं? मैं इससे दो-चार बातें कर लेता।

    यह कहते-कहते मुंशीजी आवेश में आकर मंसाराम से बोले- बेटाजरा आंखें खोलोकैसा जी है? मैं तुम्हारे पास बैठा रो रहा हूंमुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं हैमेरा दिल तुम्हारी ओर से साफ है।

    डॉक्टर- फिर आपने अनर्गला बातें करनी शुरु कीं। अरे साहबआप बच्चे नहीं हैंबुजुर्ग है, जरा धैर्य से काम लीजिए।

    मुंशीजी- अच्छाडॉक्टर साहबअब न बोलूंगाखता हुई। आप जो चाहें कीजिए। मैंने सब कुछ आप पर छोड़ दिया। कोई ऐसा उपाय नहींजिससे मैं इसे इतना समझा सकूं कि मेरा दिल साफ है? आप ही कह दीजिए डॉक्टर साहब, कह दीजिएतुम्हारा अभागा पिता बैठा रो रहा है। उसका दिल तुम्हारी तरफ से बिलकुल साफ है। उसे कुछ भ्रम हुआ था। वब अब दूर हो गया। बसइतना ही कर दीजिए। मैं और कुछ नहीं चाहता। मैं चुपचाप बैठा हूं। जबान को नहीं खोलतालेकिन आप इतना जरुर कह दीजिए।

    डॉक्टर- ईश्वर के लिए बाबू साहबजरा सब्र कीजिएवरना मुझे मजबूर होकर आपसे कहना पड़ेगा कि घर जाइए। मैं जरा दफ्तर में जाकर डॉक्टरों को खत लिख रहा हूं। आप चुपचाप बैठे रहिएगा।

    निर्दयी डॉक्टर! जवान बेटे की यहा दशा देखकर कौन पिता हैजो धैर्य से कामे लेगा? मुंशीजी बहुत गम्भीर स्वभाव के मनुष्य थे। यह भी जानते थे कि इस वक्त हाय-हाय मचाने से कोई नतीजा नहीं, लेकिन फिरी भी इस समय शान्त बैठना उनके लिए असम्भव था। अगर दैव-गति से यह बीमारी होतीतो वह शान्त हो सकते थेदूसरों को समझा सकते थेखुद डॉक्टरों का बुला सकते थेलेकिन क्यायह जानकर भी धैर्य रख सकते थे कि यह सब आग मेरी ही लगाई हुई है? कोई पिता इतना वज्र-हृदय हो सकता है? उनका रोम-रोम इस समय उन्हें धिक्कार रहा था। उन्होंने सोचामुझे यह दुर्भावना उत्पन्न ही क्यों हुई? मैंने क्यां बिना किसी प्रत्यक्ष प्रमाण के ऐसी भीषण कल्पना कर डाली? अच्दा मुझे उसक दशा में क्या करना चाहिए था। जो कुछ उन्होंने किया उसके सिवा वह और क्या करतेइसका वह निश्चय न कर सके। वास्तव में विवाह के बन्धन में पड़ना ही अपने पैरों में कुल्हाड़ी माराना था। हांयही सारे उपद्रव की जड़ है।

    मगर मैंने यह कोई अनोखी बात नहीं की। सभी स्त्री-पुरुष का विवाह करते हैं। उनका जीवन आनन्द से कटता है। आनन्द की अच्दा से ही तो हम विवाह करते हैं। मुहल्ले में सैकड़ों आदमियों ने दूसरीतीसरीचौथी यहां तक कि सातवीं शदियां की हैं और मुझसे भी कहीं अधिक अवस्था में। वह जब तक जिये आराम ही से जिये। यह भी नहीं हआ कि सभी स्त्री से पहले मर गये हों। दुहाज-तिहाज होने पर भी कितने ही फिर रंडुए हो गये। अगर मेरी-जैसी दशा सबकी होतीतो विवाह का नाम ही कौन लेता? मेरे पिताजी ने पचपनवें वर्ष में विवाह किया था और मेरे जन्म के समय उनकी अवस्था साठ से कम न थी। हांइतनी बात जरुर है कि तब और अब में कुछ अंतर हो गया है। पहले स्त्रीयां पढ़ी-लिखी न होती थीं। पति चाहे कैसा ही होउसे पूज्य समझती थीयह बात हो कि पुरुष सब कुछ देखकर भी बेहयाई से काम लेता होअवश्य यही बात है। जब युवक वृद्धा के साथ प्रसन्न नहीं रह सकतातो युवती क्यों किसी वृद्ध के साथ प्रसन्न रहने लगी? लेकिन मैं तो कुछ ऐसा बुड्ढ़ा न था। मुझे देखकर कोई चालीस से अधिक नहीं बता सकता। कुछ भी होजवानी ढल जाने पर जवान औरत से विवाह करके कुछ-न-कुछ बेहयाई जरुर करनी पड़ती हैइसमें सन्देह नहीं। स्त्री स्वभाव से लज्जाशील होती है। कुलटाओं की बात तो दूसरी हैपर साधारणत: स्त्री पुरुष से कहीं ज्यादा संयमशील होती है। जोड़ का पति पाकर वह चाहे पर-पुरुष से हंसी-दिल्लगी कर ले, पर उसका मन शुद्ध रहता है। बेजोड़े विवाह हो जाने से वह चाहे किसी की ओर आंखे उठाकर न देखेपर उसका चित्त दुखी रहता है। वह पक्की दीवार हैउसमें सबरी का असर नहीं होतायह कच्ची दीवार है और उसी वक्त तक खड़ी रहती हैजब तक इस पर सबरी न चलाई जाये।

    इन्हीं विचारां में पड़े-पड़े मुंशीजी का एक झपकी आ गयी। मने के भावों ने तत्काल स्वप्न का रुप धारण कर लिया। क्या देखते हैं कि उनकी पहली स्त्री मंसाराम के सामने खड़ी कह रही है- स्वामीयह तुमने क्या किया? जिस बालक को मैंने अपना रक्त पिला-पिलाकर पालाउसको तुमने इतनी निर्दयता से मार डाला। ऐसे आदर्श चरित्र बालक पर तुमने इतना घोर कलंक लगा दिया? अब बैठे क्या बिसूरते हो। तुमने उससे हाथ धो लिया। मैं तुम्हारे निर्दया हाथों से छीनकर उसे अपने साथ लिए जाती हूं। तुम तो इतनो शक्की कभी न थे। क्या विवाह करते ही शक को भी गले बांध लाये? इस कोमल हृदय पर इतना कठारे आघात! इतना भीषण कलंक! इतन बड़ा अपमान सहकर जीनेवाले कोई बेहया होंगे। मेरा बेटा नहीं सह सकता! यह कहते-कहते उसने बालक को गोद में उठा लिया और चली। मुंशीजी ने रोते हुए उसकी गोद से मंसाराम को छीनने के लिए हाथ बढ़ायातो आंखे खुल गयीं और डॉक्टर लाहिरीडॉक्टर लाहिरीडॉक्टर भाटिया आदि आधे दर्जन डॉक्टर उनको सामने खड़े दिखायी दिये।

 

बारह

 

ती

न दिन गुजर गये और मुंशीजी घर न आये। रुक्मिणी दोनों वक्त अस्पताल जातीं और मंसाराम को देख आती थीं। दोनों लड़के भी जाते थेपर निर्मला कैसे जाती? उनके पैरों में तो बेड़ियां पड़ी हुई थीं। वह मंसाराम की बीमारी का हाल-चाल जानने क लिए व्यग्र रहती थीयदि रुक्मिणी से कुछ पूछती थींतो ताने मिलते थे और लड़को से पूछती तो बेसिर-पैर की बातें करने लगते थे। एक बार खुद जाकर देखने के लिए उसका चित्त व्याकुल हो रहा था। उसे यह भय होता था कि सन्देह ने कहीं मुंशीजी के पुत्र-प्रेम को शिथिल न कर दिया होकहीं उनकी कृपणता ही तो मंसाराम क अच्छे होने में बाधक नहीं हो रही है? डॉक्टर किसी के सगे नहीं होतेउन्हें तो अपने पैसों से काम हैमुर्दा दोजख में जाये या बहिश्त में। उसक मन मे प्रबल इच्छा होती थी कि जाकर अस्पताल क डॉक्टरों का एक हजार की थैली देकर कहे- इन्हें बचा लीजिएयह थैली आपकी भेंट हैंपर उसके पास न तो इतने रुपये ही थेन इतने साहस ही था। अब भी यदि वहां पहुंच सकतीतो मंसाराम अच्छा हो जाता। उसकी जैसी सेवा-शुश्रूषा होनी चाहिएवैसी नहीं हो रही है। नहीं तो क्या तीन दिन तक ज्वर ही न उतरता? यह दैहिक ज्वर नहीं, मानसिक ज्वर है और चित्त के शान्त होने ही से इसका प्रकोप उतर सकता है। अगर वह वहां रात भर बैठी रह सकती और मुंशीजी जरा भी मन मैला न करतेतो कदाचित् मंसाराम को विश्वास हो जाता कि पिताजी का दिल साफ है और फिर अच्छे होने में देर न लगतीलेकिन ऐसा होगा? मुंशीजी उसे वहां देखकर प्रसन्नचित्त रह सकेंगे? क्या अब भी उनका दिल साफ नहीं हुआ? यहां से जाते समय तो ऐसा ज्ञात हुआ था कि वह अपने प्रमाद पर पछता रहे हैं। ऐसा तो न होगा कि उसके वहां जाते ही मुंशीजी का सन्देह फिर भड़क उठे और वह बेटे की जान लेकर ही छोड़ें?

    इस दुविधा में पड़े-पड़े तीन दिन गुजर गये और न घर में चूल्हा जलान किसी ने कुछ खाया। लड़को के लिए बाजार से पूरियां ली जाती थींरुक्मिणी और निर्मला भूखी ही सो जाती थीं। उन्हें भोजन की इच्छा ही न होती।

    चौथे दिन जियाराम स्कूल से लौटातो अस्पताल होता हुआ घर आया। निर्मला ने पूछा-क्यों भैया, अस्पताल भी गये थे? आज क्या हाल है? तुम्हारे भैया उठे या नहीं?

    जियाराम रुआंसा होकर बोला- अम्मांजीआज तो वह कुछ बोलते-चालते ही न थे। चुपचाप चारपाई पर पड़े जोर-जोर से हाथ-पांव पटक रहे थे।

निर्मला के चेहरे का रंग उड़ गया। घबराकर पूछा- तुम्हारे बाबूजी वहां न थे?

    जियाराम- थे क्यों नहीं? आज वह बहुत रोते थे।

    निर्मला का कलेजा धक्-धक् करने लगा। पूछा- डॉक्टर लोग वहां न थे?

    जियाराम- डॉक्टर भी खड़े थे और आपस में कुछ सलाह कर रहे थे। सबसे बड़ा सिविल सर्जन अंगरेजी में कह रहा था कि मरीज की देह में कुछ ताजा खून डालना चाहिए। इस पर बाबूजीय ने कहा- मेरी देह से जितना खून चाहें ले लीजिए। सिविल सर्जन ने हंसकर कहा- आपके ब्लड से काम नहीं चलेगाकिसी जवान आदमी का ब्लड चाहिए। आखिर उसने पिचकारी से कोई दवा भैया के बाजू में डाल दी। चार अंगुल से कम के सुई न रही होगीपर भैया मिनके तक नहीं। मैंने तो मारे डरके आंखें बन्द कर लीं।

    बड़े-बड़े महान संकल्प आवेश में ही जन्म लेते हैं। कहां तो निर्मला भय से सूखी जाती थीकहां उसके मुंह पर दृढ़ संकल्प की आभा झलक पड़ी। उसने अपनी देह का ताजा खून देने का निश्चय किया। आगर उसके रक्त से मंसाराम के प्राण बच जायेंतो वह बड़ी खुशी से उसकी अन्तिम बूंद तक दे डालेगी। अब जिसका जो जी चाहे समझेवह कुछ परवाह न करेगी। उसने जियाराम से काह- तुम लपककर एक एक्का बुला लोमैं अस्पताला जाऊंगी।

    जियाराम- वहां तो इस वक्त बहुत से आदमी होंगे। जरा रात हो जाने दीजिए।

    निर्मला- नहींतुम अभी एक्का बुला लो।

    जियाराम- कहीं बाबूजी बिगड़ें न?

    निर्मला- बिगड़ने दो। तुमे अभी जाकर सवारी लाओ।

    जियाराम- मैं कह दूंगाअम्मांजी ही ने मुझसे सवारी मंगाई थी।

    निर्मला- कह देना।

    जियाराम तो उधर तांगा लाने गयाइतनी देर में निर्मला ने सिर में कंघी कीजूड़ा बांधा, कपड़े बदलेआभूषण पहनेपान खाया और द्वार पर आकर तांगे की राह देखने लगी।

    रुक्मिणी अपने कमरे में बैठी हुई थीं उसे इस तैयारी से आते देखकर बोलीं- कहां जाती हो, बहू?

    निर्मला- जरा अस्पताल तक जाती हूं।

    रुक्मिणी- वहां जाकर क्या करोगी?

    निर्मला- कुछ नहींकरुंगी क्या? करने वाले तो भगवान हैं। देखने को जी चाहता है।

    रुक्मिणी- मैं कहतीं हूंमत जाओ।

निर्मला- ने विनीत भाव से कहा- अभी चली आऊंगीदीदीजी। जियाराम कह रहे हैं कि इस वक्त उनकी हालत अच्छी नहीं है। जी नहीं मानताआप भी चलिए न?

    रुक्मिणी- मैं देख आई हूं। इतना ही समझ लो किअब बाहरी खून पहुंचाने पर ही जीवन की आशा है। कौन अपना ताजा खून देगा और क्यों देगा? उसमें भी तो प्राणों का भय है।

    निर्मला- इसीलिए तो मैं जाती हूं। मेरे खून से क्या काम न चलेगा?

    रुक्मिणी- चलेगा क्यों नहींजवान ही का तो खून चाहिएलेकिन तुम्हारे खून से मंसाराम की जान बचेइससे यह कहीं अच्छा है कि उसे पानी में बहा दिया जाये।

    तांगा आ गया। निर्मला और जियाराम दोनों जा बैठे। तांगा चला।

    रुक्मिणी द्वार पर खड़ी देत तक रोती रही। आज पहली बार उसे निर्मला पर दया आईउसका बस होता तो वह निर्मला को बांध रखती। करुणा और सहानुभूति का आवेश उसे कहां लिये जाता हैवह अप्रकट रुप से देख रही थी। आह! यह दुर्भाग्य की प्रेरणा है। यह सर्वनाश का मार्ग है।

    निर्मला अस्पताल पहुंचीतो दीपक जल चुके थे। डॉक्टर लोग अपनी राय देकर विदा हो चुके थे। मंसाराम का ज्वर कुछ कम हो गयाथा वह टकटकी लगाए हुद द्वार की ओर देख रहा था। उसकी दृष्टि उन्मुक्त आकाश की ओर लगी हुई थीमाने किसी देवता की प्रतीक्षा कर रहा हो! वह कहां   हैजिस दशा में हैइसका उसे कुछ ज्ञान न था।

    सहसा निर्मला को देखते ही वह चौंककर उठ बैठा। उसका समाधि टूट गई। उसकी विलुप्त चेतना प्रदीप्त हो गई। उसे अपने स्थिति काअपनी दशा का ज्ञान हो गयामानो कोई भूली हुई बात याद हो गई हो। उसने आंखें फाड़कर निर्मला को देखा और मुंह फेर लिया।

    एकाएक मुंशीजी तीव्र स्वर से बोले- तुमयहां क्या करने आईं?

    निर्मला अवाक् रह गई। वह बतलाये कि क्या करने आई? इतने सीधे से प्रश्न का भी वह कोई जवाब दे सकी? वह क्या करने आई थी? इतना जटिल प्रश्न किसने सामने आया होगा? घर का आदमी बीमार हैउसे देखने आई हैयह बात क्या बिना पूछे मालूम न हो सकती थी? फिर प्रश्न क्यों?

    वह हतबुद्धी-सी खड़ी रहीमानो संज्ञाहीन हो गई हो उसने दोनों लड़को से मुंशीजी के शोक और संताप की बातें सुनकर यह अनुमान किया था कि अब उसनका दिल साफ हो गया है। अब उसे ज्ञात हुआ कि वह भ्रम था। हांवह महाभ्रम था। मगर वह जानती थी आंसुओं की दृष्टि ने भी संदेह की अग्नि शांत नहीं कीतो वह कदापि न आती। वह कुढ़-कुढ़ाकर मर जातीघर से पांव न निकालती।

    मुंशजी ने फिर वही प्रश्न किया- तुम यहां क्यों आईं?

    निर्मला ने नि:शंक भाव से उत्तर दिया- आप यहां क्या करने आये हैं?

    मुंशीजी के नथुने फड़कने लगा। वह झल्लाकर चारपाई से उठे और निर्मला का हाथ पकड़कर बोले- तुम्हारे यहां आने की कोई जरुरत नहीं। जब मैं बुलाऊं तब आना। समझ गईं?

    अरे! यह क्या अनर्थ हुआ! मंसाराम जो चारपाई से हिल भी न सकता थाउठकर खड़ा हो गया औग्र निर्मला के पैरों पर गिरकर रोते हुए बोला- अम्मांजीइस अभागे के लिए आपको व्यर्थ इतना कष्ट हुआ। मैं आपका स्नेह कभी भी न भूलंगा। ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि मेरा पुर्नजनम आपके गर्भ से होजिससे मैं आपके ऋण से अऋण हो सकूं। ईश्वर जानता है, मैंने आपको विमाता नहीं समझा। मैं आपको अपनी माता समझता रहा । आपकी उम्र मुझसे बहुत ज्या न होलेकिन आपमेरी माता के स्थान पर थी और मैंने आपको सदैव इसी दृष्टि से देखा...अब नहीं बोला जाता अम्मांजीक्षमा कीजिए! यह अंतिम भेंट है।

    निर्मला ने अश्रु-प्रवाह को रोकते हुए कहा- तुम ऐसी बातें क्यों करते हो? दो-चार दिन में अच्छे हो जाओगे।

    मंसाराम ने क्षीण स्वर में कहा- अब जीने की इच्छा नहीं और न बोलने की शक्ति ही है।

    यह कहते-कहते मंसाराम अशक्त होकर वहीं जमीन पर लेट गया। निर्मला ने पति की ओर निर्भय नेत्रों से देखते हुए कहा- डॉक्टर ने क्या सलाह दी?

    मुंशीजी- सब-के-सब भंग खा गए हैंकहते हैंताजा खून चाहिए।

    निर्मला- ताजा खून मिल जायेतो प्राण-रक्षा हो सकती है?

    मुंशीजी ने निर्मेला की ओर तीव्र नेत्रों से देखकर कहा- मैं ईश्वर नहीं हूं और न डॉक्टर ही को ईश्वर समझता हूं।

    निर्मला- ताजा खून तो ऐसी अलभ्य वस्तु नहीं!

    मुंशीजी- आकाश के तारे भी तो अलभ्य नही! मुंह के सामने खदंक क्या चीज है?

    निर्मला- मैं आपना खून देने को तैयार हूं। डॉक्टर को बुलाइए।

    मुंशीजी ने विस्मित होकर कहा- तुम!

    निर्मला- हांक्या मेरे खून से काम न चलेगा?

    मुंशीजी- तुम अपना खून दोगी? नहीं, तुम्हारे खून की जरुरत नहीं। इसमें प्राणो का भय है।

    निर्मला- मेरे प्राण और किस दिन काम आयेंगे?

मुंशीजी ने सजल-नेत्र होकर कहा- नहीं निर्मलाउसका मूल्य अब मेरी निगाहों में बहुत बढ़ गया है। आज तक वह मेरे भोग की वस्तु थीआज से वह मेरी भक्ति की वस्तु है। मैंने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया हैक्षमा करो।

 

तेरह

 

जो

 कुछ होना था हो गयाकिसी को कुछ न चली। डॉक्टर साहब निर्मला की देह से रक्त निकालने की चेष्टा कर ही रहे थे कि मंसाराम अपने उज्ज्वल चरित्र की अन्तिम झलक दिखाकर इस भ्रम-लोक से विदा हो गया। कदाचित् इतनी देर तक उसके प्राण निर्मला ही की राह देख रहे थे। उसे निष्कलंक सिद्ध किये बिना वे देह को कैसे त्याग देते? अब उनका उद्देश्य पूरा हो गया। मुंशीजी को निर्मला के निर्दोष होने का विश्वास हो गयापर कब? जब हाथ से तीर निकल चुका थाजब मुसफिर ने रकाब में पांव डाल लिया था।

    पुत्र-शोक में मुंशीजी का जीवन भार-स्वरुप हो गया। उस दिन से फिर उनके ओठों पर हंसी न आई। यह जीवन अब उन्हें व्यर्थ-सा जान पड़ता था। कचहरी जातेमगर मुकदमों की पैरवी करने के लिए नहींकेवल दिल बहलाने के लिए घंटे-दो-घंटे में वहां से उकताकर चले आते। खाने बैठते तो कौर मुंह में न जाता। निर्मला अच्छी से अच्छी चीज पकाती पर मुंशीजी दो-चार कौर से अधिक न खा सकते। ऐसा जान पड़ता कि कौर मुंह से निकला आता है! मंसाराम के कमरे की ओर जाते ही उनका हृदय टूक-टूक हो जाता था। जहां उनकी आशाओं का दीपक जलता रहता थावहां अब अंधकार छाया हुआ था। उनके दो पुत्र अब भी थेलेकिन दूध देती हुई गायमर गईतो बछिया का क्या भरोसा? जब फूलने-फलनेवाला वृक्ष गिर पड़ानन्हे-नन्हे पौधों से क्या आशा? यों ता जवान-बूढ़े सभी मरत हैंलेकिन दु:ख इस बात का था कि उन्होंने स्वयं लड़के की जान ली। जिस दम बात याद आ जातीतो ऐसा मालूम होता था कि उनकी छाती फट जायेगी-मानो हृदय बाहर निकल पड़ेगा।

    निर्मला को पति से सच्ची सहानुभूति थी। जहां तक हो सकता थावह उनको प्रसन्न रखने का फिक्र रखती थी और भूलकर भी पिछली बातें जबान पर न लाती थी। मुंशीजी उससे मंसाराम की कोई चर्चा करते शरमाते थे। उनकी कभी-कभी ऐसी इच्छा होती कि एक बार निर्मला से अपने मन के सारे भाव खोलकर कह दूंलेकिन लज्जा रोक लेती थी। इस भांति उन्हें सान्त्वना भी न मिलती थीजो अपनी व्यथा कह डालने सेदूसरो को अपने गम में शरीक कर लेने सेप्राप्त होती है। मवाद बाहर न निकलकर अन्दर-ही-अन्दर अपना विष फैलाता जाता थादिन-दिन देह घुलती जाती थी।

    इधर कुछ दिनों से मुंशीजी और उन डॉक्टर साहब में जिन्होंने मंसाराम की दवा की थीयाराना हो गया थाबेचारे कभी-कभी आकर मुंशीजी को समझाया करतेकभी-कभी अपने साथ हवा खिलाने के लिए खींच ले जाते। उनकी स्त्री भी दो-चार बार निर्मला से मिलने आई थीं। निर्मला भी कई बार उनके घर गई थीमगर वहां से जब लौटतीतो कई दिन तक उदास रहती। उस दम्पत्ति का सुखमय जीवन देखकर उसे अपनी दशा पर दु:ख हुए बिना न रहता था। डॉक्टर साहब को कुल दो सौ रुपये मिलते थेपर इतने में ही दोनों आनन्द से जीवन व्यतीत करते थे। घर मं केवल एक महरी थीगृहस्थी का बहुत-सा काम स्त्री को अपने ही हाथों करना पड़ता थ। गहने भी उसकी देह पर बहुत कम थेपर उन दोनों में वह प्रेम थाजो धन की तृण के बराबर परवाह नहीं करता। पुरुष को देखकर स्त्री को चेहरा खिल उठता था। स्त्री को देखकर पुरुष निहाल हो जाता था। निर्मला के घर में धन इससे कहीं अधिक थाअभूषणों से उनकी देह फटी पड़ती थीघर का कोई काम उसे अपने हाथ से न करना पड़ता था। पर निर्मला सम्पन्न होने पर भी अधिक दुखी थीऔर सुधा विपनन होने पर भी  सुखी। सुधा के पास कोई ऐसी वस्तु थीजो निर्मला के पास न थीजिसके सामने उसे अपना वैभव तुच्छ जान पड़ता था। यहां तक कि वह सुधा के घर गहने पहनकर जाते शरमाती थी।

    एक दिन निर्मला डॉक्टर साहब से घर आईतो उसे बहुत उदास देखकर सुधा ने पूछा-बहिनआज बहुत उदास होवकील साहब की तबीयत तो अच्छी है?

    निर्मला- क्या कहूंसुधा? उनकी दशा दिन-दिन खराब होती जाती हैकुछ कहते नहीं बनता। न जाने ईश्वर को क्या मंजूर है?

    सुधा- हमारे बाबूजी तो कहते हैं कि उन्हें कहीं जलवायु बदलने के लिए जाना जरुरी हैनहीं तोकोई भंयकर रोग खड़ा हो जायेगा। कई बार वकील साहब से कह भी चुके हैं पर वह यही कह दिया करते हैं कि मैं तो बहुत अच्छी तरह हूंमुझे कोई शिकायत नहीं। आज तुम कहना।

    निर्मला- जब डॉक्टर साहब की नहीं सुनातो मेरी सुनेंगे?

    यह कहते-कहते निर्मला की आंखें डबडबा गई और जो शंकाइधर महीनों से उसके हृदय को विकल करती रहती थीमुंह से निकल पड़ी। अब तक उसने उस शंका को छिपाया थापर अब न छिपा सकी। बोली-बहिन मुझे लक्षण कुद अच्छे नहीं मालूम होते। देखेंभगवान् क्या करते हैं?

    साधु-तुम आज उनसे खूब जोर देकर कहना कि कहीं जलवायु बदलने चाहिए। दो चार महीने बाहर रहने से बहुत सी बातें भूल जायेंगी। मैं तो समझती हूं,शायद मकान बदलने से भी उनका शोक कुछ कम हो जायेगा। तुम कहीं बाहर जा भी न सकोगी। यह कौन-सा महीना है?

    निर्मला- आठवां महीना बीत रहा है। यह चिन्ता तो मुझे और भी मारे डालती है। मैंने तो इसके लिए ईश्चर से कभी प्रार्थन न की थी। यह बला मेरे सिर न जाने क्यों मढ़ दी? मैं बड़ी अभागिनी हूंबहिनविवाह के एक महीने पहले पिताजी का देहान्ता हो गया। उनके मरते ही मेरे सिर शनीचर सवार हुए। जहां पहले विवाह की बातचीत पक्की हुई थीउन लोगों ने आंखें फेर लीं। बेचारी अम्मां को हारकर मेरा विवाह यहां करना पड़ा। अब छोटी बहिन का विवाह होने वाला है। देखेंउसकी नाव किस घाट जाती है!

    सुधा- जहां पहले विवाह की बातचीत हुई थीउन लोगों ने इन्कार क्यों कर दिया?

    निर्मला- यह तो वे ही जानें। पिताजी न रहेतो सोने की गठरी कौन देता?

    सुधा- यह ता नीचता है। कहां के रहने वाले थे?

    निर्मला- लखनऊ के। नाम तो याद नहींआबकारी के कोई बड़े अफसर थे।

    सुधा ने गम्भीरा भाव से पूछा- और उनका लड़का क्या करता था?

    निर्मला- कुछ नहींकहीं पढ़ता थापर बड़ा होनहार था।

    सुधा ने सिर नीचा करके कहा- उसने अपने पिता से कुछ न कहा था? वह तो जवान थाअपने बाप को दबा न सकता था?

    निर्मला- अब यह मैं क्या जानूं बहिन? सोने की गठरी किसे प्यारी नहीं होती? जो पण्डित मेरे यहां से सन्देश लेकर गया थाउसने तो कहा था कि लड़का ही इन्कार कर रहा है। लड़के की मां अलबत्ता देवी थी। उसने पुत्र और पति दोनों ही को समझायापर उसकी कुछ न चली।

    सुधा- मैं तो उस लड़के को पातीतो खूब आड़े हाथों लेती।

    निर्मला- मरे भाग्य में जो लिखा थावह हो चुका। बेचारी कृष्णा पर न जाने क्या बीतेगी?

    संध्या समय निर्मला ने जाने के बाद जब डॉक्टर साहब बाहर से आयेतो सुधा ने कहा-क्यों जी, तुम उस आदमी का क्या कहोगेजो एक जगह विवाह ठीक कर लेने बाद फिर लोभवश किसी दूसरी जगह?

    डॉक्टर सिन्हा ने स्त्री की ओर कुतूहल से देखकर कहा- ऐसा नहीं करना चाहिएऔर क्या?

    सुधा- यह क्यों नहीं कहते कि ये घोर नीचता हैपहले सिरे का कमीनापन है!

सिन्हा- हांयह कहने में भी मुझे इन्कार नहीं।

    सुधा- किसका अपराध बड़ा है? वर का या वर के पिता का?

    सिन्हा की समझ में अभी तक नहीं आया कि सुधा के इन प्रश्नों का आशय क्या है? विस्मय से बोले- जैसी स्थिति हो अगर वह पिता क अधीन होतो पिता का ही अपराध समझो।

    सुधा- अधीन होने पर भी क्या जवान आदमी का अपना कोई कर्त्तव्य  नहीं है? अगर उसे अपने लिए नये कोट की जरुरत होतो वह पिता के विराध करने पर भी उसे रो-धोकर बनवा लेता है। क्या ऐसे महत्तव के विषय में वह अपनी आवाज पिता के कानों तक नहीं पहुंचा सकता? यह कहो कि वह और उसका पिता दोनों अपराधी हैंपरन्तु वर अधिक। बूढ़ा आदमी सोचता है- मुझे तो सारा खर्च संभालना पड़ेगाकन्या पक्ष से जितना ऐंठ सकूंउतना ही अच्छा। मगेर वर का धर्म है कि यदि वह स्वार्थ के हाथों बिलकुल बिक नहीं गया हैतो अपने आत्मबल का परिचय दे। अगर वह ऐसा नहीं करतातो मैं कहूंगी कि वह लोभी है और कायर भी। दुर्भाग्यवश ऐसा ही एक प्राणी मेरा पति है और मेरी समझ में नहीं आता कि किन शब्दों में उसका तिरस्कार करुं!

    सिन्हा ने हिचकिचाते हुए कहा- वह...वह...वह...दूसरी बात थी। लेन-देन का कारण नहीं था, बिलकुल दूसरी बाता थी। कन्या के पिता का देहान्त हो गया था। ऐसी दशा में हम लोग क्यो करते? यह भी सुनने में आया था कि कन्या में कोई ऐब है। वह बिलकुल दूसरी बाता थीमगर तुमसे यह कथा किसने कही।

    सुधा- कह दो कि वह कन्या कानी थीया कुबड़ी थी या नाइन के पेट की थी या भ्रष्टा थी। इतनी कसर क्यों छोड़ दी? भला सुनूं तोउस कन्या में क्या ऐब था?

    सिन्हा- मैंने देखा तो था नहींसुनने में आया था कि उसमें कोई ऐब है।

    सुधा- सबसे बड़ा ऐब यही था कि उसके पिता का स्वर्गवास हो गया था और वह कोई लंबी-चौड़ी रकम न दे सकती थी। इतना स्वीकार करते क्यों झेंपते हो?  मैं कुछ तुम्हारे कान तो काट न लूंगी! अगर दो-चार फिकरे कहूंतो इस कान से सुनकर उसक कान से उड़ा देना। ज्यादा-चीं-चपड़ करुंतो छड़ी से काम ले सकते हो। औरत जात डण्डे ही से ठीक रहती है। अगर उस कन्या में कोई ऐब थातो मैं कहूंगीलक्ष्मी भी बे-ऐब नहीं। तुम्हारी खोटी थीबस! और क्या? तुम्हें तो मेरे पाले पड़ना था।

    सिन्हा- तुमसे किसने कहा कि वह ऐसी थी वैसी थी? जैसे तुमने किसी से सुनकर मान लिया।

    सुधा- मैंने सुनकर नहीं मान लिया। अपनी आंखों देखा। ज्यादा बखान क्या करुंमैंने ऐसी सुन्दी स्त्री कभी नहीं देखी थी।

    सिन्हा ने व्यग्र होकर पूछा-क्या वह यहीं कहीं है? सच बताओउसे कहां देखा! क्या तुमळारे घर आई थी?

    सुधा-हांमेरे घर में आई  थी और एक बार नहींकई बार आ चुकी है। मैं भी उसके यहां कई बार जा चुकी हूंवकील साहब के बीवी वही कन्या हैजिसे आपने ऐबों के कारण त्याग दिया।

    सिन्हा-सच!

    सुधा-बिलकुल सच। आज अगर उसे मालूम हो जाये कि आप वही महापुरुष हैंतो शायद फिर इस घर मे कदम न रखे। ऐसी सुशीलाघर के कामों में ऐसी निपुण और ऐसी परम सुन्दारी स्त्री इस शहर मे दो ही चार होंगी। तुम मेरा बखान करते हो। मै। उसकी लौंडी बनने के योग्य भी नहीं हूं। घर में ईश्वर का दिया हुआ सब कुछ हैमगर जब प्राणी ही मेल केा नहींतो और सब रहकर क्या करेगा? धन्य है उसके धैर्य को कि उस बुड्ढे खूसट वकील के साथ जीवन के दिन काट रही है। मैंने तो कब का जहर खा लिया होता। मगर मन की व्यथा कहने से ही थोड़े प्रकट होती है। हंसती हैबोलती हैगहने-कपड़े पहनती हैपर रोयां-रोयां राया करता है।

    सिन्हा-वकील साहब की खूब शिकायत करती होगी?

    सुधा-शिकायत क्यों करेगी? क्या वह उसके पति नहीं हैं? संसार मे अब उसके लिए जो कुछ हैंवकील साहब। वह बुड्ढे हों या रोगीपर हैं तो उसके स्वामी ही। कुलवंती स्त्रीयां पति की निन्दा नहीं करतीं,यह कुलटाओं का काम है। वह उनकी दशा देखकर कुढ़ती हैंपर मुंह से कुछा नहीं कहती।

    सिन्हा- इन वकील साहब को क्या सूझी थीजो इस उम्र में ब्याह करने चले?

    सुधा- ऐसे आदमी न होंतो गरीब क्वारियों की नाव कौन पार लगाये? तुम और तुम्हारे साथी बिना भारी गठरी लिए बात नहीं करतेतो फिर ये बेचारर किसके घर जायं? तुमने यह बड़ा भारी अन्याय किया हैऔर तुम्हें इसका प्राश्यिचत करना पड़ेगा। ईश्वर उसका सुहाग अमर करेलेकिन वकील साहब को कहीं कुछ हो गयातो बेचारी का  जीवन ही नष्ट हो जायेेगा। आज तो वह बहुत रोती थी।  तुम लोग सचमुच बड़े निर्दयी हो। मै। तो अपने सोहन का विवाह किसी गरीब लड़की से करुंगी।

    डॉक्टर साहब ने यह पिछला वाक्या नहीं सुना। वह घोर चिन्ता मं पड़ गये। उनके मन में यह प्रश्न उठ-उठकर उन्हें विकल करने लगा-कहीं वकील साहब को कुछ हो गया तो? आज उन्हें अपने स्वार्थ का भंयकर स्वरुप दिखायी दिया। वास्तव में यह उन्हीं का अपराध था। अगर उन्होंने पिता से जोर देकर कहा होता कि मै। और कहीं विवाह न करुंगातो क्या वह उनकी इच्छा के विरुद्व उनका विवाह कर देते?

    सहसा सुधा ने कहा-कहो तो कल निर्मला से तुम्हारी मुलाकात करा दूं? वह भी जरा तुम्हारी सूरत देख ले। वह कुछ बोलगी तो नहींपर कदाचित् एक दृष्टि से वह तुम्हारा इतना तिरस्कार कर देगीजिसे तुम कभी न भूल सकोगे। बोलोंकल मिला दूँ? तुम्हारा बहुत संक्षिप्त परिचय भी करा दूंगीं

    सिन्हा ने कहा-नहीं सुधातुम्हारे हाथ जोड़ता हूंकहीं ऐसा गजब न करना! नहीं तो सच कहता हूंघर छोड़कर भाग जाऊंगा।

    सुधा-जो कांटा बोया हैउसका फल खाते क्यों इतना डरते हो? जिसकी गर्दन पर कटार चलाई हैजरा उसे तड़पते भी तो देखो। मेरे दादा जी ने पांच हजार दिये न! अभी छोटे भाई के विवाह मं पांच-छ: हजार और मिल जायेंगे। फिर तो तुम्हारे बराबर धनी संसार में काई दूसरा न होगा। ग्यारह हजार बहुत होते हैं। बाप-रे-बाप! ग्यारह हजार! उठा-उठाकर रखने लगेतो महीनों लग जायें अगर लड़के उड़ाने लगेंतो पीढ़ियों तक चले। कहीं से बात हो रही है या नहीं? 

    इस परिहास से डॉक्टर साहब इतना झेंपे कि सिर तक न उठा सके। उनका सारा वाक्-चातुर्य गायब हो गया। नन्हा-सा मुंह निकल आयामानो मार पड़ गई हो। इसी वक्त किसी डॉक्टर साहब को बाहर से पुकारां बेचारे जान लेकर भागे। स्त्री कितनी परिहास कुशल होती है, इसका आज परिचय मिल गया।

    रात को डॉक्टर साहब शयन करते हुए सुधा से बोले-निम्रला की तो कोई बहिन है न?

    सुधा- हांआज उसकी चर्चा तो करती थी। इसकी चिन्ता अभी से सवार हो रही है। अपने ऊपर तो जो कुछ बीतना थाबीत चुकाबहिन की किफक्र में पड़ी हुई थी।मां के पास तो अब ओर भी कुछ नहीं रहामजबूरन किसी ऐसे ही बूढ़े बाबा क गले वह भी मढ़ दी जरयेगी।

     सिन्हा- निर्मला तो अपनी मां की मदद कर सकती है।

    सुधा ने तीक्ष्ण स्वर में कहा-तुम भी कभी-कभी बिलकुल बेसिर पैर की बातें करने लगते हो। निर्मला बहुत करेगीतो दा-चार सौ रुपये दे देगीऔर क्या कर सकती है? वकील साहब का यह हाल हो रहा हैउसे अभी पहाड़-सी उम्र काटनी है। फिर कौन जाने उनके घर का क्यश हाल है? इधर छ:महीने से बेचारे घर बैठे हैं। रुपये आकाश से थोड़े ही बरसते है। दस-बीस हजार होंगे भी तो बैंक में होंगेकुछ निर्मला के पास तो रखे न होंगे। हमारा दो सौ रुपया महीने का खर्च हैतो क्या इनका चार सौ रुपये महीने का भी न होगा?

सुधा को तो नींद आ गई,पर डॉक्टर साहब बहुत देर तक करवट बदलते रहेफिर कुछ सोचकर उठे और मेज पर बैठकर एक पत्र लिखने लगे।

 

चौदह

   

दो

नों बाते एक ही साथ हुईं-निर्मला के कन्या को जन्म दियाकृष्णा का विवाह निश्चित हुआ और मुंशी तोताराम का मकान नीलाम हो गया। कन्या का जन्म तो साधारण बात थीयद्यपि निर्मला की दृष्टि में यह उसके जीवन की सबसे महान घटना थीलेकिन शेष दोनों घटनाएं अयाधारण थीं।  कृष्णा का विवाह-ऐसे सम्पन्न घराने में क्योंकर ठीक हुआ? उसकी माता के पास तो दहेज के नाम को कौड़ी भी न थी और इधर बूढ़े सिन्हा साहब जो अब पेंशन लेकर घर आ गये थेबिरादरी महालोभी मशहूर थे। वह अपने पुत्र का विवाह ऐसे दरिद्र घराने में करने पर कैसे राजी हुए। किसी को सहसा विश्वास न आता था। इससे भी बड़ आश्चर्य की बात मुंशीजी के मकान का नीलाम होना था। लोग मुंशीजी को अगर लखपती नहींतो बड़ा आदमी अवश्य समझते थे। उनका मकान कैसे नीलाम हुआ? बात यह थी कि मुंशीजी ने एक महाजन से कुछ रुपये कर्ज लेकर एक गांव रहेन रखाथा। उन्हें आशा थी कि साल-आध-साल में यह रुपये पाट देंगेफिर दस-पांच साल में उस गांव पर कब्जा कर लेंगे। वह जमींदारअसल और सूद के कुल रुपये अदा करने में असमर्थ हो जायेगा। इसी भरोसे पर मुंशीजी ने यह मामला किया था। गांव बेहुत बड़ा थाचार-पांच सौ रुपये नफा होता थालेकिन मन की सोची मन ही में रह गई। मुंशीज दिल को बहुत  समझाने पर भी कचहरी न जा सके। पुत्रशोक ने उनमं कोई काम करने की शक्ति ही नहीं छोड़ी। कौन ऐसा हृदय शून्य पिता हैजो पुत्र की गर्दन पर तलवार चलाकर चित्त को शान्त कर ले?

महाजन के पास जब साल भर तक सूद न पहुंचा और न उसके बार-बार बुलाने पर मुंशीजी उसके पास गये। यहां तक कि पिछली बार उन्होंने साफ-साफ कही दिया कि हम किसी के गुलाम नहीं हैंसाहूजी जो चाहे करें तब साहूजी को गुस्सा आ गया। उसने नालिश कर दी। मुंशजी पैरवी करने भी न गये। एकाएक डिग्री हो गई। यहां घर में रुपये कहां रखे थे? इतने ही दिनों में मुंशीजी की साख भी उठ गई थी। वह रुपये का कोई प्रबन्ध न कर सके। आखिर मकान नीलाम पर चढ़ गया। निम्रला सौर में थी। यह खबर सुनीतो कलेजा सन्न-सा हो गया। जीवन में कोई सुख न होने पर भी धनाभाव की चिन्ताओं से मुक्त थी। धन मानव जीवन में अगर सर्वप्रधान वस्तु नहींतो वह उसके बहुत निकट की वस्तु अवश्य है। अब और अभावों के साथ यह चिन्ता भी उसके सिर सवार हुई। उसे दाई द्वारा कहला भेजामेरे सब गहने बेचकर घर को बचा लीजिएलेकिन मुंशीजी ने यह प्रस्ताव किसी तरह स्वीकार न किया।

    उस दिन से मुंशीजी और भी चिन्ताग्रस्त रहने लगे। जिस धन का सुख भोगने के लिए उन्होंने विवाह किया थावह अब अतीत की स्मृति मात्र था। वह मारे ग्लानि क अब निर्मला को अपना मुंह तक न दिखा सकते। उन्हें अब उसक अन्याय का अनुमान हो रहा थाजो उन्होंने निर्मला के साथ किया था और कन्या के जन्म  ने तो रही-सही कसर भी पूरी कर दीसर्वनाश ही कर डाला!

    बारहवें दिन सौर से निकलकर निर्मला नवजात शिशु को गोद लिये  पति के पास गई। वह इस अभाव में भी इतनी प्रसन्न थीमानो उसे कोई चिन्ता नहीं है। बालिका को हृदय से लगार वह अपनी सारी चिन्ताएसं भूल गई थी। शिशु के विकसित और हर्ष प्रदीप्त नेत्रों को देखकर उसका हृदय प्रफुल्लित हो रहा था। मातृत्व के इस उद्गार में उसके सारे क्लेश विलीन हो गये थे। वह शिशु को पति की गोद मे देकर निहाल हो जाना चाहती थीलेकिन मुंशीजी कन्या को देखकर सहम उठे। गोद लेने के लिए उनका हृदय हुलसा नहींपर उन्होंने एक बार उसे करुण नेत्रों से देखा और फिर सिर झुका लियाशिशु की सूरत मंसाराम से बिलकुल मिलती थी।

    निर्मला ने उसके मन का भाव और ही समझा। उसने शतगुण स्नेह से लड़की को हृदय से लगा लिया मानो उसनसे कह रही है-अगर तुम इसके बोझ से दबे जाते होतो आज से मैं इस पर तुम्हार साया भी नहीं पड़ने दूंगी। जिस रतन को मैंने इतनी तपस्या के बाद पाया हैउसका निरादर  करते हुए तुम्हार हृदय फट नहीं जाता? वह उसी क्षण शिशु को गोद से चिपकाते हुए अपने कमरे में चली आई और देर तक रोती रही। उसने पति की इस उदासीनता को समझने की जरी भी चेष्टा न कीनहीं तो शायद वह उन्हें इतना कठोर न समझती। उसके सिर पर  उत्तरदायित्व का इतना बड़ा भार कहां था,जो उसके पति पर आ पड़ा था? वह सोचने की चेष्टा करतीतो क्या इतना भी उसकी समझ में न आता?

    मुंशीजी को एक ही क्षण में अपनी भूल मालूम हो गई। माता का हृदय प्रेम में इतना अनुरक्त रहता है कि भविष्य की चिन्त्ज्ञ और बाधाएं उसे जरा भी भयभीत नहीं करतीं। उसे अपने अंत:करण में एक अलौकिक शक्ति का अनुभव होता हैजो बाधाओं को उनके सामने परास्त कर देती है। मुंशीजी दौड़े हुए घर मे आये और शिशु को गोद में लेकर बोले मुझे याद आती हैमंसा भी ऐसा ही था-बिलकुल ऐसा ही!

निर्मला-दीदीजी भी तो यही कहती है।

    मुंशीजी-बिलकुल वहीं बड़ी-बड़ी आंखे और लाल-लाल ओंठ हैं। ईश्वर ने मुझे मेरा मंसाराम इस रुप में दे दिया। वही माथा हैवही मुंहवही हाथ-पांव! ईश्वर तुम्हारी लीला अपार है।

    सहसा रुक्मिणी भी आ गई। मुंशीजी को देखते ही बोली-देखों बाबूमंसाराम है कि नहीं? वही आया है। कोई लाख कहे, मैं न मानूंगी। साफ मंसाराम है। साल भर के लगभग ही भी तो गया।

    मुंशीजी-बहिनएक-एक अंग तो मिलता है। बसभगवान् ने मुझे मेरा मंसाराम दे दिया। (शिशु से) क्यों रीतू मंसाराम ही है? छौड़कर जाने का नाम न लेनानहीं फिर खींच लाऊंगा। कैसे निष्ठुर होकर भागे थे। आखिर पकड़ लाया कि नहीं? बसकह दियाअब मुझे छोड़कर जाने का नाम न लेना।  देखो बहिनकैसी टुकुर-टुकुर ताक रही है?

    उसी क्षण मुंशीजी ने फिर से अभिलाषाओं का भवन बनाना शुरु कर दिया। मोह ने उन्हें फिर संसार की ओर खींचां मानव जीवन! तू इतना क्षणभंगुर हैपर तेरी कल्पनाएं कितनी दीर्घालु! वही तोताराम जो संसार से विरक्त हो रह थेजो रात-दिन मुत्यु का आवाहन किया करते थेतिनके का सहारा पाकर तट पर पहुंचने के लिए पूरी शक्ति से हाथ-पांव मार रहे हैं।

    मगर तिनके का सहारा पाकर कोई तट पर पहुंचा है?

 

 

पन्द्रह

 

नि

र्मला को यद्यपि अपने घर के झंझटों से अवकाश न थापर कृष्णा के विवाह का संदेश पाकर वह किसी तरह न रुक सकी। उसकी माता ने बेहुत आग्रह करके बुलाया था। सबसे बड़ा आकर्षण यह था कि कृष्णा का विवाह उसी घर में हो रहा थाजहां निर्मला का विवाह पहले तय हुआ था। आश्चर्य यही था कि इस बार ये लोग बिना कुछ दहेज लिए कैसे विवाह करने पर तैयार हो गए! निर्मला को कृष्णा के विषय में बड़ी चिन्ता हो रही थी। समझती थी- मेरी ही तरह वह भी किसी के गले मढ़ दी जायेगी। बहुत चाहती थी कि माता की कुछ सहायता करुंजिससे कृष्णा के लिए कोई योग्य वह मिले, लेकिन इधर वकील साहब के घर बैठ जाने और महाजन के नालिश कर देने से उसका हाथ भी तंग था। ऐसी दशा में यह खबर पाकर उसे बड़ी शन्ति मिली। चलने की तैयारी कर ली। वकील साहब स्टेशन तक पहुंचाने आये। नन्हीं बच्ची से उन्हें बहुत प्रेम था। छोैड़ते ही न थेयहां तक कि निर्मला के साथ चलने को तैयार हो गये, लेकिन विवाह से एक महीने पहले उनका ससुराल जा बैठना निर्मला को उचित न मालूम हुआ। निर्मला ने अपनी माता से अब तक अपनी विपत्ति कथा न कही थी। जो बात हो गई, उसका रोना रोकर माता को कष्ट देने और रुलाने से क्या फायदा? इसलिए उसकी माता समझती थीनिर्मला बड़े आनन्द से है। अब जो निर्मला की सूरत देखीतो मानो उसके हृदय पर धक्का-सा लग गया। लड़कियां सुसुराल से घुलकर नहीं आतींफिर निर्मला जैसी लड़की, जिसको सुख की सभी सामग्रियां प्राप्त थीं। उसने कितनी लड़कियों को दूज की चन्द्रमा की भांति ससुराल जाते और पूर्ण चन्द्र बनकर आते देखा था। मन में कल्पना कर रही थीनिर्मला का रंग निखर गया होगादेह भरकर सुडौल हो गई होगी,  अंग-प्रत्यंग की शोभा कुछ और ही हो गई होगी। अब जो देखातो वह आधी भी न रही थीं न यौवन की चंचलता थी सन वह विहसित छवि लो हृदय को मोह लेती है। वह कमनीयतासुकुमारताजो विलासमय जीवन से आ जाती हैयहां नाम को न थी। मुख पीलाचेष्टा गिरी हुईंतो माता ने पूछा-क्यों री, तुझे वहां खाने को न मिलता था? इससे कहीं अच्छी तो तू यहीं थी। वहां तुझे क्या तकलीफ थी?

    कृष्णा ने हंसकर कहा-वहां मालकिन थीं कि नहीं। मालकिन दुनिया भर की चिन्ताएं रहती हैं, भोजन कब करें?

    निर्मला-नहीं अम्मांवहां का पानी मुझे रास नही आया। तबीयत भारी रहती है।

    माता-वकील साहब न्योते में आयेंगे न? तब पूछूंगी कि आपने फूल-सी लड़की ले जाकर उसकी यह गत बना डाली। अच्छाअब यह बता कि तूने यहां रुपये क्यों भेजे थे? मैंने तो तुमसे कभी न मांगे थे। लाख गई-गुलरी हूं, लेकिन बेटी का धन खाने की नीयत नहीं।

    निर्मला ने चकित होकर पूछा- किसने रुपये भेजे थे। अम्मांमैंने तो नहीं भेजे।

    माता-झूठ ने बोल! तूने पांच सौ रुपये के नोट नहीं भेजे थे?

    कृष्णा-भेजे नहीं थेतो क्या आसमान से आ गये? तुम्हारा नाम साफ लिखा था। मोहर भी वहीं की थी।

    निर्मला-तुम्हारे चरण छूकर कहती हूंमैंने रुपये नहीं भेजे। यह कब की बात है?

    माता-अरेदो-ढाई महीने हुए होंगे। अगर तूने नहीं भेजेतो आये कहां से?

निर्मला-यह मैं क्या जानू? मगर मैंने रुपये नहीं भेजे। हमारे यहां तो जब से जवान बेटा मरा हैकचहरी ही नहीं जाते। मेरा हाथ तो आप ही तंग थारुपये कहां से आते?

    माता- यह तो बड़े आश्चर्य की बात है। वहां और कोई तेरा सगा सम्बन्धी तो नहीं है? वकील साहब ने तुमसे छिपाकर तो नहीं भेजे?

    निर्मला- नहीं अम्मांमुझे तो विश्वास नहीं।

    माता- इसका पता लगाना चाहिए। मैंने सारे रुपये कृष्णा के गहने-कपड़े में खर्च कर डाले। यही बड़ी मुश्किल हुई।

    दोनों लड़को में किसी विषय पर विवाद उठ खड़ा हुआ और कृष्णा उधर फैसला करने चली गईतो निर्मला ने माता से कहा- इस विवाह की बात सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। यह कैसे हुआ अम्मां?

    माता-यहां जो सुनता हैदांतों उंगली दबाता हैं। जिन लोगों ने पक्की की कराई बात फेर दी और केवल थोड़े से रुपये के लोभ सेवे अब बिना कुछ लिए कैसे विवाह करने पर तैयार हो गयेसमझ में नहीं आता। उन्होंने खुद ही पत्र भेजा। मैंने साफ लिख दिया कि मेरे पास देने-लेने को कुछ नहीं हैकुश-कन्या ही से आपकी सेवा कर सकती हूं।

    निर्मला-इसका कुछ जवाब नहीं दिया?

    माता-शास्त्रीजी पत्र लेकर गये थे। वह तो यही कहते थे कि अब मुंशीजी कुछ लेने के इच्छुक नहीं है। अपनी पहली वादा-खिलाफ पर कुछ लज्जित भी हैं। मुंशीजी से तो इतनी उदारता की आशा न थीमगर सुनती हूंउनके बड़े पुत्र बहुत सज्जन आदमी है। उन्होंने कह सुनकर बाप को राजी किया है।

    निर्मला- पहले तो वह महाशय भी थैली चाहते थे न?

    माता- हांमगर अब तो शास्त्रीजी कहते थो कि दहेज के नाम से चिढ़ते हैं। सुना है यहां विवाह न करने पर पछताते भी थे। रुपये के लिए बात छोड़ी थी और रुपये खूब पाये, स्त्री पसंन्द नहीं।

    निर्मला के मन में उस पुरुष को देखने की प्रबल उत्कंठा हुईजो उसकी अवहेलना करके अब उसकी बहिन का उद्वार करना चाहता हैं प्रायश्चित सहीलेकिन कितने ऐसे प्राणी हैंजो इस तरह प्रायश्चित करने को तैयार हैं? उनसे बातें करने के लिएनम्र शब्दों से उनका तिरस्कार करने के लिएअपनी अनुपम छवि दिखाकर उन्हें और भी जलाने के लिए निर्मला का हृदय अधीर हो उठा। रात को दोनों बहिनें एक ही केमरे में सोई। मुहल्ले  में किन-किन लड़कियों का विवाह हो गयाकौन-कौन लड़कोरी हुईंकिस-किस का विवाह धूम-धाम से हुआ। किस-किस के पति कन इच्छानुकूल मिलेकौन कितने और कैस गहने चढ़ावे में लाया, इन्हीं विषयों में दोनों मे बड़ी देर तक बातें होती रहीं। कृष्णा बार-बार चाहती थी कि बहिन के घर का कुछ हाल पूछंमगर निर्मला उसे पूछने का अवसर न देती थी। जानती थी कि यह जो बातें पूछेगी उसके बताने में मुझे संकोच होगा। आखिर एक बार कृष्णा पूछ ही बैठी-जीजाजी भी आयेंगे न?

    निमर्ला- आने को कहा तो है।

    कृष्ण- अब तो तुमसे प्रसन्न रहते हैं न या अब भी वही हाल है? मैं तो सुना करती थी दुहाजू पति स्त्री को प्राणों से भी प्रिया समझते हैंवहां बिलकुल उल्टी बात देखी। आखिर किस बात पर बिगड़ते रहते हैं?

    निर्मला- अब मैं किसी के मन की बात क्या जानू?

    कुष्णा- मैं तो समझती हूंतुम्हारी रुखाई से वह चिढ़ते होंगे। तुम हो यहीं से जली हुई गई थी। वहां भी उन्हें कुछ कहा होगा।

    निर्मला- यह बात नहीं हैकृष्णामैं सौगन्ध खाकर  कहती हूंजो मेरे मन में उनकी ओर से जरा भी मैल हो। मुझसे जहां तक हो सकता हैउनकी सेवा करती हूंअगर उनकी जगह कोई देवता भी होतातो भी मैं इससे ज्यादा और कुछ न कर सकती। उन्हें भी मुझसे प्रेम है। बराबर मेरा मुंख देखते रहते हैंलेकिन जो बात उनक और मेरे काबू के बाहर हैउसके लिए वह क्या कर सकते हैं और मैं क्या कर सकती हूं? न वह जवान हो सकते हैंन मैं बुढ़िया हो सकती हूं। जवान बनने के लिए वह न जाने कितने रस और भस्म खाते रहते हैंमैं बुढ़िया बनने के लिए दूध-घी सब छोड़े बैठी हूं। सोचती हूंमेरे दुबलेपन ही से अवस्था का भेद कुछ कम हो जायलेकिन न उन्हें पौष्टिक पदार्थों से कुछ लाभ होता हैन मुझे उपवसों से। जब से मंसाराम का देहान्त हो गया हैतब से उनकी दशा और खराब हो गयी है।

    कृष्णा- मंसाराम को तुम भी बहुत प्यार करती थीं?

    निर्मला- वह लड़का ही ऐसा था कि जो देखता थाप्यार करता था। ऐसी बड़ी-बड़ी डोरेदार आंखें मैंने किसी की नहीं देखीं। कमल की भांति मुख हरदम खिला रह था। ऐसा साहसी कि अगर अवसर आ पड़तातो आग में फांद जाता। कृष्णामैं तुमसे कहती हूंजब वह मेरे पास आकर बैठ जातातो मैं अपने को भूल जाती थी। जी चाहता थावह हरदम सामने बैठा रहे और मैं देखा करुं। मेरे मन में पाप का लेश भी न था। अगर एक क्षण के लिए भी मैंने उसकी ओर किसी और भाव से देखा होतो मेरी आंखें फूट जायेंपर न जाने क्यों उसे अपने पास देखकर मेरा हृदय फूला न समाता था। इसीलिए  मैंने पढ़ने का स्वांग रचा नहीं तो वह घर में आता ही न था। यह मै। जानती हूं कि अगर उसके मन में पाप होतातो मैं उसके लिए सब कुछ कर सकती थी।

कृष्णा-  अरे बहिनचुप रहोकैसी बातें मुंह से निकालती हो?

    निर्मला- हांयह बात सुनने में बुरी मालूम होती है और है भी बुरीलेकिन मनुष्य की प्रकृति को तो कोई बदल नहीं सकता। तू ही बता- एक पचास वर्ष के मर्द से तेरा विवाह हो जाये, तो तू क्या करेगी?

    कृष्णा-बहिनमैं तो जहर खाकर सो रहूं। मुझसे तो उसका मुंह भी न देखते बने।

    निर्मला- तो बस यही समझ ले। उस लड़के ने कभी मेरी ओर आंख उठाकर नहीं देखालेकिन बुड्ढे तो शक्की होते ही हैंतुम्हारे जीजा उस लड़के के दुश्मन हो गए और आखिर उसकी जान लेकर ही छोड़ी। जिसे दिन उसे मालूम हो गया कि पिताजी के मन में मेरी ओर से सन्देह है, उसी दिन के उसे ज्वर चढ़ाजो जान लेकर ही उतरा। हाय! उस अन्तिम समय का दृश्य आंखों से नहीं उतरता। मैं अस्पताल गई थीवह ज्वी में बेहोश पड़ा थाउठने  की शक्ति न थीलेकिन ज्यों ही मेरी आवाज सुनी, चौंककर उठ बैठा और माता-माता कहकर मेरे पैरों पर गिर पड़ा (रोकर) कृष्णाउस समय ऐसा जी चाहता था अपने प्राण निकाल कर उसे दे दूं। मेरे  पैरां पर ही वह मूर्छित हो गया और फिर आंखें न खोली। डॉक्टर ने उसकी देह मे ताजा खून डालने का प्रस्ताव किया थायही सुनकर मैं दौड़ी गई थी लेकिन जब तक डॉक्टर लोग वह प्रक्रिया आरम्भ करेंउसके प्राणनिकल गए।

    कृष्णा- ताजा रक्त पड़ जाने से उसकी जान बच जाती?

    निर्मला- कौन जानता है? लेकिन मैं तो अपने रुधिर की अन्तिम बूंद तक देने का तैयार थी उस दशा में भी उसका मुखमण्डल दीपक की भांति चमकता था। अगर वह मुझे देखते ही दौड़कर मेरे पैरों पर न गिर पड़तापहले कुछ रक्त देह में पहुंच जातातो शायद बच जाता।

    कृष्णा- तो तुमने उन्हें उसी वक्ता लिटा क्यों न दिया?

    निर्मला- अरे पगलीतू अभी तक बात न समझी। वह मेरे पैरों पर गिरकर और माता-पुत्र का सम्बन्ध दिखाकर अपने बाप के दिल से वह सन्देह निकाल देना चाहता था। केवल इसीलिए वह उठा थ। मेरा क्लेश मिटाने के लिए उसने प्राण दिये और उसकी वह इच्छा पूरी हो गई। तुम्हारे जीजाजी उसी दिन से सीधे हो गये। अब तो उनकी दशा पर मुझे दया आती है। पुत्र-शाक उनक प्राण लेकर छोड़ेगा। मुझ पर सन्देह करके मेरे साथ जो अन्याय किया हैअब उसका प्रतिशोध कर रहे हैं। अबकी उनकी सूरत देखकर तू डर जायेगी। बूढ़े बाबा हो गये हैं, कमर भी कुछ झुक चली है।

    कृष्णा- बुड्ढे लोग इतनी शक्की क्यों होते हैंबहिन?

    निर्मला- यह जाकर बुड्ढों से पूछो।

कृष्णा- मैं समझती हूंउनके दिल में हरदम एक चोर-सा बैठा रहता होगा कि इस युवती को प्रसन्न नहीं रख सकता। इसलिए जरा-जरा-सी बात पर उन्हें शक होने लगता है।

    निर्मला- जानती तो हैफिर मुझसे क्यों पूछती है?

    कुष्णा- इसीलिए बेचारा स्त्री से दबता भी होगा। देखने वाले समझते होंगे कि यह बहुत प्रेम करता है।

    निर्मला- तूने इतने ही दिनों में इ तनी बातें कहां सीख लीं? इन बातों को जाने देबतातुझे अपना वर पसन्द है? उसकी तस्वीर ता देखी होगी?

    कृष्णा- हांआई तो थीलाऊंदेखोगी?

    एक क्षण में कृष्णा ने तस्वीर लाकर निर्मला के हाथ में रख दी।

    निर्मला ने मुस्कराकर कहा-तू बड़ी भाग्यवान् है।

    कृष्णा- अम्माजी ने भी बहुत पसन्द किया।

    निर्मला- तुझे पसन्द है कि नहींसो कहदूसरों की बात न चला।

    कृष्णा- (लजाती हुई) शक्ल-सूरत तो बुरी नहीं हैस्वभाव का हाल ईश्वर जाने। शास्त्रीजी तो कहते थेऐसे सुशील और चरित्रवान् युवक कम होंगे।

    निर्मला- यहां से तेरी तस्वीर भी गई थी?

    कृष्णा- गई तो थीशास्त्रीजी ही तो ले गए थे।

    निर्मला- उन्हें पसन्द आई?

    कृष्णा- अब किसी के मन की बात मैं क्या जानूं? शास्त्री जी कहते थेबहुत खुश हुए थे।

    निर्मला- अच्छाबता, तुझे क्या उपहार दूं? अभी से बता देजिससे बनवा रखूं।

    कृष्णा- जो तुम्हारा जी चाहेदेना। उन्हें पुस्तकों से बहुत प्रेम है। अच्छी-अच्छी पुस्तकें मंगवा देना।

    निर्मला-उनके लिए नहीं पूछती तेरे लिए पूछती हूं।

    कृष्णा- अपने ही लिये तो मैं कह रही हूं।

    निर्मला- (तस्वीर की तरफ देखती हुई) कपड़े सब खद्दर के मालूम होते हैं।

    कृष्णा- हांखद्दर के बड़े प्रेमी हैं। सुनती हूं कि पीठ पर खद्दर लाद कर देहातों में बेचने जाया करते हैं। व्याख्यान देने में भी चतुर हैं।

    निर्मला- तब तो मुझे भी खद्द पहनना पड़ेगा। तुझे तो मोटे कपड़ो से चिढ़ है।

    कृष्णा- जब उन्हें मोटे कपड़े अच्छे लगते हैंतो मुझे क्यों चिढ़ होगीमैंने तो चर्खा चलाना सीख लिया है।

निर्मला- सच! सूत निकाल लेती है?

    कृष्णा- हांबहिनथोड़ा-थोड़ा निकाल लेती हूं। जब वह खद्दर के इतने प्रेमी हैंजो चर्खा भी जरुर चलाते होंगे। मैं न चला सकूंगीतो मुझे कितना लज्जित होना पड़ेगा।

    इस तरह बात करते-करते दोनों बहिनों सोईं। कोई दो बजे रात को बच्ची रोई तो निर्मला की नींद खुली। देखा तो कृष्णा की चारपाई खाली पड़ी थी। निर्मला को आश्चर्य हुआ कि इतना रात गये कृष्णा कहां चली गई। शायद पानी-वानी पीने गई हो। मगरी पानी तो सिरहाने रखा हुआ हैफिर कहां गई है? उसे दो-तीन बार उसका नाम लेकर आवाज दीपर कृष्णा का पता न था। तब तो निर्मला घबरा उठी। उसके मन में भांति-भांति की शंकाएं होने लगी। सहसा उसे ख्याल आया कि शायद अपने कमरे में न चली गई हो। बच्ची सो गईतो वह उठकर कृष्णा के के कमरे के द्वार पर आई। उसका अनुमान ठीक थाकृष्णा अपने कमरे में थी। सारा घर सो रहा था और वह बैठी चर्खा चला रही थी। इतनी तन्मयता से शायद उसने थिऐटर भी न देखा होगा। निर्मला दंग रह गई। अन्दर जाकर बोली- यह क्या कर रही है रे! यह चर्खा चलाने का समय है?

    कृष्णा चौंककर उठ बैठी और संकोच से सिर झुकाकर बोली- तुम्हारी नींद कैसे खुल गई? पानी-वानी तो मैंने रख दिया था।

    निर्मला- मैं कहती हूंदिन को तुझे समय नहीं मिलताजो पिछली रात को चर्खा लेकर बैठी है?

    कृष्णा- दिन को फुरसत ही नहीं मिलती?

    निर्मला- (सूत देखकर) सूत तो बहुत महीन है।

    कृष्णा- कहां-बहिनयह सूत तो मोटा है। मैं बारीक सूतकात कर उनके लिए साफा बनाना चाहती हूं। यही मेरा उपहार होगा।

    निर्मला- बात तो तूने खूब सोची है। इससे अधिक मूल्यवसान वस्तु उनकी दृष्टि में और क्या होगी? अच्छाउठ इस वक्तकल कातना! कहीं बीमार पड़ जायेगीतो सब धरा रह जायेगा।

    कृष्णा- नहीं मेरी बहिनतुम चलकर सोओमैं अभी आती हूं।

    निर्मला ने अधिक आग्रह न कियालेटने चली गई। मगर किसी तरह नींद न आई। कृष्णा की उत्सुकता और यह उमंग देखकर उसका हृदय किसी अलक्षित आकांक्षा से आन्दोलित हो उठां ओह! इस समय इसका हृदय कितना प्रफुल्लित हो रहा है। अनुराग ने इसे कितना उन्मत्त कर रखा है। तब उसे अपने विवाह की याद आई। जिस दिन तिलक गया थाउसी दिन से उसकी सारी चंचलतासारी सजीवता विदा हो गेई थी। अपनी कोठरी  में बैठी वह अपनी किस्मत को रोती थी और ईश्वर से विनय करती थी कि प्राण निकल जाये। अपराधी जैसे दंड की प्रतीक्षा करता हैउसी भांति वह विवाह की प्रतीक्षा करती थीउस विवाह कीजिसमें उसक जीवन की सारी अभिलाषाएं विलीन हो जाएंगीजब मण्डप के नीचे बने हुए हवन-कुण्ड में उसकी आशाएं जलकर भस्म हो जायेंगी।

 

सोलह

 

हीना कटते देर न लगी। विवाह का शुभ मुहूर्त आ पहुंचां मेहमानों से घार भार गया। मंशी तोताराम एक दिन पहले आ गये और उसनके साथ निर्मला की सहेली भी आई। निर्मला ने बहुत आग्रह न किया थावह खुद आने को उत्सुक थी। निर्मला की सबसे बड़ी उत्कंठा यही थी कि वर के बड़े भाई के दर्शन करुंगी और हो सकता तो उसकी सुबुद्वि पर धन्यवाद दूंगी।

    सुधा ने हंस कर कहा-तुम उनसे बोल सकोगी?

    निर्मला- क्योंबोलने में क्या हानि है? अब तो दूसरा ही सम्बन्ध हो गया और मैं न बोल सकूंगीतो तुम तो हो ही।

    सुधा-न भाईमुझसे यह न होगा। मैं पराये मर्द से नहीं बोल सकती। न जाने कैसे आदमी हों।

    निर्मला-आदमी तो बुरे नहीं हैऔर फिर उनसे कुछ विवाह तो करना नहींजरा-सा बोलने में क्या हानि है? डॉक्टर साहब यहां होतेतो मैं तुम्हें आज्ञा दिला देती। 

    सुधा-जो लोग हुदय के उदार होते हैंक्या चरित्र के भी अच्छे होते है? पराई स्त्री की घूरने में तो किसी मर्द को संकोच नहीं होता।

    निर्मला-अच्छा न बोलनामैं ही बातें कर लूंगीघूर लेंगे जितना उनसे घूरते बनेगाबसअब तो राजी हुई।

    इतने में कृष्णा आकर बैठ गई। निर्मला ने मुस्कराकर कहा-सच बता  कृष्णातेरा मन इस वक्त क्यों उचाट हो रहा है?

    कृष्णा-जीजाजी बुला रहे हैंपहले जाकर सुना आआपीछे गप्पें लड़ाना बहुत बिगड़ रहे हैं।

    निर्मला- क्या हैतून कुछ पूछा नहीं?

    कृष्णा- कुछ बीमार से मालूम होते हैं। बहुत दुबले हो गए हैं।

    निर्मला- तो जरा बैठकर उनका मन बहला देती। यहां दौड़ी क्यों चली आई? यह कहो, ईश्वर ने कृपा कीनहीं तो ऐसा ही पुरुषा तुझे भी मिलता। जरा बैठकर बातें करो। बुड्ढे बातें बड़ी लच्छेदार करते हैं। जवान इतने डींगियल नहीं होते।

    कृष्णा- नहीं बहिनतुम जाओमुझसे तो वहां बैठा नहीं जाता।    

    निर्मला चली गईतो सुधा ने कृष्णा से कहा- अब तो बारात आ गई होगी। द्वार-पूजा क्यों नही होती?

    कृष्णा- क्या जाने बहिनशास्त्रीजी सामान इकट्ठा कर रहे हैं?

    सुधा- सुना हैदूल्हा का भावज बड़े कड़े स्वाभाव की स्त्री है।

    कृष्णा- कैसे मालूम?

    सुधा- मैंने सुना हैइसीलिए चेताये देती हूं। चार बातें गम खाकर रहना होगा।

    कृष्णा- मेरी झगड़ने की आदत नहीं। जब मेरी तरफ से कोई शिकायत ही न पायेंगी तो क्या अनायास ही बिगड़ेगी!

    सुधा- हांसुना तो ऐसा ही है। झूठ-मूठ लड़ा कारती है।

    कृष्णा- मैं तो सौबात की एक बात जानती हूंनम्रता पत्थर को भी मोम कर देती है।

    सहसा शोर मचा- बारात आ रही है। दोनों रमणियां खिड़की के सामने आ बैठीं। एक क्षण में निर्मला भी आ पहुंची।

    वर के बड़े भाई को देखने की उसे बड़ी उत्सुकता हो रही थी।

    सुधा ने कहा- कैसे पता चलेगा कि बड़े भाई कौन हैं?

    निर्मला- शास्त्रीजी से पूछूंतो मालूम हो। हाथी पर तो कृष्णा के ससुर महाशय हैं। अच्छा डॉक्टर साहब यहां कैसे आ पहुंचे! वह घोड़े पर क्या

हैंदेखती नहीं हो?

    सुधा- हांहैं तो वही।

    निर्मला- उन लोगों से मित्रता होगी। कोई सम्बन्ध तो नहीं है।

    सुधा- अब भेंट हो तो पूछूंमुझे तो कुछ नहीं मालूम।

    निर्मला- पालकी मे जो महाशय बैठे हुए हैंवह तो दूल्हा के भाई जैसे नहीं दीखते।

    सुधा- बिलकुल नहीं। मालूम होता हैसारी देहे मे पेछ-ही-पेट है।

    निर्मला- दूसरे हाथी पर कौन बैठा हैसमझ में नही आता।

    सुधा- कोई होदूल्हा का भाई नहीं हो सकता। उसकी उम्र नहीं देखती होचालीस के ऊपर होंगी।

    निर्मला- शास्त्रजी तो इस वक्त द्वार-पूजा कि फिक्र में हैंनहीं तोा उनसे पूछती।

    संयोग से नाई आ गया। सन्दूकों की कुंलियां निर्मला के पास थीं। इस वक्त द्वारचार के लिए कुछ रुपये की जरुरत थीमाता ने भेजा थायह नाई भी पण्डित मोटेराम जी के साथ तिलक लेकर गया था।

    निर्मला ने कहा- क्या अभी रुपये चाहिए?

    नाई- हां बहिनजीचलकर दे दीजिए।

    निर्मला- अच्छा चलती हूं। पहले यह बतातू दूल्हा क बड़े भाई को पहचानता है?

    नाई- पहचानता काहे नहींवह क्या सामने हैं।

    निर्मला- कहांमैं तो नहीं देखती?

    नाई- अरे वह क्या घोड़े पर सवार हैं। वही तो हैं।

    निर्मला ने चकित होकर कहा- क्या कहता हैघोड़े पर दूल्हा के भाई हैं! पहचानता है या अटकल से कह रहा है?

    नाई- अरे बहिनजीक्या इतना भूल जाऊंगा अभी तो जलपान का सामान दिये चला आता हूं।

    निर्मल- अरेयह तो डॉक्टर साहब हैं। मेरे पड़ोस में रहते हैं।

    नाई- हां-हांवही तो डॉक्टर साहब है।

    निर्मला ने सुधा की ओर देखकर कहा- सुनती ही बहिनइसकी बातें? सुधा ने हंसी रोककर कहा-झूठ बोलता है।

    नाई- अच्छा साहबझूठ ही सहीअब बड़ों के मुंह कौन लगे! अभी शास्त्रीजी से पूछवा दूंगा, तब तो मानिएगा?

    नाई के आने में देर हुईमोटेराम खुद आंगन में आकर शोर मचाने लगे-इस घर की मर्यादा रखना ईश्वर ही के हाथ है। नाई घण्टे भर से आया हुआ हैऔर अभी तक रुपये नहीं मिले।

    निर्मला- जरा यहां चले आइएगा शास्त्रीजीकितने रुपये दरकरार हैंनिकाल दूं?

    शास्त्रीजी भुनभुनाते और जोर-जारे से हांफते हुए ऊपर आये और एक लम्बी सांस लेकर बोले-क्या है? यह बातों का समय नहीं हैजल्दी से रुपये निकाल दो।

    निर्मला- लीजिएनिकाल तो रहीं हूं। अब क्या मुंह के बल गिर पडूं? पहले यह बताइए कि दूलहा के बड़े भाई कौन हैं?

    शास्त्रीजी- रामे-रामइतनी-सी बात के लिए मुझे आकाश पर लटका दिया। नाई क्या न पहचानता था?

    निर्मला- नाई तो कहता है कि वह जो घोड़े पर सवार हैवही हैं।

    शास्त्रीजी- तो फिर किसे बता दे? वही तो हैं ही।

    नाई- घड़ी भर से कह रहा हूंपर बहिनजी मानती ही नहीं।

निर्मला ने सुधा की ओर स्नेहममताविनोद कृत्रिम तिरस्कार की दृष्टि से देखकर कहा- अच्छातो तुम्ही अब तक मेरे साथ यह त्रिया-चरित्र खेर रही थी! मैं जानतीतो तुम्हें यहां बुलाती ही नहीं। ओफ्फोह! बड़ा गहरा पेट है तुम्हारा! तुम महीनों से मेरे साथ शरारत करती चली आती होऔर कभी भूल से भी इस विषय का एक शब्द तुम्हारे मुंह से नहीं निकला। मैं तो दो-चार ही दिन में उबल पड़ती।

    सुधा- तुम्हें मालूम हो जातातो तुम मेरे यहां आती ही क्यों?

    निर्मला- गजब-रे-गजबमैं डॉक्टर साहब से कई बार बातें कर चुकी हूं। तुम्हारो ऊपर यह सारा पाप पड़ेगा। देखा कृष्णातूने अपनी जेठानी की शरारत! यह ऐसी मायाविनी हैइनसे डरती रहना।

    कृष्णा- मैं तो ऐसी देवी के चरण धो-धोकर माथे चढाऊंगी। धन्य-भाग कि इनके दर्शन हुए।

    निर्मला- अब समझ गई। रुपये भी तुम्हें न भिजवाये होंगे। अब सिर हिलाया तो सच कहती हूंमार बैठूंगी।

    सुधा- अपने घर बुलाकर के मेहमान का अपमान नहीं किया जाता। निर्मला- देखो तो अभी कैसी-कैसी खबरे लेती हूं। मैंने तुम्हारा मान रखने को जरा-सा लिख दिया था और तुम सचमुच आ पहुंची। भला वहां वाले क्या कहते होंगे?

    सुधा- सबसे कहकर आई हूं।

    निर्मला- अब तुम्हारे पास कभी न आऊंगी। इतना तो इशारा कर देतीं कि डॉक्टर साहब से पर्दा रखना।

    सुधा- उनके देख लेने ही से कौन बुराई हो गई? न देखते तो अपनी किस्मत को रोते कैसे? जानते कैसे कि लोभ में पड़कर कैसी चीज खो दी? अब तो तुम्हें देखकर लालाजी हाथ मलकर रह जाते हैं। मुंह से तो कुछ नहीं सकहतेपर मन में अपनी भूल पर पछताते हैं।

    निर्मला- अब तुम्हारे घर कभी न आऊंगी।

    सुधा- अब पिण्ड नहीं छूट सकता। मैंने कौन तुम्हारे घर की राह नीं देखी है।

    द्वार-पूजा समाप्त हो चुकी थी। मेहमान लोग बैठ जलपान कर रहे थे। मुंशीजी की बेगल में ही डॉक्टर सिन्हा बैठे हुए थे। निर्मला ने कोठे पर चिक की आड़ से उन्हें देखा और कलेजा थामकर रह गई। एक आरोग्ययौवन और प्रतिभा का देवता थापर दूसरा...इस विषय में कुछ न कहना ही दचित है।

    निर्मला ने डॉक्टर साहब को सैकड़ों ही बार देखा थापर आज उसके हृदय में जो विचार उठेवे कभी न उठे थे। बार-बार यह जी चाहता था कि बुलाकर खूब फटकारुंऐसे-ऐसे ताने मारुं कि वह भी याद करें, रुला-रुलाकर छोडूंमेगर रहम करके रह जाती थी। बारात जनवासे चली गई थी। भोजन की तैयारी हो रही थी। निर्मला भोजन के थाल चुनने में व्यस्त थी। सहसा महरी ने आकर कहा- बिट्टीतुम्हें सुधा रानी बुला रही है। तुम्हारे कमरे में बैठी हैं।

    निर्मला ने थाल छोड़ दिये और घबराई हुई सुधा के पास आईमगर अन्दर कदम रखते ही ठिठक गई, डॉक्टर सिन्हा खड़े थे।

    सुधा ने मुस्कराकर कहा- लो बहिनबुला दिया। अब जितना चाहोफटकारो। मैं दरवाजा रोके खड़ी हूंभाग नहीं सकते।

    डॉक्टर साहब ने गम्भीर भाव से कहा- भागता कौन है? यहां तो सिर झुकाए खड़ा हूं।

    निर्मला ने हाथ जोड़कर कहा- इसी तरह सदा कृपा-दृष्टि रखिएगाभूल न जाइएगा। यह मेरी विनय है।

 

सत्रह

 

कृ

ष्णा के विवाह के बाद सुधा चली गईलेकिन निर्मला मैके ही में रह गई। वकील साहब बार-बार लिखते थेपर वह न जाती थी। वहां जाने को उसका जी न चाहता था। वहां कोई ऐसी चीज न थीजो उसे खींच ले जाये। यहां माता की सेवा और छोटे भाइयों की देखभाल में उसका समय बड़े आनन्द के कट जाता था। वकील साहब खुद आते तो शायद वह जाने पर राजी हो जातीलेकिन इस विवाह मेंमुहल्ले की लड़कियों ने उनकी वह दुर्गत की थी कि बेचारे आने का नाम ही न लेते थे। सुधा ने भी कई बार पत्र लिखापर निर्मला ने उससे भी हीले-हव़ाले किया। आखिर एक दिन सुधा ने नौकर को साथ लिया और स्वयं आ धमकी।

    जब दोनों गले मिल चुकींतो सुधा ने कहा-तुम्हें तो वहां जाते मानो डर लगता है।

    निर्मला- हां बहिनडर तो लगता है। ब्याह की गई तीन साल में आईअब की तो वहां उम्र ही खतम हो जायेगीफिर कौन बुलाता है और कौन आता है?

    सुधा- आने को क्या हुआजब जी चाहे चली आना। वहां वकील साहब बहुत बेचैन हो रहे हैं।

    निर्मला- बहुत बेचैनरात को शायद नींद न आती हो।

    सुधा- बहिनतुम्हारा कलेजा पत्थर का है। उनकी दशा देखकर तरस आता है। कहते थेघर मे कोई पूछने वाला नहींन कोई लड़का, न बालाकिससे जी बहलायें? जब से दूसरे मकान में उठ आए हैंबहुत दुखी रहते हैं।

    निर्मला- लड़के तो ईश्वर के दिये दो-दो हैं।

    सुधा- उन दोनों की तो बड़ी शिकायत करते थे। जियाराम तो अब बात ही नहीं सुनता-तुर्की-बतुर्की जवाब देता है। रहा छोटावह भी उसी के कहने में है। बेचारे बड़े लड़के की याद करके रोया करते हैं।

    निर्मला- जियाराम तो शरीर न थावह बदमाशी कब से सीख गया? मेरी तो कोई बात न टालता थाइशारे पर काम करता था।

    सुधा- क्या जाने बहिनसुनाकहता हैआप ही ने भैया को जहर देकर मार डालाआप हत्यारे हैं। कई बार तुमसे विवाह करने के लिए ताने दे चुका है। ऐसी-ऐसी बातें कहता है कि वकील साहब रो पड़ते हैं। अरेऔर तो क्या कहूंएक दिन पत्थर उठाकर मारने दौड़ा था।

    निर्मला ने गम्भीर चिन्ता में पड़कर कहा- यह लड़का तो बड़ा शैतान निकला। उसे यह किसने कहा कि उसके भाई को उन्होंने जहर दे दिया है?

    सुधा- वह तुम्हीं से ठीक होगा।

    निर्मला को यह नई चिन्ता पैदा हुई। अगर जिया की यही रंग हैअपने बाप से लड़ने पर तैयार रहता हैतो मुझसे क्यों दबने लगा? वह रात को बड़ी देर तक इसी फिक्र मे डूबी रही। मंसाराम की आज उसे बहुत याद आई। उसके साथ जिन्दगी आराम से कट जाती। इस लड़के का जब अपने पिता के सामने ही वह हाल हैतो उनके पीछे उसके साथ कैसे निर्वाह होगा! घर हाथ से निकल ही गया। कुछ-न-कुछ कर्ज अभी सिर पर होगा हीआमदनी का यह हाल। ईश्ववर ही बेड़ा पार लगायेंगे। आज पहली बार निर्मला को बच्चों की फिक्र पैदा हुई। इस बेचारी का न जाने क्या हाल  होगा? ईश्वर ने यह विपत्ति सिर डाल दी। मुझे तो इसकी जरुरत न थी। जन्म ही लेना थातो किसी भाग्यवान के घर जन्म लेती। बच्ची उसकी छाती से लिपटी हुई सो रही थी। माता ने उसको और भी चिपटा लियामानो कोई उसके हाथ से उसे छीने लिये जाता है।

    निर्मला के पास ही सुधा की चारपाई भी थी। निर्मेला तो चिन्त्ज्ञ सागर मे गोता था रही थी और सुधा मीठी नींद का आनन्द उठा रही थी। क्या उसे अपने बालक की फिक्र सताती है? मृत्यु तो बूढ़े और जवान का भेद नहीं करतीफिनर सुधा को कोई चिन्ता क्यों नहीं सताती? उसे तो कभी भविष्य की चिन्ता से उदास नहीं देखा।

    सहसा सुधा की नींद खुल गई। उसने निर्मला को अभी तक जागते देखातो बोली- अरे अभी तुम सोई नहीं?

निर्मला- नींद ही नहीं आती।

    सुधा- आंखें बन्द कर लोआप ही नींद आ जायेगी। मैं तो चारपाई पर आते ही मर-सी जाती हूं। वह जागते भी हैंतो खबर नहीं होती। न जाने मुझे क्यों इतनी नींद आती है। शायद कोई रोग है।

    निर्मला- हांबड़ा भारी रोग है। इसे राज-रोग कहते हैं। डॉक्टर साहब से कहो-दवा शुरु कर दें।

    सुधा- तो आखिर जागकर क्या सोचूं? कभी-कभी मैके की याद आ जाती हैतो उस दिन जरा देर में आंख लगती है।

    निर्मला- डॉक्टर साहब की यादा नहीं आती?

    सुधा- कभी नहींउनकी याद क्यों आये? जानती हूं कि टेनिस खेलकर आये होंगेखाना खाया होगा और आराम से लेटे होंगे।

    निर्मला- लोसोहन भी जाग गया। जब तुम जाग गईं

तो भला यह क्यों सोने लगा?   

    सुधा- हां बहिनइसकी अजीब आदत है। मेरे साथ सोता और मेरे ही साथ जागता है। उस जन्म का कोई तपस्वी है। देखोइसके माथे पर तिलक का कैसा निशान है। बांहों पर भी ऐसे ही निशान हैं। जरुर कोई तपस्वी है।

    निर्मला- तपस्वी लोग तो चन्दन-तिलक नहीं लगाते। उस जन्म का कोई धूर्त पुजारी होगा। क्यों रे, तू कहां का पुजारी था? बता?    

    सुधा- इसका ब्याह मैं बच्ची से करुंगी।

    निर्मला- चलो बहिनगाली देती हो। बहिन से भी भाई का ब्याह होता है?

    सुधा- मैं तो करुंगीचाहे कोई कुछ कहे। ऐसी सुन्दर बहू और कहां पाऊंगी? जरा देखो तो बहनइसकी देह कुछ गर्म है या मुझके ही मालूम होती है।

    निर्मला ने सोहन का माथा छूकर कहा-नहीं-नहींदेह गर्म है। यह ज्वर कब आ गया! दूध तो पी रहा है न?

    सुधा- अभी सोया थातब तो देह ठंडी थी। शायद सर्दी लग गईउढ़ाकर सुलाये देती हूं। सबेरे तक ठीक हो जायेगा।

    सबेरा हुआ तो सोहन की दशा और भी खराब हो गई। उसकी नाक   बहने लगी और बुखार और भी तेज हो गया। आंखें चढ़ गईं और सिर झुक गया। न वह हाथ-पैर हिलाता थान हंसता-बोलता थाबसचुपचाप पड़ा था। ऐसा मालूम होता था कि उसे इस वक्त किसी का बोलना अच्छा नहीं लगता। कुछ-कुछ खांसी भी आने लगी। अब तो सुधा घबराई। निर्मला की भी राय हुई कि डॉक्टर साहब को बुलाया जायेलेकिन उसकी बूढ़ी माता ने कहा-डॉक्टर-हकीम साहब का यहां कुछ काम नहीं। साफ तो देख रही हूं। कि बच्चे को नजर लग गई है। भला डॉक्टर

आकर क्या करेंगे?

    सुधा- अम्मांजीभला यहां नजर कौन लगा देगा? अभी तक तो बाहर कहीं गया भी नहीं।

    माता- नजर कोई लगाता नहीं बेटीकिसी-किसी आदमी की दीठ बुरी होती हैआप-ही-आप लग जाती है। कभी-कभी मां-बाप तक की नजर लग जाती है। जब से आया हैएक बार भी नहीं रोया। चोंचले बच्चों को यही गति होती है। मैं इसे हुमकते देखकर डरी थी कि कुछ-न-कुछ अनिष्ट होने वाला है। आंखें नहीं देखती होकितनी चढ़ गई हैं। यही नजर की सबसे बड़ी पहचान है।

    बुढ़िया महरी और पड़ोस की पंडिताइन ने इस कथन का अनुमोदन कर दिया। बस महंगू ने आकर बच्चे का मुंह देखा और हंस कर बोला-मालकिनयह दीठ है और नहीं। जरा पतली-पतली तीलियां मंगवा दीजिए। भगवान ने चाहा तो संझा तक बच्चा हंसने लगेगा।

    सरकण्डे के पांच टुकड़े लाये गये। महगूं ने उन्हें बराबर करके एक डोरे से बांध दिया और कुछ बुदबुदाकर उसी पोले हाथों से पांच बार सोहन का सिर सहलाया। अब जो देखातो पांचों तीलियां छोटी-बड़ी हो गेई थी। सब स्त्रीयों यह कौतुक देखकर दंग रह गईं। अब नजर में किसे सन्देह हो सकता था। महगूं ने फिर बच्चे को तीलियों से सहलाना शुरु किया। अब की तीलियां बराबर हो गईं। केवल थोड़ा-सा अन्तर रह गया। यह सब इस बात का प्रमाण था कि नजर का असर अब थोड़ा-सा और रह गया है। महगू सबको दिलासा देकर शाम को फिर आने का वायदा करके चला गया। बालक की दशा दिन को और खराब हो गई। खांसी का जोर हो गया। शाम के समय महगूं ने आकरा फिर तीलियों का तमाशा किया। इस वक्त पांचों तीलियों बराबर निकलीं। स्त्रीयां निश्चित हो गईं लेकिन सोहन को सारी रात खांसते गुजरी। यहां तक कि कई बार उसकी आंखें उलट गईं। सुधा और निर्मला दोनों ने बैठकर सबेरा किया। खैररात कुशल से कट गई। अब वृद्वा माताजी नया रंग लाईं। महगूं नजर न उतार सकाइसलिए अब किसी मौलवी से फूंक डलवाना जरुरी हो गया। सुधा फिर भी अपने पति को सूचना न दे सकी। मेहरी सोहन को एक चादर से लपेट कर एक मस्जिद में ले गई और फूंक डलवा लाईशाम को भी फूंक छोड़ीपर सोहन ने सिर न उठाया। रात आ गईसुधा ने मन मे निश्चय किया कि रात कुशल से बीतेगीतो प्रात:काल पति को तार दूंगी।

    लेकिन रात कुशल से न बीतने पाई। आधी रात जाते-जाते बच्चा हाथ से निकल गया। सुधा की जीन- सम्पत्ति देखते-देखते उसके हाथों से छिन गई।

    वही जिसके विवाह का दो दिन पहले विनोद हो रहा थाआज सारे घर को रुला रहा है। जिसकी भोली-भाली सूरत देखकर माता की छाती फूल उठती थीउसी को देखकर आज माता की छाती फटी जाती है। सारा घर सुधा को समझाता थापर उसके आंसू न थमते थेसब्र न होता था। सबसे बड़ा दु:ख इस बात का था का पति को कौन मुंह दिखलाऊंगी! उन्हें खबर तक न दी।

    रात ही को तार दे दिया गया और दूसरे दिन डॉक्टर सिन्हा नौ बजते-बजते मोटर पर आ पहुंचे। सुधा ने उनके आने की खबर पाईतो और  भी फूट-फूटकर रोने लगी। बालक की जल-क्रिया हुईडॉक्टर साहब कई बार अन्दर आयेकिन्तु सुधा उनके पास न गई। उनके सामने कैसे जाये? कौन मुंह दिखाये? उसने अपनी नादानी से उनके जीवन का रत्न छीनकर दरिया में डाल दिया। अब उनके पास जाते उसकी छाती के टुकड़े-टुकड़े हुए जाते थे। बालक को उसकी गोद में देखकर पति की आंखे चमक उठती थीं। बालक हुमककर पिता की गोद में चला जाता था। माता फिर बुलातीतो पिता की छाती से चिपट जाता था और लाख चुमराने-दुलारने पर भी बाप को गोद न छोड़ता था। तब मां कहती थी- बैड़ा मतलबी है। आज वह किसे गोद मे लेकर पति के पास जायेगी? उसकी सूनी गोद देखकर कहीं वह चिल्लाकर रो न पड़े। पति के सम्मुख जाने की अपेक्षा उसे मर जाना कहीं आसान जान पड़ता था। वह एक क्षण के लिए भी निर्मला को न छोड़ती थी कि कहीं पति से सामना न हो जाये।

    निर्मला ने कहा- बहिनजो होना था वह हो चुकाअब उनसे कब तक भागती फिरोगी। रात ही को चले जायेंगे। अम्मां कहती थीं।

    सुधा से सजल नेत्रों से ताकते हुए कहा- कौन मुंह लेकर उनके पास जाऊं? मुझे डर लग रहा है कि उनके सामने जाते ही मेरा पैरा न थर्राने लगे    और मैं गिर पडूं।

    निर्मला- चलोमैं तुम्हारे साथ चलती हूं। तुम्हें संभाले रहूंगी।

    सुधा- मुझे छोड़कर भाग तो न जाओगी?

    निर्मला- नहीं-नहींभागूंगी नहीं।

    सुधा- मेरा कलेजा तो अभी से उमड़ा आता है। मैं इतना घोर व्रजपाता होने पर भी बैठी हूं, मुझे यही आश्चर्य हो रहा है। सोहन को वह बहुत प्यार करते थे बहिन। न जाने उनके चित्त की क्या दशा होगी। मैं उन्हें ढाढ़स क्या दूंगी आप हो रोती रहूंगी। क्या रात ही को चले जायेंगे?

    निर्मला- हांअम्मांजी तो कहती थी छुट्टी नहीं ली है।

    दोनो सहेलियां मर्दाने कमरे की ओर चलींलेकिन कमरे के द्वार पर पहुंचकर सुधा ने निर्मला से विदा कर दिया। अकेली कमरे मे दाखिल हुई।

    डॉक्टर साहब घबरा रहे थे कि न जाने सुधा की क्या दशा हो रही है।

 भांति-भांति की शंकाएं मन मे आ रही थीं। जाने को तैयार बैठे थेलेकिन जी न चाहता था। जीवन शून्य-सा मालूम होता था। मन-ही-मन कुढ़ रहे थेअगर ईश्वर को इतनी जल्दी यह पदार्थ देकर छीन लेना थातो दिया ही क्यों था? उन्होंने तो कभी सन्तान के लिए ईश्वर से प्रार्थना न की थी। वह आजन्म नि:सन्तान रह सकते थेपर सन्तान पाकर उससे वंचित हो जाना उन्हं असह्रा जान पड़ता था। क्या सचमुच मनुष्य ईश्वर का खिलौना है? यही मानव जीवन का महत्व है? यह केवल बालकों का घरौंदा हैजिसके बनने का न कोई हेतु है न बिगड़ने का? फिर बालकों को भी तो अपने घरौंदे से अपनी कागेज की नावों सेअपनी लकड़ी के घोड़ों से ममता होती है। अच्छे खिलौने का वह जान के पीछे छिपाकर रखते हैं। अगर ईश्वर बालक ही है तो वह विचित्र बालक है।

    किन्तु बुद्वि तो ईश्चर का यह रुप स्वीकार नहीं करती। अनन्त सृष्टि का कर्त्ता उद्दण्ड बालक नहीं हो सकता है। हम उसे उन सारे गुणों से विभूषित करते हैंजो हमारी बुद्वि का पहुंच से बाहर है। खिलाड़ीपन तो साउन महान् गुणों मे नहीं! क्या हंसते-खेलते बालकों का प्राण हर लेना खेल है? क्या ईश्वर ऐसा पैशाचिक खेल खेलता है?

    सहसा सुधा दबे-पांव कमरे में दाखिल हुई। डासॅक्टर साहब उठ खड़े हुए और उसके समीप आकर बोले-तुम कहां थीसुधा? मैं तुम्हारी राह देख रहा था।

    सुधा की आंखों से कमरा तैरता हुआ जान पड़ा। पति की गर्दन मे हाथ डालकर उसने उनकी छाती पर सिर रख दिया और रोने लगीलेकिन इस अश्रु-प्रवाह में उसे असीम धैर्य और सांत्वना का अनुभव हो रहा था। पति  के वक्ष-स्थल से लिपटी हुई वह अपने हृदय में एक विचित्र स्फूर्ति और बल का संचार होते हुए पाती थी, मानो पवन से थरथराता हुआ दीपक अंचल की आड़ में आ गया हो।

    डॉक्टर साहब ने रमणी के अश्रु-सिंचित कपोलों को दोनो हाथो में लेकर कहा-सुधातुम इतना छोटा दिल क्यों करती हो? सोहन अपने जीवन में जो कुछ करने आया थावह कर चुका थाफिर वह क्यों बैठा रहता? जैसे कोई वृक्ष जल और प्रकाश से बढ़ता हैलेकिन पवन के प्रबल झोकों ही से सुदृढ़ होता हैउसी भांति प्रणय भी दु:ख के आघातों ही से विकास पाता है। खुशी के साथ हंसनेवाले बहुतेरे मिल जाते हैंरंज में जो साथ रोयेवहर हमारा सच्चा मित्र है। जिन प्रेमियों को साथ रोना नहीं नसीब हुआवे मुहब्बत के मजे क्या जानें? सोहन की मृत्यु ने आज हमारे द्वैत को बिलकुल मिटा दिया। आज ही हमने एक दूसरे का सच्चा स्वरुप देखा।;?!

    सुधा ने सिसकते हुए कहा- मैं नजर के धोखे में थी। हाय! तुम उसका मुंह भी न देखने पाये। न जाने इन सदिनों उसे इतनी समझ कहां से आ गई थी। जब मुझे रोते देखतातो अपने केष्ट भूलकर मुस्करा देता। तीसरे ही दिन मरे लाडले की आंख बन्द हो गई। कुछ दवा-दर्पन भी न करने पाईं।

    यह कहते-कहते सुधा के आंसू फिर उमड़ आये। डॉक्टर सिन्हा ने उसे सीने से लगाकर करुणा से कांपती हुई आवाज में कहा-प्रियेआज तक कोई  ऐसा बालक या वृद्व न मरा होगाजिससे घरवालों की दवा-दर्पन की लालसा पूरी हो गई।

    सुधा- निर्मला ने मेरी बड़ी मदद की। मैं तो एकाध झपकी ले भी लेती थीपर उसकी आंखें नहीं झपकी। रात-रात लिये बैठी या टहलती रहती थी। उसके अहसान कभी न भूलंगी। क्या तुम आज ही जा रहे हो?

    डॉक्टर- हांछुट्टी लेने का मौका न था। सिविल सर्जन शिकार खेलने गया हुआ था।

    सुधा- यह सब हमेशा शिकार ही खेला करते हैं?

    डॉक्टर- राजाओं को और काम ही क्या है?

    सुधा- मैं तो आज न जाने दूंगी।

    डॉक्टर- जी तो मेरा भी नहीं चाहता।

    सुधा- तो मत जाओतार दे दो। मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी। निर्मला को भी लेती चलूंगी।

    सुधा वहां से लौटीतो उसके हृदय का बोझ हलका हो गया था। पति की प्रेमपूर्णा कोमल वाणी ने उसके सारे शोक और संताप का हरण कर लिया था। प्रेम में असीम विश्वास हैअसीम धैर्य है और असीम बल है।

 

अठारह

 

ब हमारे ऊपर कोई बड़ी विपत्ति आ पड़ती हैतो उससे हमें केवल दु:ख ही नहीं होताहमें दूसरों के ताने भी सहने पड़ते हैं। जनता को हमारे ऊपर टिप्पणियों करने का वह सुअवसर मिल जाता हैजिसके लिए वह हमेशा बेचैन रहती है। मंसाराम क्या मरामानों समाज को उन पर आवाजें कसने का बहान मिल गया। भीतर की बातें कौन जानेप्रत्यक्ष बात यह थी कि यह सब सौतेली मां की करतूत है चारों तरफ यही चर्चा थीईश्वर ने करे लड़कों को सौतेली मां से पाला पड़े। जिसे अपना बना-बनाया घर उजाड़ना होअपने प्यारे बच्चों की गर्दन पर छुरी फेरनी होवह बच्चों के रहते हुए अपना दूसरा ब्याह करे। ऐसा कभी नहीं देखा कि सौत के आने पर घर तबाह न हो गया होवही बाप जो बच्चों पर जान देता था सौत के आते ही उन्हीं बच्चों का दुश्मन हो जाता है, उसकी मति ही बदल जाती है। ऐसी देवी ने जैन्म ही नहीं लियाजिसने सौत के बच्चों का अपना समझा हो।

    मुश्किल यह थी कि लोग टिप्पणियों पर सन्तुष्ट न होते थे। कुछ ऐसे सज्जन भी थेजिन्हें अब जियाराम और सियाराम से विशेष स्नेह हो गया था। वे दानों बालकों से बड़ी सहानुभूति प्रकट करतेयहां तक कि दो-सएक महिलाएं तो उसकी माता के शील और स्वभाव को याद करे आंसू बहाने लगती थीं। हाय-हाय! बेचारी क्या जानती थी कि उसके मरते ही लाड़लों की यह दुर्दशा होगी! अब दूध-मक्खन काहे को मिलता होगा!

    जियाराम कहता- मिलता क्यों नहीं? 

    महिला कहती- मिलता है! अरे बेटामिलना भी कई तरह का होता है। पानीवाल दूध टके सेर का मंगाकर रख दियापियों चाहे न पियोकौन पूछता है? नहीं तो बेचारी नौकर से दूध दुहवा कर मंगवाती थी। वह तो चेहरा ही कहे देता है। दूध की सूरत छिपी नहीं रहतीवह सूरत ही नहीं रहीं

    जिया को अपनी मां के समय के दूध का स्वाद तो याद था सनहींजो इस आक्षेप का उत्तर देता और न उस समय की अपनी सूरत ही याद थीचुप रह जाता। इन शुभाकांक्षाओं का असर भी पड़ना स्वाभाविक था। जियाराम को अपने घरवालों से चिढ़ होती जाती थी। मुंशीजी मकान नीलामी हो जोने के बाद दूसरे घर में उठ आयेतो किराये की फिक्र हुई। निर्मला ने मक्खन बन्द कर दिया। वह आमदनी हा नहीं रहीतो खर्च कैसे रहता। दोनों कहार अलगे कर दिये गये। जियाराम को यह कतर-ब्योंत बुरी लगती थी। जब निर्मला मैके चली गयीतो मुंशीजी ने दूध भी बन्द कर दिया। नवजात कन्या की चिनता अभी से उनके सिर पर सवार हा गयी थी।

    सियाराम ने बिगड़कर कहा- दूध बन्द रहने से तो आपका महल बन रहा होगा,  भोजन भी बंद कर दीजिए!

    मुंशीजी- दूध पीने का शौक हैतो जाकर दुहा क्यों नही लाते? पानी के पैसे तो मुझसे न दिये जायेंगे।

    जियाराम- मैं दूध दुहाने जाऊंकोई स्कूल का लड़का देख ले तब?

    मुंशीजी- तब कुछ नहीं। कह देना अपने लिए दूध लिए जाता हूं। दूध लाना कोई चोरी नहीं है।

    जियाराम- चोरी नहीं है! आप ही को कोई दूध लाते देख लेतो आपको शर्म न आयेगी।

    मुंशीजी- बिल्कुल नहीं। मैंने तो इन्हीं हाथों से पानी खींचा हैअनाज की गठरियां लाया हूं। मेरे बाप लखपति नहीं थे।

जियाराम-मेरे बाप तो गरीब नहींमैं क्यों दूध दुहाने जाऊं? आखिर आपने कहारों को क्यों जवाब दे दिया?

    मंशीजी- क्या तुम्हें इतना भी नहीं सूझता कि मेरी आमदनी अब पहली सी नहीं रही इतने नादान तो नहीं हो?

    जियाराम- आखिर आपकी आमदनी क्यों कम हो गयी?

    मुंशीजी- जब तुम्हें अकल ही नहीं हैतो क्या समझाऊं। यहां जिन्दगी से तंगे आ गया हूं, मुकदमें कौन ले और ले भी तो तैयार कौन करे? वह दिल ही नहीं रहा। अब तो जिंदगी के दिन पूरे कर रहा हूं। सारे अरमान लल्लू के साथ चले गये।

    जियाराम- अपने ही हाथों न।

    मुंशीजी ने चीखकर कहा- अरे अहमक! यह ईश्वर की मर्जी थी। अपने हाथों कोई अपना गला काटता है।

    जियाराम- ईश्वर तो आपका विवाह करने न आया था।

    मंशीजी अब जब्त न कर सकेलाल-लाल आंखें निकालक बोले-क्या तुम आज लड़ने के लिए कमर बांधकर आये हो? आखिर किस बिरते पर? मेरी रोटियां तो नहीं चलाते? जब इस काबिल हो जाना, मुझे उपदेश देना। तब मैं सुन लूंगा। अभी तुमको मुझे उपदेश देने का अधिकार नहीं है। कुछ दिनों अदब और तमीज़ सीखो। तुम मेरे सलाहकार नहीं हो कि मैं जो काम करुंउसमें तुमसे सलाह लूं। मेरी पैदा की हुई दौलत हैउसे जैसे चाहूं खर्च कर सकता हूं। तुमको जबान खोलने का भी हक नहीं है। अगर फिर तुमने मुझसे बेअदबी कीतो नतीजा बुरा होगा। जब मंसाराम ऐसा रत्न खोकर मरे प्राण न निकलेतो तुम्हारे बगैर मैं मर न जाऊंगा, समझ गये?

    यह कड़ी फटकार पाकर भी जियाराम वहां से न टला। नि:शंक भाव से बोला-तो आप क्या चाहते हैं कि हमें चाहे कितनी ही तकलीफ हो मुंह न खोले? मुझसे तो यह न होगा। भाई साहब को अदब और तमीज का जो इनाम मिलाउसकी मुझे भूख नहीं। मुझमें जहर खाकर प्राण देने की हिम्मत नहीं। ऐसे अदब को दूर से दंडवत करता हूं।

    मुंशीजी- तुम्हें ऐसी बातें करते हुए शर्म नहीं आती?

    जियाराम- लड़के अपने बुजुर्गों ही की नकल करते हैं।

    मुंशीजी का क्रोध शान्त हो गया। जियाराम पर उसका कुछ भी असर न होगाइसका उन्हें यकीन हो गया। उठकर टहलने चले गये। आज उन्हें सूचना मिल गयी के इस घर का शीघ्र ही सर्वनाश होने वाला हैं।

    उस दिन से पिता और पुत्र मे किसी न किसी बात पर रोज ही एक झपट हो जाती है। मुंशीजी ज्यों-त्यों तरह देते थेजियाराम और भी शेर होता जाता था। एक दिन जियाराम ने रुक्मिणी से यहां तक कह डाला- बाप हैं, यह समझकर छोड़ देता हूंनहीं तो मेरे ऐसे-ऐसे साथी हैं कि चाहूं तो भरे बाजार मे पिटवा दूं। रुक्मिणी ने मुंशीजी से कह दिया। मुंशीजी ने प्रकट रुप से तो बेपरवाही ही दिखायीपर उनके मन में शंका समा गया। शाम को सैर करना छोड़ दिया। यह नयी चिन्ता सवार हो गयी। इसी भय से निर्मला को भी न लाते थे कि शैतान उसके साथ भी यही बर्ताव करेगा। जियाराम एक बार दबी जबान में कह भी चुका था- देखूंअबकी कैसे इस घर में आती है? मुंशीजी भी खूब समझ गये थे कि मैं इसका कुछ भी नहीं कर सकता। कोई बाहर का आदमी होतातो उसे पुलिस  और कानून के शिंजे में कसते। अपने लड़के को क्या करें? सच कहा है- आदमी हारता हैतो अपने लड़कों ही से।

    एक दिन डॉक्टर सिन्हा ने जियाराम को बुलाकर समझाना शुरु किया। जियाराम उनका अदब करता था। चुपचाप बैठा सुनता रहा। जब डॉक्टर साहब ने अन्त में पूछाआखिर तुम चाहते क्या हो? तो वह बोला- साफ-साफ कह दूं? बूरा तो न मानिएगा?   

    सिन्हा- नहींजो कुछ तुम्हारे दिल में हो साफ-साफ कह दो।

    जियाराम- तो सुनिएजब से भैया मरे हैंमुझे पिताजी की सूरत देखकर क्रोध आता है। मुझे ऐसा मालूम होता है कि इन्हीं ने भैया की हत्या की है और एक दिन मौका पाकर हम दोनों भाइयों को भी हत्या करेंगे। अगर उनकी यह इच्छा न होती तो ब्याह ही क्यों करते?

    डॉक्टर साहब ने बड़ी मुश्किल से हंसी रोककर कहा- तुम्हारी हत्या करने के लिए उन्हें ब्याह करने की क्या जरुरत थीयह बात मेरी समझ में नहीं आयी। बिना विवाह किये भी तो वह हत्या कर सकते थे।

    जियाराम- कभी नहींउस वक्त तो उनका दिल ही कुछ और थाहम लोगों पर जान देते थे अब मुंह तके नहीं देखना चाहते। उनकी यही इच्छा है कि उन दोनों प्राणियों के सिवा घर में और कोई न रहे। अब जसे लड़के होंगे उनक रास्ते से हम लोगों का हटा देना चाहते है। यही उन दोनों आदमियों की दिली मंशा है। हमें तरह-तरह की तकलीफें देकर भगा देना चाहते हैं। इसीलिए आजकल मुकदमे नहीं लेते। हम दोनों भाई आज मर जायेंतो फिर देखिए कैसी बहार होती है।

    डॉक्टर- अगर तुम्हें भागना ही होतातो कोई इल्जाम लगाकर घर से निकल न देते?

    जियाराम- इसके लिए पहले ही से तैयार बैठा हूं।

    डॉक्टर- सुनूंक्या तैयारी कही है?

    जियाराम- जब मौका आयेगादेख लीजिएगा।

यह कहकर जियराम चलता हुआ। डॉक्टर सिन्हा ने बहुत पुकारापर उसने फिर कर देखा भी नहीं।

    कई दिन के बाद डॉक्टर साहब की जियाराम से फिर मुलाकात हो गयी। डॉक्टर साहब सिनेमा के प्रेमी थे और जियाराम की तो जान ही सिनेमा में बसती थी। डॉक्टर साहब ने सिनेमा पर आलोचना करके जियाराम को बातों में लगा लिया और अपने घर लाये। भोजन का समय आ गया था,, दोनों आदमी साथ ही भोजन करने बैठे। जियाराम को वहां भोजन बहुत स्वादिष्ट लगा, बोल- मेरे यहां तो जब से महाराज अलग हुआ खाने का मजा ही जाता रहा। बुआजी पक्का वैष्णवी भोजन बनाती हैं। जबरदस्ती खा लेता हूंपर खाने की तरफ ताकने को जी नहीं चाहता।

    डॉक्टर- मेरे यहां तो जब घर में खाना पकता हैतो इसे कहीं स्वादिष्ट होता है। तुम्हारी बुआजी प्याज-लहसुन न छूती होंगी?

    जियाराम- हां साहबउबालकर रख देती हैं। लालाली को इसकी परवाह ही नहीं कि कोई खाता है या नहीं। इसीलिए तो महाराज को अलग किया है। अगर रुपये नहीं हैतो गहने कहां से बनते हैं?

    डॉक्टर- यह बात नहीं है जियारामउनकी आमदनी सचमुच बहुत कम हो गयी है। तुम उन्हें बहुत दिक करते हो।

    जियाराम- (हंसकर) मैं उन्हें दिक करता हूं? मुझससे कसम ले लीजिएजो कभी उनसे बोलता भी हूं। मुझे बदनाम करने का उन्होंने बीड़ा उठा लिया है। बेसबबबेवजह पीछे पड़े रहते हैं। यहां तक कि मेरे दोस्तों से भी उन्हें चिढ़ है। आप ही सोचिएदोस्तों के बगैर कोई जिन्दा रह सकता है? मैं कोई लुच्चा नहीं हू कि लुच्चों की सोहबत रखूंमगर आप दोस्तों ही के पीछे मुझे रोज सताया करते हैं। कल तो मैंने साफ कह दिया- मेरे दोस्त घर

आयेंगेकिसी को अच्छा लगे या बुरा। जनाबकोई होहर वक्त की धौंस हीं सह सकता।

    डॉक्टर- मुझे तो भाईउन पर बड़ी दया आती है। यह जमाना उनके आराम करने का था। एक तो बुढ़ापाउस पर जवान बेटे का शोकस्वास्थ्य भी अच्छा नहीं। ऐसा आदमी क्या कर सकता है? वह जो कुछ थोड़ा-बहुत करते हैंवही बहुत है। तुम अभी और कुछ नहीं कर सकतेतो कम-से-कम अपने आचरण से तो उन्हें प्रसन्न रख सकते हो। बुड्ढ़ों को प्रसन्न करना बहुत कठिन काम नहीं। यकीन मानोतुम्हारा हंसकर बोलना ही उन्हें खुश करने को काफी है। इतना पूछने में तुम्हारा क्या खर्च होता है। बाबूजीआपकी तबीयत कैसी है? वह तुम्हारी यह उद्दण्डता देखकर मन-ही-मन कुढ़ते रहते हैं। मैं तुमसे सच कहता हूंकई बार रो चुके हैं। उन्होनें मान लो शादी करने में गलती की। इसे वह भी स्वीकार करते हैंलेकिन तुम अपने कर्त्तव्य से क्यों मुंह मोड़ते हो? वह तुम्हारे पिता है, तुम्हें उनकी सेवा करनी चाहिए। एक बात भी ऐसी मुंह से न निकालनी चाहिए, जिससे उनका दिल दुखे। उन्हें यह खयाल करने का मौका ही क्यों दे कि सब मेरी कमाई खाने वाले हैंबात पूछने वाला कोई नहीं। मेरी उम्र तुमसे कहीं ज्यादा हैजियाराम, पर आज तक मैंने अपने पिताजी की किसी बात का जवाब नहीं दिया। वह आज भी मुझे डांटते हैसिर झुकाकर सुन लेता हूं। जानता हूंवह जो कुछ कहते हैंमेरे भले ही को कहते हैं। माता-पिता से बढ़कर हमारा हितैषी और कौन हो सकता है? उसके ऋण से कौन मुक्त हो सकता है?

    जियाराम बैठा रोता रहा। अभी उसके सद्भावों का सम्पूर्णत: लोप न हुआ थाअपनी दुर्जनता उसे साफ नजर आ रही थी। इतनी ग्लानि उसे बहुत दिनों से न आयी थी। रोकर डॉक्टर साहब से कहा- मैं बहुत लज्जित हूं। दूसरों के बहकाने में आ गया। अब आप मेरी जरा भी शिकयत न सुनेंगे। आप पिताजी से मेरे अपराध क्षमा कर दीजिए। मैं सचमुच बड़ा अभागा हूं। उन्हें मैंने बहुत सताया। उनसे कहिए- मेरे अपराध क्षमा कर देंनहीं मैं मुंह में कालिख लगाकर कहीं निकल जाऊंगाडूब मरुंगा।

    डॉक्टर साहब अपनी उपदेश-कुशलता पर फूले न समाये। जियाराम को गले लगाकर विदा किया।

    जियाराम घर पहुंचा,  तो ग्यारह बज गये थे। मुंशीजी भोजन करे अभी बाहर आये थे। उसे देखते ही बोले- जानते हो कै बजे है? बारह का वक्त है।

    जियाराम ने बड़ी नम्रता से कहा- डॉक्टर सिन्हा मिल गये। उनके साथ उनके घर तक चला गया। उन्होंने खाने के लिए जिद किमजबूरन खाना पड़ा। इसी से देर हो गयी।

    मुंशीज- डॉक्टर सिन्हा से दुखड़े रोने गये होंगे या और कोई काम था।

    जियाराम की नम्रता का चौथा भाग उड़ गयबोला- दुखड़े रोने की मेरी आदत नहीं है।

    मुंशीजी- जरा भी नहींतुम्हारे मुंह मे तो जबान ही नहीं। मुझसे जो लोग तुम्हारी बातें करते हैंवह गढ़ा करते होंगे?

    जियाराम- और दिनों की मैं नहीं कहतालेकिन आज डॉक्टर सिन्हा के यहां मैंने कोई बात ऐसी नहीं कीजो इस वक्त आपके सामने न कर सकूं।

    मुंशीजी- बड़ी खुशी की बात है। बेहद खुशी हुई। आज से गुरुदीक्षा ले ली है क्या?

    जियाराम की नम्रता का एक चतुर्थांश और गायब हो गया। सिर उठाकर बोला- आदमी बिना गुरुदीक्षा लिए हुए भी अपनी बुराइयों पर लज्जित हो सकता है। अपाना सुधार करने के लिए गुरुपन्त्र कोई जरुरी चीज नहीं।

मुंशीजी- अब तो लुच्चे न जमा होंगे?

    जियाराम- आप किसी को लुच्चा क्यों कहते हैंजब तक ऐसा कहने के लिए आपके पास कोई प्रमाण नहीं?

    मुंशीजी- तुम्हारे दोस्त सब लुच्चे-लफंगे हैं। एक भी भला आदमी नही। मैं तुमसे कई बार कह चुका कि उन्हें यहां मत जमा किया करोख् पर तुमने सुना नहीं। आज में आखिर बार कहे देता हूं कि अगर तुमने उन शोहदों को जमा कियातो मुझो पुलिस की सहायता लेनी पड़ेगी।

    जियाराम की नम्रता का एक चतुर्थांश और गायब हो गया। फड़ककार बोला- अच्छी बात हैपुलिस की सहायता लीजिए। देखें क्या करती है? मेरे दोस्तों में आधे से ज्यादा पुलिस के अफसरों ही के बेटे हैं। जब आप ही मेरा सुधार करने पर तुले हुए हैतो मैं व्यर्थ क्यों कष्ट उठाऊं?

    यह कहता हुआ जियाराम अपने कमरे मे चला गया और एक क्षण के बाद हारमोनिया के मीठे स्वरों की आवाज बाहर आने लगी।

    सहृदयता का जलया हुआ दीपक निर्दय व्यंग्य के एक झोंके से बुझ गया। अड़ा हुआ घोड़ा चुमकाराने से जोर मारने लगा थापर हण्टर पड़ते ही फिर अड़ गया और गाड़ी की पीछे ढकेलने लगा।

 

उन्नीस

 

बकी सुधा के साथ निर्मला को भी आना पड़ा। वह तो मैके में कुछ दिन और रहना चाहती थीलेकिन शोकातुर सुधा अकेले कैसे रही! उसको आखिर आना ही पड़ा। रुक्मिणी ने भूंगी से कहा- देखती हैबहू मैके से कैसा निखरकर आयी है!

    भूंगी ने कहा- दीदीमां के हाथ की रोटियां लड़कियों को बहुत अच्छी लगती है।

    रुक्मिणी- ठीक कहती है भूंगीखिलाना तो बस मां ही जानती है।

    निर्मला को ऐसा मालूम हुआ कि घर का कोई आदमी उसके आने से खुश नहीं। मुंशीजी ने खुशी तो बहुत दिखाईपर हृदयगत चिनता को न छिपा सके। बच्ची का नाम सुधा ने आशा रख दिया था। वह आशा की मूर्ति-सी थी भी। देखकर सारी चिन्ता भाग जाती थी। मुंशीजी ने उसे गोद में लेना चाहातो रोने लगीदौड़कर मां से लिपट गयीमानो पिता को पहचानती ही नहीं। मुंशीजी ने मिठाइयों से उसे परचाना चाहा। घर में कोई नौकर तो था नहींजाकर सियाराम से दो आने की मिठाइयां लाने को कहा।

    जियराम भी बैठा हुआ था। बोल उठा- हम लोगों के लिए तो कभी मिठाइयां नहीं आतीं।

    मंशीजी ने झुंझलाकर कहा- तुम लोग बच्चे नहीं हो।

    जियाराम- और क्या बूढ़े हैं? मिठाइयां मंगवाकर रख दीजिएतो मालूम हो कि बच्चे हैं या बूढ़े। निकालिए चार आना और आशा के बदौलत हमारे नसीब भी जागें।

    मुंशीजी- मेरे पास इस वक्त पैसे नहीं है। जाओ  सिया, जल्द जाना।

    जियाराम- सिया नहीं जायेगा। किसी का गुलाम नहीं है। आशा अपने बाप की बेटी हैतो वह भी अपने बाप का बेटा है।

          मुंशीजी- क्या फजूज की बातें करते हो। नन्हीं-सी बच्ची की बराबरी करते तुम्हें शर्म नही आती? जाओ सियारामये पैसे लो।

    जियाराम- मत जाना सिया! तुम किसी के नौकर नहीं हो।

    सिया बड़ी दुविधा में पड़ गया। किसका कहना माने? अन्त में उसने जियाराम का कहना मानने का निश्चय किया। बाप ज्यादा-से-ज्यादा घुड़क देंगेजिया तो मारेगाफिर वह किसके पास फरियाद लेकर जायेगा। बोला- मैं न जाऊंगा।

    मुंशीजी ने धमकाकर कहा- अच्छातो मेरे पास फिर कोई चीज मांगने मत आना।

    मुंशीजी खुद बाजार चले गये और एक रुपये की मिठाई लेकर लौटे। दो आने की मिठाई मांगते हुए उन्हें शर्म आयी। हलवाई उन्हें पहचानता था। दिल में क्या कहेगा?

    मिठाई लिए हुए मुंशीजी अन्दर चले गये। सियाराम ने मिठाई का बड़ा-सा दोना देखातो बाप का कहना न मानने का उसे दुख हुआ। अब वह किस मुंह से मिठाई लेने अन्द जायेगा। बड़ी भूल हुई। वह मन-ही-मन जियाराम को चोटों की चोट और मिठाई की मिठास में तुलना करने लगा।

    सहसा भूंगी ने दो तश्तरियां दोनो के सामने लाकर रख दीं। जियाराम ने  बिगड़कर कहा- इसे उठा ले जा!

    भूंगी- काहे को बिगड़ता हो बाबू क्या मिठाई अच्छी नहीं लगती?

    जियाराम- मिठाई आशा के लिए आयी हैहमारे लिए नहीं आयी? ले जा नहीं तो सड़क पर फेंक दूंगा। हम तो पैसे-पैसे के लिए रटते रहते ह। औ यहां रुपये की मिठाई आती है।

    भूंगी- तुम ले लो सिया बाबूयह न लेंगे न सहीं।

सियाराम ने डरते-डरते हाथ बढ़ाया था कि जियाराम ने डांटकर कहा- मत छूना मिठाईनहीं तो हाथ तोड़कर रख दूंगा। लालची कहीं का!

    सियाराम यह धुड़की सुनकर सहम उठामिठाई खाने की हिम्मत न पड़ी। निर्मला ने यह कथा सुनीतो दोनों लड़कों को मनाने चली। मुंशजी ने कड़ी कसम रख दी।

    निर्मला- आप समझते नहीं है। यह सारा गुस्सा मुझ पर है।

    मुंशीजी- गुस्ताख हो गया है। इस खयाल से कोई सख्ती नहीं करता कि लोग कहेंगेबिना मां के बच्चों को सताते हैंनहीं तो सारी शरारत घड़ी भर में निकाल दूं।

    निर्मला- इसी बदनामी का तो मुझे डर है।

    मुंशीजी- अब न डरुंगाजिसके जी में जो आये कहे।

    निर्मला- पहले तो ये ऐसे न थे।

    मुंशीजी- अजीकहता है कि आपके लड़के मौजूद थेआपने शादी क्यों की! यह कहते भी इसे संकोच नहीं हाता कि आप लोगों ने मंसाराम को विष दे दिया। लड़का नहीं हैशत्रु है।

    जियाराम द्वार पर छिपकर खड़ा था। स्त्री-पुरुष मे मिठाई के विषय मे क्या बातें होती हैं, यही सुनने वह आया था। मुंशीजी का अन्तिम वाक्य सुनकर उससे न रहा गया। बोल उठा- शत्रु न होतातो आप उसके पीछे क्यों पड़ते? आप जो इस वक्त कर हरे हैंवह मैं बहुत पहले समझे बैठा हूं। भैया न समझ थेधोखा ख गये। हमारे साथ आपकी दाला न गलेगी। सारा जमाना कह रहा है कि भाई साहब को जहर दिया गया है। मैं कहता हूं तो आपको क्यों गुस्सा आता है?

    निर्मला तो सन्नाटे में आ गयी। मालूम हुआकिसी  ने उसकी देह पर अंगारे डाल दिये। मंशजी ने डांटकर जियाराम को चुप कराना चाहाजियाराम नि:शं खड़ा ईंट का जवाब पत्थर से देता रहा। यहां तक कि निर्मला को भी उस पर क्रोध आ गया। यह कल का छोकराकिसी काम का न काज कायो खड़ा टर्रा रहा हैजैसे घर भर का पालन-पोषण यही करता हो। त्योंरियां चढ़ाकर बोली- बसअब बहुत हुआ जियाराममालूम हो  गयातुम बड़े लायक होबाहर जाकर बैठो।

    मुंशीजी अब तक तो कुछ दब-दबकर बोलते रहेनिर्मला की शह पाई तो दिल बढ़ गया। दांत पीसकर लपके और इसके पहले कि निर्मला उनके हाथ पकड़ सकेंएक थप्पड़ चला ही दिया। थप्पड़ निर्मला के मुंह पर पड़ावही सामने पडी। माथा चकरा गया। मुंशीजी ने सूखे हाथों में इतनी शक्ति हैइसका वह अनुमान न कर सकती थी। सिर पकड़कर बैठ गयी। मुंशीजी का क्रोध और भी भड़क उठाफिर घूंसा चलाया पर अबकी जियाराम ने उनका हाथ पकड़ लिया और पीछे ढकेलकर बोला- दूर से बातें कीजिएक्यांे नाहक अपनी बेइज्जती करवाते हैं? अम्मांजी का लिहाज कर रहा हूंनहीं तो दिखा देता।

    यह कहता हुआ वह बाहर चला गया। मुंशीजी संज्ञा-शून्य से खड़े रहे। इस वक्त अगर जियाराम पर दैवी वज्र गिर पड़तातो शायद उन्हें हार्दिक आनन्द होता। जिस पुत्र का कभी गोद में लेकर निहाल हो जाते थेउसी के प्रति आज भांति-भांति की दुष्कल्पनाएं मन में आ रही थीं।

    रुक्मिणी अब तक तो अपनी कोठरी में थी। अब आकर बोली-बेटा आपने बराबर का हो जाये तो उस पर हाथ न छोड़ना चाहिए।

    मुंशीजी ने ओंठ चबाकर कहा- मैं इसे घर से निकालकर छोडूंगा। भीख मांगे या चोरी करेमुझसे कोई मतलब नहीं।

    रुक्मिणी- नाक किसकी कटेगी?

    मुंशीजी- इसकी चिन्ता नहीं।

    निर्मला- मैं जानती कि मेरे आने से यह तुफान खड़ा हो जायेगातो भूलकर भी न आती। अब भी भला हैमुझे भेज दीजिए। इस घर में मुझसे न रहा जायेगा।

    रुक्मिणी- तुम्हारा बहुत लिहाज करता है बहूनहीं तो आज अनर्थ ही हो जाता।

    निर्मला- अब और क्या अनर्थ होगा दीदीजी? मैं तो फूंक-फूंककर पांव रखती हूंफिर भी अपयश लग ही जाता है। अभी घर में पांव रखते देर नहीं हुई और यह हाल हो गेया। ईश्वर ही कुशल करे।

    रात को भोजन करने कोई न उठाअकेले मुंशीजी ने खाया।  निर्मला को आज नयी चिन्ता हो गयी- जीवन कैसे पार लगेगा? अपना ही पेट होता तो विशेष चिन्ता न थी। अब तो एक नयी विपत्ति गले पड़ गयी थी। वह सोच रही थी- मेरी बच्ची के भाग्य में क्या लिखा है राम?

 

बीस

 

चि

न्ता में नींद कब आती है? निर्मला चारपाई पर करवटें बदल रही थी। कितना चाहती थी कि नींद आ जायेपर नींद ने न आने की कसम सी खा ली थी। चिराग बुझा दिया थाखिड़की के दरवाजे खोल दिये थेटिक-टिक करने वाली घड़ी भी दूसरे कमरे में रख आयीय थीपर नींद का नाम था। जितनी बातें सोचनी थींसब सोच चुकीचिन्ताओं का भी अन्त हो गया, पर पलकें न झपकीं। तब उसने फिर लैम्प जलाया और एक पुस्तक पढ़ने लगी। दो-चार ही पृष्ठ पढ़े होंगे कि झपकी आ गयी। किताब खुली रह गयी।

    सहसा जियाराम ने कमरे में कदम रखा। उसके पांव थर-थर कांप रहे थे। उसने कमरे मे ऊपर-नीचे देखा। निर्मला सोई हुई थीउसके सिरहाने ताक परएक छोटा-सा पीतल का सन्दूकचा रक्खा हुआ था। जियाराम दबे पांव गयाधीरे से सन्दूकचा उतारा और बड़ी तेजी से कमरे के बाहर निकला। उसी वक्त निर्मला की आंखें खुल गयीं। चौंककर उठ खड़ी हुई। द्वार पर आकर देखा। कलेजा धक् से हो गया। क्या यह जियाराम है? मेरे केमरे मे क्या करने आया था। कहीं मुझे धोखा तो नहीं हुआ? शायद दीदीजी के कमरे से आया हो। यहां उसका काम ही क्या था? शायद मुझसे कुछ कहने आया होलेकिन इस वक्त क्या कहने आया होगा? इसकी नीयत क्या है? उसका दिल कांप उठा।

    मुंशीजी ऊपर छत पर सो रहे थे। मुंडेर न होने के कारण निर्मला ऊपर न सो सकती थी। उसने सोचा चलकर उन्हें जगाऊंपर जाने की हिम्मत न पड़ी। शक्की आदमी हैन जाने क्या समझ बैठें और क्या करने पर तैयार हो जायें? आकर फिर पुस्तक पढ़ने लगी। सबेरे पूछने पर आप ही मालूम हो जायेगा। कौन जाने मुझे धोखा ही हुआ हो। नींद मे कभी-कभी धोखा हो जाता है, लेकिन सबेरे पूछने का निश्चय कर भी उसे फिर नींद नहीं आयी।

    सबेरे वह जलपान लेकर स्वयं जियाराम के पास गयीतो वह उसे देखकर चौंक पड़ा। रोज तो भूंगी आती थी आज यह क्यों आ रही है? निर्मला  की ओर ताकने की उसकी हिम्मत न पड़ी।

    निर्मला ने उसकी ओर विश्वासपूर्ण नेत्रों से देखकर पूछा- रात को तुम मेरे कमरे मे गये थे?

    जियाराम ने विस्मय दिखाकर कहा- मैं? भला मैं रात को क्या करने जाता? क्या कोई गया था?

    निर्मला ने इस भाव से कहामानो उसे उसकी बात का पूरी विश्वास हो गया- हांमुझे ऐसा मालूम हुआ कि कोई मेरे कमरे से निकला। मैंने उसका मुंह तो न देखापर उसकी पीठ देखकर अनुमान किया कि शयद तुम किसी काम से आये हो। इसका पता कैसे चले कौन था? कोई था जरुर इसमें कोई सन्देह नहीं।

    जियाराम अपने को निरपराध सिद्व करने की चेष्टा कर कहने लगा- मै। तो रात को थियेटर देखने चला गया था। वहां से लौटा तो एक मित्र के घर लेट रहा। थोड़ी देर हुई लौटा हूं। मेरे साथ और भी कई मित्र थे। जिससे जी चाहेपूछ लें। हांभाई मैं बहुत डरता हूं। ऐसा न हो, कोई चीज गायब हो गयी,  तो मेरा नामे लगे। चोर को तो कोई पकड़ नहीं सकतामेरे मत्थे जायेगी। बाबूजी को आप जानती हैं। मुझो मारने दौडेंगे।

निर्मला- तुम्हारा नाम क्यों लगेगा? अगर तुम्हीं होते तो भी तुम्हें कोई चोरी नहीं लगा सकता। चोरी दूसरे की चीज की जाती हैअपनी चीज की चोरी कोई नहीं करता।

    अभी तक निर्मला की निगाह अपने सन्दूकचे पर न पड़ी थी। भोजन बनाने लगी। जब वकील साहब कचहरी चले गयेतो वह सुधा से मिलने चली। इधर कई दिनों से मुलाकात न हुई थीफिर रातवाली घटना पर विचार परिवर्तन भी करना था। भूंगी से कहा- कमरे मे से गहनों का बक्स उठा ला।

    भूंगी ने लौटकर कहा- वहां तो कहीं सन्दूक नहीं हैं। ककहां रखा था?   निर्मला ने चिढ़कर कहा- एक बार में तो तेरा काम ही कभी नहीं होता। वहां छोड़कर और जायेगा कहां। आलमारी में देखा था?

    भूंगी- नहीं बहूजीआलमारी में तो नहीं देखाझूठ क्यों बोलूं?

    निर्मला मुस्करा पड़ी। बोली- जा देखजल्दी आ। एक क्षण में भूंगी फिर खाली हाथ लौट आयी- आलमारी में भी तो नहीं है। अब जहां बताओ वहां देखूं।

    निर्मला झुंझलाकर यह कहती हुई उठ खड़ी हुई- तुझे ईश्वर ने आंखें ही न जाने किसलिए दी! देख, उसी कमरे में से लाती हूं कि नहीं।

    भूंगी भी पीछे-पीछे कमरे में गयी। निर्मला ने ताक पर निगाह डालीअलमारी खोलकर देखी। चारपाई के नीचे झांककार देखाफिर कपड़ों का बडा संदूक खोलकर देखा। बक्स का कहीं पता नहीं। आश्चर्य हुआआखिर बक्सा गया कहां?

    सहसा रातवाली घटना बिजली की भांति उसकी आंखों के सामने चमक गयी। कलेजा उछल पड़ा। अब तक निश्चिन्त होकर खोज रही थी। अब ताप-सा चढ़ आया। बड़ी उतावली से चारों ओर खोजने लगी। कहीं पता नहीं। जहां खोजना चाहिए थावहां भी खोजा और जहां नहीं खोजना चाहिए था, वहां भी खोजा। इतना बड़ा सन्दूकचा बिछावन के नीचे कैसे छिप जाता? पर बिछावन भी झाड़कर देखा। क्षण-क्षण मुख की कान्ति मलिन होती जाती थी। प्राण नहीं मे समाते जाते थे। अनत में निराशा होकर उसने छाती पर एक घूंसा मारा और रोने लगी।

    गहने ही स्त्री की सम्पत्ति होते हैं। पति की और किसी सम्पत्ति पर उसका अधिकार नहीं होता। इन्हीं का उसे बल और गौरव होता है। निर्मला के पास पांच-छ: हजार के गहने थे। जब उन्हें पहनकर वह निकलती थीतो उतनी देर के लिए उल्लास से उसका हृदय खिला रहता था। एक-एक गहना मानो विपत्ति और बाधा से बचाने के लिए एक-एक रक्षास्त्र था। अभी रात ही उसने सोचा थाजियाराम की लौंडी बनकर वह न रहेगी। ईश्वर न करे कि वह किसी के सामने हाथ फैलाये। इसी खेवे से वह अपनी नाव को भी पार  लगा देगी और अपनी बच्ची को भी किसी-न-किसी घाट पहुंचा देगी। उसे किस बात की चिन्त है! उन्हें तो कोई उससे न छीन लेगा। आज ये मेरे सिंगार हैंकल को मेरे आधार हो जायेंगे। इस विचार से उसके हृदय को कितनी सान्तवना मिली थी! वह सम्पत्ति आज उसके हाथ से निकल गयी। अब वह निराधार थी। संसार उसे कोई अवलम्ब कोई सहारा न था। उसकी आशाओं का आधार जड़ से कट गयावह फूट-फूटकर रोने लगी। ईश्चर! तुमसे इतना भी न देखा गया? मुझ दुखिया को तुमने यों ही अपंग बना दिया थअब आंखे भी फोड़ दीं। अब वह किसके  सामने हाथ फैलायेगीकिसके द्वार पर भीख मांगेगी। पसीने से उसकी देह भीग गयीरोते-रोते आंखे सूज गयीं। निर्मला सिर नीचा किये रा रही थी। रुक्मिणी उसे धीरज दिला रही थींलेकिन उसके आंसू न रुकते थेशोके की ज्वाल केम ने होती थी।

    तीन बजे जियाराम स्कूल से लौटा। निर्मला उसने आने की खबर पाकर विक्षिप्त की भांति उठी और उसके कमरे के द्वार पर आकर बोली-भैयादिल्लगी की हो तो दे दो।  दुखिया को सताकर क्या पाओगे?

    जियाराम एक क्षण के लिए कातर हो उठा। चोर-कला में उसका यह पहला ही प्रयास था। यह कठारेता, जिससे हिंसा में मनोरंजन होता है अभी तक उसे प्राप्त न हुई थी। यदि उसके पास सन्दूकचा होता और फिर इतना मौका मिलता कि उसे ताक पर रख आवेतो कदाचित् वह उसे मौके को न छोड़तालेकिन सन्दूक उसके हाथ से निकल चुका था। यारों ने उसे सराफें में पहुंचा दिया था और औने-पौने बेच भी डाला थ। चोरों की झूठ के सिवा और कौन रक्षा कर सकता है। बोला-भला अम्मांजीमैं आपसे ऐसी दिल्लगी करुंगा? आप अभी तक मुझ पर शक करती जा रही हैं। मैं कह चुका कि मैं रात को घर पर न थालेकिन आपको यकीन ही नहीं आता। बड़े दु:ख की बात है कि मुझे आप इतना नीच समझती हैं।

    निर्मला ने आंसू पोंछते हुए कहा- मैं तुम्हारे पर शक नहीं करती भैयातुम्हें चोरी नहीं लगाती। मैंने समझाशायद दिल्लगी की हो।

    जियाराम पर वह चोरी का संदेह कैसे कर सकती थी? दुनिया यही तो कहेगी कि लड़के की मां मर गई हैतो उस पर चोरी का इलजाम लगाया जा रहा है। मेरे मुंह मे ही तो कालिख लगेगी!

    जियाराम ने आश्वासन देते हुए कहा- चलिएमैं देखूंआखिर ले कौन गया? चोर आया किस रास्ते से?

    भूंगी- भैयातुम चोरों के आने को कहते हो। चूहे के बिल से तो निकल ही आते हैंयहां तो चारो ओर ही खिड़कियां हैं।

    जियाराम- खूब अच्छी तरह तलाश कर लिया है?

    निर्मला- सारा घर तो छान माराअब कहां खोजने को कहते हो?

    जियाराम- आप लोग सो भी तो जाती हैं मुर्दों से बाजी लगाकर।

चार बजे मुंशीजी घर आयेतो निर्मला की दशा देखकर पूछा- कैसी तबीयत है? कहीं दर्द तो नहीं है? कह कहकर उन्होंने आशा को गोद में उठा लिया।

    निर्मला कोई जवाब न दे सकीफिर रोने लगी।

    भूंगी ने कहा- ऐसा कभी नहीं हुआ था। मेरी सारी उर्म इसी घर मं कट गयी। आज तक एक पैसे की चोरी नहीं हुई। दुनिया यही कहेगी कि भूंगी का कोम हैअब तो भगेवान ही पत-पानी रखें।

    मुंशीजी अचकन के बटन खोल रहे थेफिर बटन बन्द करते हुए बोले- क्या हुआ? कोई चीज चोरी हो गयी?

    भूंगी- बहूजी के सारे गहने उठ गये।

    मुंशीजी- रखे कहां थे?

    निर्मला ने सिसकियां लेते हुए रात की सारी घटना बयाना कर दीपर जियाराम की सूरत के आदमी के अपने कमरे से निकलने की बात न कही। मुंशीजी ने ठंडी सांस भरकर कहा- ईश्वर भी बड़ा अन्यायी है। जो मरे उन्हीं को मारता है। मालूम होता हैअदिन आ गये हैं। मगर चोर आया तो किधर से? कहीं सेंध नहीं पड़ी और किसी तरफ से आने का रास्ता नहीं। मैंने तो कोई ऐसा पाप नहीं कियाजिसकी मुझे यह सजा मिल रही है। बार-बार कहता रहागहने का सन्दूकचा ताक पर मत रखोमगेर कौन सुनता है।

    निर्मला- मैं क्या जानती थी कि यह गजब टूट पड़ेगा!

    मुंशीजी- इतना तो जानती थी कि सब दिन बराबर नहीं जाते। आज बनवाने जाऊंतो इस हजार से कम न लगेंगे। आजकल अपनी जो दशा हैवह तुमसे छिपी नहींखर्च भर का मुश्किल से मिलता है, गहने कहां से बनेंगे। जाता हूंपुलिस में इत्तिला कर आता हूंपर मिलने की उम्मीद न समझो।

    निर्मला ने आपत्ति के भाव से कहा- जब जानते हैं कि पुलिस में इत्तिला करने से कुद न होगा, तो क्यों जा रहे हैं?

    मुंशीजी- दिल नहीं मानता और क्या? इतना बड़ा नुकसान उठाकर चुपचाप तो नहीं बैठ जाता।

    निर्मला- मिलनेवाले होतेतो जाते ही क्यों? तकदीर में न थेतो कैसे रहते?

    मुंशीजी- तकदीर मे होंगेतो मिल जायेंगेनहीं तो गये तो हैं ही।

    मुंशीजी कमरे से निकले। निर्मला ने उनका हाथ पकड़कर कहा- मैं कहती हूंमत जाओकहीं ऐसा न होलेने के देने पड़ जायें।

    मुंशीजी ने हाथ छुड़ाकर कहा- तुम भी बच्चों की-सी जिद्द कर रही हो। दस हजार का नुकसान ऐसा नहीं हैजिसे मैं यों ही उठा लूं। मैं रो नहीं रहा हूंपर मेरे हृदय पर जो बीत रही हैवह मैं ही जानता हूं। यह चोट मेरे  कलेजे पर लगी है। मुंशीजी और कुछ न कह सके। गला फंस गया। वह तेजी से कमरे से निकल आये और थाने पर जा पहुंचे। थानेदार उनका बहुत लिहाज करता था। उसे एक बार रिश्वत के मुकदमे से बरी करा चुके थे। उनके साथ ही तफ्तीश करने आ पहुंचा। नाम था अलायार खां।

    शाम हो गयी थी। थानेदार ने मकान के अगवाड़े-पिछवाड़े घूम-घूमकर देखा। अन्दर जाकर निर्मला के कमरे को गौर से देखा। ऊपर की मुंडेर की जांच की। मुहल्ले के दो-चार आदमियों से चुपके-चुपके कुछ बातें की और तब मुंशीजी से बोले- जनाबखुदा की कसमयह किसी बाहर के आदमी का काम नहीं। खुदा की कसमअगर कोई बाहर की आमदी निकलेतो आज से थानेदारी करना छोड़ दूं। आपके घर में कोई मुलाजिम ऐसा तो नहीं हैजिस पर आपको शुबहा हो।

    मुंशीजी- घर मे तो आजकल सिर्फ एक महरी है।

    थानेदार-अजीवह पगली है। यह किसी बड़े शातिर का काम हैखुदा की कसम। 

    मुंशीजी- तो घर में और कौन है? मेरे दोने लड़के हैंस्त्री है और बहन है। इनमें से किस पर शक करुं?   

    थानेदार- खुदा की कसमघर ही के किसी आदमी का काम हैचाहेवह कोई होइन्शाअल्लाहदो-चार दिन में मैं आपको इसकी खबर दूंगा। यह तो नहीं कह सकता कि माल भी सब मिल जायेगापर खुदा की कसमचोर जरुर पकड़ दिखाऊंगा।

    थानेदार चला गयातो मुंशीजी ने आकर निर्मला से उसकी बातें कहीं। निर्मला सहम उठी- आप थानेदार से कह दीजिएतफतीश न करें,  आपके पैरों पड़ती हूं।

    मुंशीजी- आखिर क्यों? 

    निर्मला- अब क्यों बताऊं? वह कह रहा है कि घर ही के किसी का काम है।

    मुंशीजी- उसे बकने दो।

    जियाराम अपने कमरे में बैठा हुआ भगवान् को याद कर रहा था। उसक मुंह पर हवाइयां उड़ रही थीं। सुन चुका थाकि पुलिसवाले चेहरे से भांप जाते हैं। बाहर निकलने की हिम्मत न पड़ती थी। दोनों आदमियों में क्या बातें हो रही हैंयह जानने के लिए छटपटा रहा था। ज्योंही थानेदार चला गया और भूंगी किसी काम से बाहर निकलीजियाराम ने पूछा-थानेदार क्या कर रहा था भूंगी?  

    भूंगी ने पास आकर कहा- दाढ़ीजार कहता थाघर ही से किसी आदमी का काम हैबाहर को कोई नहीं है।

    जियाराम- बाबूजी ने कुछ नहीं कहा?

    भूंगी- कुछ तो नहीं कहाखड़े हूं-हूं करते रहे। घर मे एक भूंगी ही गैर है न! और तो सब अपने ही हैं।

जियाराम- मैं भी तो गैर हूंतू ही क्यों?

    भूंगी- तुम गैर काहे हो भैया?

    जियाराम- बाबूजी ने थानेदार से कहा नहींघर में किसी पर उनका शुबहा नहीं है।

    भूंगी- कुछ तो कहते नहीं सुना। बेचारे थानेदार ने भले ही कहा- भूंगी तो पगली हैवह क्या चोरी करेगी। बाबूजी तो मुझे फंसाये ही देते थे।

     जियाराम- तब तो तू भी निकल गयी। अकेला मैं ही रह गया। तू ही बतातूने मुझे उस दिन घर में देखा था?

    भूंगी-  नहीं भैयातुम तो ठेठर देखने गये थे।

    जियाराम- गवाही देगी न?

    भूंगी- यह क्या कहते हो भैया? बहूजी तफ्तीश बन्द कर देंगी।

    जियराम- सच?

    भूंगी- हां भैयाबार-बार कहती है कि तफ्तीश न कराओ। गहने गयेजाने दोपर बाबूजी मानते ही नहीं।

     पांच-छ: दिन तक जियाराम ने पेट भर भोजन नहीं किया। कभी दो-चार कौर खा लेताकभी कह देताभूख नहीं है। उसके चेहरे का रंग उड़ा रहता था। रातें जागतें कटतींप्रतिक्षण थानेदार की शंका बनी रहती थी। यदि वह जानता कि मामला इतना तूल खींचेंगातो कभी ऐसा काम न करता। उसने तो समझा था- किसी चोर पर शुबहा होगा। मेरी तरफ किसी का ध्यान भी न जायेगापर अब भण्डा फूटता हुआ मालूम होता था। अभागा थानेदार जिस ढंगे से छान-बीन कर रहा थाउससे जियाराम को बड़ी शंका हो रही थी।

    सातवें दिन संध्या समय घर लौटा तो बहुत चिन्तित था। आज तक उसे बचने की कुछ-न-कुछ आशा थी। माल अभी तक कहीं बरामद न हुआ थापर आज उसे माल के बरामद होने की खबर मिल गयी थी। इसी दम थानेदार कांस्टेबिल के लिए आता होगा। बचने को कोई उपाय नहीं। थानेदार को रिश्वत देने से सम्भव है मुकदमे को दबा देरुपये हाथ में थेपर क्या बात छिपी रहेगी? अभी माल बरामद नही हुआ, फिर भी सारे शहर में अफवाह थी कि बेटे ने ही माल उड़ाया है। माल मिल जाने पर तो गली-गली बात फैल जायेगी। फिर वह किसी को मुंह न दिखा सकेगा।

    मुंशीजी कचहरी से लौटे तो बहुत घबराये हुए थे। सिर थामकर चारपाई पर बैठ गये।

    निर्मला ने कहा- कपड़े क्यों नहीं उतारते? आज तो और दिनों से देर हो गयी है।

    मुंशीजी- क्या कपडे ऊतारुं? तुमने कुछ सुना?

    निर्मला- क्य बात है? मैंने तो कुछ नहीं सुना?

मुंशीजी- माल बरामद हो गया। अब जिया का बचना मुश्किल है।

    निर्मला को आश्चर्य नहीं हुआ। उसके चेहरे से ऐसा जान पड़ामानो उसे यह बात मालूम थी। बोली- मैं तो पहले ही कर रही थी कि थाने में इत्तला मत कीजिए।

    मुंशीजी- तुम्हें जिया पर शका था?

    निर्मला- शक क्यों नहीं थामैंने उन्हें अपने कमरे से निकलते देखा था।

    मुंशीजी- फिर तुमने मुझसे क्यों न कह दिया?

    निर्मला- यह बात मेरे कहने की न थी। आपके दिल में जरुर खयाल आता कि यह ईर्ष्यावश आक्षेप लगा रही है। कहिएयह खयाल होता या नहीं? झूठ न बोलिएगा।

    मुंशीजी- सम्भव हैमैं इन्कार नहीं कर सकता। फिर भी उसक दशा में तुम्हें मुझसे कह देना चाहिए था। रिपोर्ट की नौबत न आती। तुमने अपनी नेकनामी की तो- फिक्र कीपर यह न सोचा कि परिणाम क्या होगा? मैं अभी थाने में चला आता हूं। अलायार खां आता ही होगा!

    निर्मला ने हताश होकर पूछा- फिर अब?

    मुंशीजी ने आकाश की ओर ताकते हुए कहा- फिर जैसी भगवान् की इच्छा। हजार-दो हजार रुपये रिश्वत देने के लिए होते तो शायद मामेला दब जातापर मेरी हालत तो तुम जानती हो। तकदीर खोटी है और कुछ नहीं। पाप तो मैंने किया हैदण्ड कौन भोगेगा? एक लड़का थाउसकी वह दशा हुईदूसरे की यह दशा हो रही है। नालायक थागुस्ताख थागुस्ताख थाकामचोर थापर था ता अपना ही लड़का, कभी-न-कभी चेत ही जाता। यह चोट अब न सही जायेगी।

    निर्मला- अगर कुछ दे-दिलाकर जान बच सकेतो मैं रुपये का प्रबन्ध कर दूं।

    मुंशीजी- कर सकती हो? कितने रुपये दे सकती हो?

    निर्मला- कितना दरकार होगा?

    मुंशीजी- एक हजार से कम तो शायद बातचीत न हो सके। मैंने एक मुकदमे में उससे एक हजार लिए थे। वह कसर आज निकालेगा।

    निर्मला- हो जायेगा। अभी थाने जाइए।

    मुंशीजी को थाने में बड़ी देर लगी। एकान्त में बातचीत करने का बहुत देर मे मौका मिला। अलायार खां पुराना घाघ थ। बड़ी मुश्किल से अण्टी पर चढ़ा। पांच सौ रुवये लेकर भी अहसान का बोझा सिर पर लाद ही दिया। काम हो गया। लौटकर निर्मला से बोला- लो भाई, बाजी मार लीरुपये तुमने दियेपर काम मेरी जबान ही ने किया। बड़ी-बड़ी मुश्किलों से राजी हो गया। यह भी याद रहेगी। जियाराम भोजन कर चुका है?

निर्मला- कहांवह तो अभी घूमकर लौटे ही नहीं।

    मुंशीजी- बारह तो बज रहे होंगें।

    निर्मला- कई दफे जा-जाकर देख आयी। कमरे में अंधेरा पड़ा हुआ है।

    मुंशीजी- और सियाराम?

    निर्मला- वह तो खा-पीकर सोये हैं।

    मुंशीजी- उससे पूछा नहींजिया कहां गया?

    निर्मला- वह तो कहते हैंमुझसे कुछ कहकर नहीं गये।

    मुंशीजी को कुछ शंका हुई। सियाराम को जगाकर पूछा- तुमसे जियाराम ने कुछ कहा नहींकब तक लौटेगा? गया कहां है?

    सियाराम ने सिर खुजलाते और आंखों मलते हुए कहा- मुझसे कुछ नहीं कहा।

    मुंशीजी- कपड़े सब पहनकर गया है?

    सियाराम- जी नहींकुर्ता और धोती।

    मुंशीजी- जाते वक्त खुश था?

    सियाराम- खुश तो नहीं मालूम होते थे। कई बार अन्दर आने का इरादा कियापर देहरी से ही लौट गये। कई मिनट तक सायबान में खड़े रहे। चलने लगेतो आंखें पोंछ रहे थे। इधर कई दिन से अक्सा रोया करते थे।

    मुंशीजी ने ऐसी ठंडी सांस लीमानो जीवन में अब कुछ नहीं रहा और निर्मला से बोले- तुमने किया तो अपनी समझ में भले ही के लिएपर कोई शत्रु भी मुझ पर इससे कठारे आघात न कर सकता था। जियाराम की माता होतीतो क्या वह यह संकोच करती? कदापि नहीं।

    निर्मला बोली- जरा डॉक्टर साहब के यहां क्यों नहीं चले जाते? शायद वहां बैठे हों। कई लड़के रोज आते हैउनसे पूछिएशायद कुछ पता लग जाये। फूंक-फूंककर चलने पर भी अपयश लग ही गया।

    मुंशीजी ने मानो खुली हुई खिड़की से कहा- हांजाता हूं और क्या करुंगा।

    मुंशीज बाहर आये तो देखाडॉक्टर सिन्हा खड़े हैं। चौंककर पूछा- क्या आप देर से खड़े हैं?

    डॉक्टर- जी नहींअभी आया हूं। आप इस वक्त कहां जा रहे हैं? साढ़े बारह हो गये हैं।

    मुंशीजी- आप ही की तरफ आ रहा था। जियाराम अभी तक घूमकर नहीं आया। आपकी तरफ तो नहीं गया था?

    डॉक्टर सिन्हा ने मुंशीजी के दोनों हाथ पकड़ लिए और इतना कह पाये थे, भाई साहबअब धैर्य से काम.. कि मुंशीजी गोली खाये हुए मनुष्य की भांति जमीन पर गिर पड़े।

 

 

इक्कीस

 

रु

किम्णी ने निर्मला से त्यारियां बदलकर कहा- क्या नंगे पांव ही मदरसे जायेगा?

    निर्मला ने बच्ची के बाल गूंथते हुए कहा- मैं क्या करुं? मेरे पास रुपये नहीं हैं।

    रुक्मिणी- गहने बनवाने को रुपये जुड़ते हैंलड़के के जूतों के लिए रुपयों में आग लग जाती है। दो तो चले ही गयेक्या तीसरे को भी रुला-रुलाकर मार डालने का इरादा है?

    निर्मला ने एक सांस खींचकर कहा- जिसको जीना हैजियेगाजिसको मरना हैमरेगा। मैं किसी को मारने-जिलाने नहीं जाती।

    आजकल एक-न-एक बात पर निर्मला और रुक्मिणी में रोज ही झड़प हो जाती थी। जब से गहने चोरी गये हैंनिर्मला का स्वभाव बिलकुल बदल गया है। वह एक-एक कौड़ी दांत से पकड़ने लगी है। सियाराम रोते-रोते चहे जान दे देमगर उसे मिठाई के लिए पैसे नहीं मिलते और यह बर्ताव कुछ सियाराम ही के साथ नहीं हैनिर्मला स्वयं अपनी जरुरतों को टालती रहती है। धोती जब तक फटकनर तार-तार न हो जायेनयी धोती नहीं आती। महीनों सिर का तेल नहीं मंगाया जाता। पान खाने का उसे शौक थाकई-कई दिन तक पानदान खाली पड़ा रहता है, यहां तक कि बच्ची के लिए दूध भी नहीं आता। नन्हे से शिशु का भविष्य विराट् रुप धारण करके उसके विचार-क्षेत्र पर मंडराता रहता ।

    मुंशीजी ने अपने को सम्पूर्णतया निर्मला के हाथों मे सौंप दिया है। उसके किसी काम में दखल नहीं देते। न जाने क्यों उससे कुछ दबे रहते हैं। वह अब बिना नागा कचहरी जाते हैं। इतनी मेहनत उन्होंने जवानी में भी न  की थी। आंखें खराब हो गयी हैंडॉक्टर सिन्हा ने रात को लिखने-पढ़ने की मुमुनियत कर दी हैपाचनशक्ति पहले ही दुर्बल थीअब और भी खराब हो गयी हैदमें की शिकायत भी पैदा ही चली हैपर बेचारे सबेरे से आधी-आधी रात तक काम करते हैं। काम करने को जी चाहे या न चाहेतबीयत अच्छी हो या न होकाम करना ही पड़ता है। निर्मला को उन पर जरा भी दया आती। वही भविष्य की भीषण चिन्ता उसके आन्तरिक सद्भावों को सर्वनाश कर रही है। किसी भिक्षुक की आवाज सुनकर झल्ला पड़ती है। वह एक कोड़ी भी खर्च करना नहीं चाहती ।

    एक दिन निर्मला ने सियाराम को घी लाने के लिए बाजार भेजा। भूंगी पर उनका विश्वास न थाउससे अब कोई सौदा न मांगती थी। सियाराम में काट-कपट की आदत न थी। औने-पौने करना न जानता था। प्राय: बाजार का सारा काम उसी को करना पड़ता। निर्मला एक-एक चीज को तोलतीजरा भी कोई चीज तोल में कम पड़तीतो उसे लौटा देती। सियाराम का बहुत-सा समय इसी लौट-फेरी में बीत जाता था। बाजार वाले उसे जल्दी कोई सौदा न देते। आज भी वही नौबत आयी। सियाराम अपने विचार से बहुत अच्छा घीकई दूकारन से देखकर लायालेकिन निर्मला ने उसे सूंघते ही कहा- घी खराब हैलौटा आओ।

    सियाराम ने झुंझलाकर कहा- इससे अच्छा घी बाजार में नहीं हैमैं सारी दूकाने देखकर लाया हूं?

    निर्मला- तो मैं झूठ कहती हूं?

    सियाराम- यह मैं नहीं कहतालेकिन बनिया अब घी वापिस न लेगा। उसने मुझसे कहा थाजिस तरह देखना चाहोयहीं देखोमाल तुम्हारे सामने है। बोहिनी-बट्टे के वक्त में सौदा वापस न लूंगा। मैंने सूंघकरचखकर लिया। अब किस मुंह से लौटने जाऊ?

    निर्मला ने दांत पीसकर कहा- घी में साफ चरबी मिली हुई है और तुम कहते होघी अच्छा है। मैं इसे रसोई में न ले जाऊंगीतुम्हारा जी चाहे लौटा दोचाहे खा जाओ।

    घी की हांड़ी वहीं छोड़कर निर्मला घर में चली गयी। सियाराम क्रोध और क्षोभ से कातर हो उठा। वह कौन मुंह लेकर लौटाने जाये? बनिया साफ कह देगा- मैं नहीं लौटाता। तब वह क्या करेगा? आस-पास के दस-पांच बनिये और सड़क पर चलने वाले आदमी खाड़े हो जायेंगे। उन सबों के सामने उसे लज्जित होना पड़ेगा। बाजार में यों ही कोई बनिया उसे जल्दी सौदा नहीं देतावह किसी दूकान पर खड़ा होने नहीं पाता। चारों ओर से उसी पर लताड़ पड़ेगी। उसने मन-ही-मन झुंझलाकर कहा- पड़ा रहे घीमैं लौटाने न जाऊंगा।

    मातृ-हीन बालक के समान दुखीदीन-प्राणी संसार में दूसरा नहीं होता और सारे दु:ख भूल जाते हैं। बालक को माता याद आयीअम्मां होतीतो क्या आज मुझे यह सब सहना पड़ता? भैया चले गयेमैं ही अकेला यह विपत्ति सहने के लिए क्यों बचा रहा? सियाराम की आंखों में आंसू की झड़ी लग गयी। उसके शोक कातर कण्ठ से एक गहरे नि:श्वास के साथ मिले हुए ये शब्द निकल आये- अम्मां! तुम मुझे भूल क्यों गयींक्यों नहीं बुला लेतीं?

    सहसा निर्मला फिर कमरे की तरफ आयी। उसने  समझा थासियाराम चला गया होगा। उसे बैठा देखातो गुस्से से बोली- तुम अभी तक बैठे ही हो? आखिर खाना कब बनेगा?

सियाराम ने आंखें पोंड डालीं। बोला- मुझे स्कूल जाने में देर हो जायेगी।

    निर्मला- एक दिन देर हो जायेगी तो कौन हरज है? यह भी तो घर ही का काम है?

    सियाराम- रोज तो यही धन्धा लगा रहता है। कभी वक्त पर स्कूल नहीं पहुंचता। घर पर भी पढ़ने का वक्त नहीं मिलता। कोई सौदा दो-चार बार लौटाये बिना नहीं जाता। डांट तो मुझ पर पड़ती हैशर्मिंदा तो मुझे होना पड़ता हैआपको क्या?

    निर्मला- हांमुझे क्या? मैं तो तुम्हारी दुश्मन ठहरी! अपना होतातब तो उसे दु:ख होता। मैं तो ईश्वर से मानाया करती हूं कि तुम पढ़-लिख न सको। मुझमें सारी बुराइयां-ही-बुराइयां हैंतुम्हारा कोई कसूर नहीं। विमाता का नाम ही बुरा होता है। अपनी मां विष भी खिलायेतो अमृत हैं; मैं अमृत भी पिलाऊंतो विष हो जायेगा। तुम लोगों के कारण में मिट्टी में मिल गयीरोते-रोत उम्र काटी जाती हैमालूम ही न हुआ कि भगवान ने किसलिए जन्म दिया था और तुम्हारी समझ में मैं विहार कर रही हूं। तुम्हें सताने में मुझे बड़ा मजा आता है। भगवान् भी नहीं पूछते कि सारी विपत्ति का अन्त हो जाता।

    यह कहते-कहते निर्मला की आंखें भर आयी। अन्दर चली गयी। सियाराम उसको रोते देखकर सहम उठा। ग्लानिक तो नहीं आयी; पर शंका हुई कि ने जाने कौन-सा दण्ड मिले। चुपके से हांड़ी उठा ली और घी लौटाने चला, इस तरह जैसे कोई कुत्ता किसी नये गांव में जाता है। उसे देखकर साधारण बुद्वि का मनुष्य भी आनुमान कर सकता था कि वह अनाथ है।

    सियाराम ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता थाआनेवाले संग्राम के भय से उसकी हृदय-गति बढ़ती जाती थी। उसने निश्चय किया-बनिये ने घी न लौटायातो वह घी वहीं छोड़कर चला आयेगा। झख मारकर बनिया आप ही बुलायेगा। बनिये को डांटने के लिए भी उसने शब्द सोच लिए। वह कहेगा- क्यों साहूजीआंखों में धूल झोंकते हो? दिखाते हो चोखा माल और और देते ही रद्दी माल? पर यह निश्चय करने पर भी उसके पैर आगे बहुत धीरे-धीरे उठते थे। वह यह न चाहता थाबनिया उसे आता हुआ देखे, वह अकस्मात् ही उसके सामने पहुंच जाना चाहता था। इसलिए वह चक्कार काटकर दूसरी गली से बनिये की दूकान पर गया।

    बनिये ने उसे देखते ही कहा- हमने कह दिया था कि हमे सौदा वापस न लेंगे। बोलोंकहा था कि नहीं।

    सियाराम ने बिगड़कर कहा- तुमने वह घी कहां दियाजो दिखाया था? दिखाया एक मालदिया दूसरा माललौटाओगे कैसे नहीं? क्या कुछ राहजनी है?

साह- इससे चोखा घी बाजार में निकल आये तो जरीबाना दूं। उठा लो हांड़ी और दो-चार दूकार देख आओ।

    सियाराम- हमें इतनी फुर्सत नहीं है। अपना घी लौटा लो।

    साह- घी न लौटेगा।

    बनिये की दुकान पर एक जटाधारी साधू बैठा हुआ यह तमाश देख रहा था। उठकर सियाराम के पास आया और हांड़ी का घी सूंघकर बोला- बच्चाघी तो बहुत अच्छा मालूम होता है।

    साह सने शह पाकर कहा- बाबाजी हम लोग तो आप ही इनको घटिया माल नहीं देते। खराब माल क्या जाने-सुने ग्राहकों को दिया जाता है?

    साधु- घी ले जाव बच्चाबहुत अच्छा है।

    सियाराम रो पड़ा। घी को बुरा सिद्वा करने के लिए उसके पास अब क्या प्रमाण था? बोला- वही तो कहती हैंघी अच्छा नहीं है, लौटा आओ। मैं तो कहता था कि घी अच्छा है।

    साधु- कौन कहता है?

    साह- इसकी अम्मां कहती होंगी। कोई सौदा उनके मन ही नहीं भाता।

    बेचारे लड़के को बार-बार दौड़ाया करती है। सौतेली मां है न! अपनी मां हो तो कुछ ख्याल भी करे।

    साधु ने सियराम को सदय नेत्रों से देखामानो उसे त्राण देने के लिए उनका हृदय विकल हो रहा है। तब करुण स्वर से बोले- तुम्हारी माता का स्वर्गवास हुए कितने दिन हुए बच्च?

    सियाराम- छठा साल है।

    साधु- ता तुम उस वक्त बहुत ही छोटे रहे होंगे। भगेवान् तुम्हारी लीला कितनी विचित्र है। इस दुधमुंहे बालक को तुमने मात्-प्रेम से वंचित कर दिया। बड़ा अनर्थ करते हो भगवान्! छ: साल का बालक और राक्षसी विमाता के पानले पड़े! धन्य हो दयानिधि! साहजीबालक पर दया करोघी लौटा लोनहीं तो इसकी मात इसे घर में रहने न देगी। भगवान की इच्छा से तुम्हारा घी जल्द बिक जायेगा। मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ रहेगां

    साहजी ने रुपये वापस न किये। आखिर लड़के को फिर घी लेने आना ही पड़ेगा। न जाने दिन में कितनी बार चक्कर लगाना पड़े और किस जालिये से पाला पड़े। उसकी दुकान में जो घी सबसे अच्छा थावह सियाराम दिल से सोच रहा थाबाबाजी कितने दयालु हैं? इन्होंने सिफारिश न की होतीतो साहजी क्यों अच्छा घी देते?

    सियाराम घी लेकर चलातो बाबाजी भी उसके साथ ही लिये। रास्ते में

मीठी-मीठी बातें करने लगे।

    बच्चामेरी माता भी मुझे तीन साल का छोड़कर परलोक सिधारी थीं। तभी से मातृ-विहीन बालकों को देखता हूं तो मेरा हृदय फटने लगता हैं।

    सियाराम ने पूछा- आपके पिताजी ने भी तो दूसरा विवाह कर लिया था?

    साधु- हांबच्चानहीं तो आज साधु क्यों होता? पहले तो पिताजी विवाह न करते थे। मुझे बहुत प्यार करते थेफिर न जाने क्यों मन बदल गयाविवाह कर लिया।  साधु हूंकटु वचन मुंह से नहीं निकालना चाहिए, पर मेरी विमात जितनी ही सुन्दर थींउतनी ही कठोर थीं। मुझे दिन-दिन-भर खाने को न देतींरोता तो मारतीं। पिताजी की आंखें भी फिर गयीं। उन्हें मेरी सूरत से घृणा होने लगी। मेरा रोना सुनकर मुझे पीटने लगते। अन्त को मैं एक दिन घर से निकल खड़ा हुआ।

    सियाराम के मन में भी घर से निकल भागने का विचार कई बार हुआ था। इस समय भी उसके मन में यही विचार उठ रहा था। बड़ी उत्सुकता से बोला-घर से निकलकर आप कहां गये?

    बाबाजी ने हंसकर कहा- उसी दिन मेरे सारे कष्टों का अन्त हो गया जिस दिन घर के मोह-बन्धन से छूटा और भय मन से निकलाउसी दिन मानो मेरा उद्वार हो गया। दिन भर मैं एक पुल के नीचे बैठा रहा। संध्या समय मुझे एक महात्मा मिल गये। उनका स्वामी परमानन्दजी था। वे बाल-ब्रह्रचारी थे। मुझ पर उन्होंने दया की और अपने साथ रख लिया। उनके साथ रख लिया। उनके साथ मैं देश-देशान्तरों में घूमने लगा। वह बड़े अच्छे योगी थे। मुझे भी उन्होंने योग-विद्या सिखाई। अब तो मेरे को इतना अभ्यास हो येगया है कि जब इच्छा होती हैमाताजी के दर्शन कर लेता हूंउनसे बात कर लेता हूं।

    सियाराम ने विस्फारित नेत्रों से देखकर पूछा- आपकी माता का तो देहान्त हो चुका था?

    साधु- तो क्या हुआ बच्चयोग-विद्या में वह शक्ति है कि जिस मृत-आत्म को चाहेबुला ले।

    सियाराम- मैं योग-विद्या सीख् लूंतो मुझे भी माताजी के दर्शन होंगे?

    साधु- अवश्यअभ्यास से सब कुछ हो सकता है। हांयोग्य गुरु चाहिए। योग से बड़ी-बड़ी सिद्वियां प्राप्त हो सकती हैं। जितना धन चाहोपल-मात्र में मंगा सकते हो। कैसी ही बीमारी होउसकी औषधि अता सकते हो।

    सियाराम- आपका स्थान कहां है?

    साधु- बच्चामेरे को स्थान कहीं नहीं है। देश-देशान्तरों से रमता फिरता हूं। अच्छा, बच्चा अब तुम जाओमै। जरा स्नान-ध्ययान करने जाऊंगा।

    सियराम- चलिए मैं भी उसी तरफ चलता हूं। आपके दर्शन से जी नहीं भरा।

साधु- नहीं बच्चातुम्हें पाठशाला जाने की देरी हो रही है।

    सियराम- फिर आपके दर्शन कब होंगे?

    साधु- कभी आ जाऊंगा बच्चातुम्हारा घर कहां है?

    सियाराम प्रसन्न होकर बोला- चलिएगा मेरे घर? बहुत नजदीक है। आपकी बड़ी कृपा होगी।

    सियाराम कदम बढ़ाकर आगे-आगे चलने लगा। इतना प्रसन्न था,  मानो सोने की गठरी लिए जाता हो। घर के सामने पहुंचकर बोला- आइएबैठिए कुछ देर।

    साधु- नहीं बच्चाबैठूंगा नहीं। फिर कल-परसों किसी समय आ जाऊंगा। यही तुम्हारा घर है?

    सियाराम- कल किस वक्त आइयेगा?

    साधु- निश्चय नहीं कह सकता। किसी समय आ जाऊंगा।

    साधु आगे बढ़ेतो थोड़ी ही दूर पर उन्हें एक दूसरा साधु मिला। उसका नाम था हरिहरानन्द।

    परमानन्द से पूछा- कहां-कहां की सैर की? कोई शिकार फंसा?

    हरिहरानन्द- इधरा चारों तरफ घूम आयाकोई शिकार न मिलां एकाध मिला भीतो मेरी हंसी उड़ाने लगा।

    परमानन्द- मुझे तो एक मिलता हुआ जान पड़ता है! फंस जाये तो जानूं।

    हरिहरानन्द- तुम यों ही कहा करते हो। जो आता  हैदो-एक दिन के बाद निकल भागता है।

    परमानन्द- अबकी न भागेगादेख लेना। इसकी मां मर गयी है। बाप ने दूसरा विवाह कर लिया है। मां भी सताया करती है। घर से ऊबा हुआ है।

    हरिहरानन्द- खूब अच्छी तरह। यही तरकीब सबसे अच्छी है। पहले इसका पता लगा लेना चाहिए कि मुहल्ले में किन-किन घरों में विमाताएं हैं? उन्हीं घरों में फन्दा डालना चाहिए।

 

बाईस

 

नि

र्मला ने बिगड़कर कहा- इतनी देर कहां लगायी?

सियाराम ने ढिठाई से कहा- रास्ते में एक जगह सो गया था।

    निर्मला- यह तो मैं नहीं कहतीपर जानते हो कै बज गये हैं? दस कभी के बज गये। बाजार कुद दूर भी तो नहीं है।

    सियाराम- कुछ दूर नहीं। दरवाजे ही पर तो है।

    निर्मला- सीधे से क्यों नहीं बोलते? ऐसा बिगड़ रहे होजैसे मेरा ही कोई कामे करने गये हो?

    सियाराम- तो आप व्यर्थ की बकवास क्यों करती हैं? लिया सौदा लौटाना क्या आसान काम है? बनिये से घंटों हुज्जत करनी पड़ी यह तो कहो, एक बाबाजी ने कह-सुनकर फेरवा दियानहीं तो किसी तरह न फेरता। रास्ते में कहीं एक मिनट भी न रुकासीधा चला आता हूं।

    निर्मला- घी के लिए गये-गयेतो तुम ग्यारह बजे लौटे होलकड़ी के लिए जाओगेतो सांझ ही कर दोगे। तुम्हारे बाबूजी बिना खाये ही चले गये। तुम्हें इतनी देर लगानी थातो पहले ही क्यों न कह दिया? जाते ही लकड़ी के लिए।

    सियाराम अब अपने को संभाल न सका। झल्लाकर बोला- लकड़ी किसी और से मंगाइए। मुझे स्कूल जाने को देर हो रही है।

    निर्मला- खाना न खाओगे?

    सियाराम- न खाऊंगा।

    निर्मला- मैं खाना बनाने को तैयार हूं। हांलकड़ी लाने नहीं जा सकती।

    सियाराम- भूंगी को क्यों नहीं भेजती?

    निर्मला- भूंगी का लाया सौदा तुमने कभी देखा नहीं हैं?

    सियाराम- तो मैं इस वक्त न जाऊंगा।

    निर्मला- मुझे दोष न देना।

    सियाराम कई दिनों से स्कूल नहीं गया था। बाजार-हाट के मारे उसे किताबें देखने का समय ही न मिलता था। स्कूल जाकर झिड़कियां खानसे बेंच पर खड़े होने या ऊंची टोपी देने के सिवा और क्या मिलता? वह घर से किताबें लेकर चलतापर शहर के बाहर जाकर किसी वृक्ष की छांह में बैठा रहता या पल्टनों की कवायद देखता। तीन बजे घर से लौट आता। आज भी वह घर से चलालेकिन बैठने में उसका जी न लगाउस पर आंतें अल ग जल रही थीं। हा! अब उसे रोटियों के भी लाले पड़ गये। दस बजे क्या खाना न बन सकता था? माना कि बाबूजी चले गये थे। क्या मेरे लिए घर में दो-चार पैसे भी न थे? अम्मां होतींतो इस तरह बिना कुछ खाये-पिये आने देतीं? मेरा अब कोई नहीं रहा।

    सियाराम का मन बाबाजी के दर्शन के लिए व्याकुल हो उठा। उसने सोचा- इस वक्त वह कहां मिलेंगे? कहां चलकर देखूं? उनकी मनोहर वाणीउनकी उत्साहप्रद सान्त्वनाउसके मन को खींचने लगी। उसने आतुर होकर कहा- मैं उनके साथ ही क्यों न चला गया? घर पर मेरे लिए क्या रखा था?

वह आज यहां से चला तो घर न जाकर सीधा घी वाले साहजी की दुकान पर गया। शायद बाबाजी से वहां मुलाकात हो जायेपर वहां बाबाजी न थे। बड़ी देर तक खड़ा-खड़ा लौट आया।

    घर आकर बैठा ही था किस निर्मला ने आकर कहा- आज देर कहां लगाई? सवेरे खाना नहीं बनाक्या इस वक्त भी उपवास होगा? जाकर बाजार से कोई तरकारी लाओ।

    सियाराम ने झल्लाकर कहा- दिनभर का भूखा चला आता हूं; कुछ पीनी पीने तक को लाई नहींऊपर से बाजार जाने का हुक्म दे दिया। मैं नहीं जाता बाजारकिसी का नौकर नहीं हूं। आखिर रोटियां ही तो खिलाती हो या और कुछ? ऐसी रोटियां जहां मेहनत करुंगावहीं मिल जायेंगी। जब मजूरी ही करनी हैतो आपकी न करुंगाजाइए मेरे लिए खाना मत बनाइएगा।

    निर्मला अवाक् रह गयी। लड़के को आज क्या हो गया? और दिन तो चुपके से जाकर काम कर लाता थाआज क्यों त्योरियां बदल रहा है? अब भी उसको यह न सूझी कि सियाराम को दो-चार पैसे कुछ खाने के दे दे। उसका स्वभाव इतना कृपण हो गया थाबोली- घर का काम करना तो मजूरी नहीं कहलाती। इसी तरह मैं भी कह दूं कि मैं खाना नहीं पकातीतुम्हारे बाबूजी कह दें कि कचहरी नहीं जातातो क्या हो बताओ? नहीं जाना चाहतेतो मत जाओभूंगी से मंगा लूंगी। मैं क्या जानती थी कि तुम्हें बाजार जाना बुरा लगता है, नहीं तो बला से धेले की चीज पैसे में आतीतुम्हें न भेजती। लोआज से कान पकड़ती हूं।

    सियाराम दिल में कुछ लज्जित तो हुआपर बाजार न गया। उसका ध्यान बाबाजी की ओर लगा हुआ था। अपने सारे दुखों का अन्त और जीवन की सारी आशाएं उसे अब बाबाजी क आशीर्वाद में मालूम होती थीं। उन्हीं की शरण जाकर उसका यह आधारहीन जीवन सार्थक होगा। सूर्यास्त के समय वह अधीर हो गया। सारा बाजार छान मारालेकिन बाबाजी का कहीं पता न मिला। दिनभर का भूख-प्यासावह अबोध बालक दुखते हुए दिल को हाथों से दबायेआशा और भय की मूर्ति बनादुकानोंगालियों और मन्दिरों में उस आश्रमे को खोजता फिरता थाजिसके बिना उसे अपना जीवन दुस्सह हो रहा था। एक बार मन्दिर के सामने उसे कोई साधु खड़ा दिखाई दिया। उसने समझा वही हैं। हर्षोल्लास से वह फूल उठा। दौड़ा और साधु के पास खड़ा हो गया। पर यह कोई और ही महात्मा थे। निराश हो कर आगे बढ़ गया।

    धारे-धीरे सड़कों पर सन्नाटा दा गयाघरों के द्वारा बन्द होने लगे। सड़क की पटरियों पर और गलियों में बंसखटे या बोरे बिछा-बिछाकर भारत की प्रजा सुख-निद्रा में मग्न होने लगीलेकिन सियाराम घर न लौटा। उस घर से उसक दिल फट गया थाजहां किसी को उससे प्रेम न थाजहां वह किसी पराश्रित की भांति पड़ा हुआ थाकेवल इसीलिए कि उसे और कहीं शरण न थी। इस वक्त भी उसके घर न जाने को किसे चिन्ता होगी? बाबूजी भोजन करके लेटे होंगेअम्मांजी भी आराम करने जा रही होंगी। किसी ने मेरे कमरे की ओर झांककर देखा भी न होगा। हांबुआजी घबरा रही होंगीवह अभी तक मेरी राह देखती होंगी। जब तक मैं न जाऊंगाभोजन न करेंगी।

    रुक्मिणी की याद आते ही सियाराम घर की ओर चल दिया। वह अगर और कुछ न कर सकती थीतो कम-से-कम उसे गोद में चिमटाकर रोती थी? उसके बाहर से आने पर हाथ-मुंह धोने के लिए पानी तो रख देती थीं। संसार में सभी बालक दूध की कुल्लियों नहीं करतेसभी सोने के कौर नहीं खाते। कितनों के पेट भर भोजन भी नहीं मिलता; पर घर से विरक्त वही होते हैंजो मातृ-स्नेह से वंचित हैं।

    सियाराम घर की ओर चला ही कि सहसा बाबा परमानन्द एक गली से आते दिखायी दिये।

    सियाराम ने जाकर उनका हाथ पकड़ लिया। परमानन्द ने चौंककर पूछा- बच्चातुम यहां कहां?

    सियाराम ने बात बनाकर कहा- एक दोस्त से मिलने आया था। आपका स्थान यहां से कितनी दूर है?

    परमानन्द- हम लोग तो आज यहां से जा रहे हैंबच्चाहरिद्वार की यात्रा है।

    सियाराम ने हतोत्साह होकर कहा- क्या आज ही चले जाइएगा?

    परमानन्द- हां बच्चाअब लौटकर आऊंगातो दर्शन दूंगा?

    सियाराम ने कात कंठ से कहा- मैं भी आपके साथ चलूंगा।

    परमानन्द- मेरे साथ! तुम्हारे घर के लोग जाने देंगे?

    सियाराम- घर के लोगों को मेरी क्या परवाह है? इसके आगे सियाराम और कुछ सन कह सका। उसके अश्रु-पूरित नेत्रों ने उसकी करुणा
-गाथा उससे कहीं विस्तार के साथ सुना दी
जितनी उसकी वाणी कर सकती थी।

    परमानन्द ने बालक को कंठ से लगाकर कहा- अच्छा बच्चतेरी इच्छा हो तो चल। साधु-सन्तों की संगति का आनन्द उठा। भगवान् की इच्छा होगी तो तेरी इच्छा पूरी होगी।

    दाने पर मण्डराता हुआ पक्षी अन्त में दाने पर गिर पड़ा। उसके जीवन का अन्त पिंजरे में होगा या व्याध की छुरी के तले- यह कौन जानता है?

 

तेईस

 

मुं

शीजी पांच बजे कचहरी से लौटे और अन्दर आकर चारपाई पर गिर पड़े। बुढ़ापे की देहउस पर आज सारे दिन भोजन न मिला। मुंह सूख गया। निर्मला समझ गयीआज दिन खाली गयां निर्मला ने पूछा- आज कुछ न मिला।

    मुंशीजी- सारा दिन दौड़ते गुजरापर हाथ कुछ न लगा।

    निर्मला- फौजदारी वाले मामले में क्या हुआ?

    मुंशीजी- मेरे मुवक्किल को सजा हो गयी।

    निर्मला- पंडित वाले मुकदमे में?

    मुंशीजी- पंडित पर डिग्री हो गयी।

    निर्मला- आप तो कहते थेदावा खरिज हो जायेगा।

    मुंशीजी- कहता तो थाऔर जब भी कहता हूं कि दावा खारिज हो जाना चाहिए थामगर उतना सिर मगजन कौन करे?

    निर्मला- और सीरवाले दावे में?

    मुंशीजी- उसमें भी हार हो गयी।

    निर्मला- तो आज आप किसी अभागे का मुंह देखकर उठे थे।

    मुंशीजी से अब काम बिलकुल न हो सकता थां एक तो उसके पास मुकदमे आते ही न थे और जो आते भी थेवह बिगड़ जाते थे। मगर अपनी असफलताओं को वह निर्मला से छिपाते रहते थे। जिस दिन कुछ हाथ न लगताउस दिन किसी से दो-चार रुपये उधार लाकर निर्मला को देतेप्राय: सभी मित्रों से कुछ-न-कुछ ले चुके थे। आज वह डौल भी न लगा।

    निर्मला ने चिन्तापूर्ण स्वर में कहा- आमदनी का यह हाल हैतो ईश्श्वर ही मालिक हैउसक पर बेटे का यह हाल है कि बाजार जाना मुश्किल है। भूंगी ही से सब काम कराने को जी चाहता है। घी लेकर ग्यारह बजे लौटा। कितना कहकर हार गयी कि लकड़ी लेते आओपर सुना ही नहीं।

    मुंशीजी- तो खाना नहीं पकाया?

    निर्मला- ऐसी ही बातों से तो आप मुकदमे हारते हैं। ईंधन के बिना किसी ने खाना बनाया है कि मैं ही बना लेती?

    मुंशीजी- तो बिना कुछ खाये ही चला गया।

    निर्मला- घर में और क्या रखा था जो खिला देती?

    मुंशीजी  ने डरते-डरते कहका- कुछ पैसे-वैसे न दे दिये?

    निर्मला ने भौंहे सिकोड़कर कहा- घर में पैसे फलते हैं न?

मुंशीजी ने कुछ जवाब न दिया। जरा देर तक तो प्रतीक्षा करते रहे कि शायद जलपान के लिए कुछ मिलेगालेकिन जब निर्मला ने पानी तक न मंगवायतो बेचारे निराश होकर चले गये। सियाराम के कष्ट का अनुमान करके उनका चित्त चचंल हो उठा। एक बार भूंगी ही से लकड़ी मंगा ली जातीतो ऐसा क्या नुकसान हो जाता? ऐसी किफायत भी किस काम की कि घर के आदमी भूखे रह जायें। अपना संदूकचा खोलकर टटोलने लगे कि शायद दो-चार आने पैसे मिल जायें। उसके अन्दर के सारे कागज निकाल डालेएक-एकखाना देखानीचे हाथ डालकर देखा पर कुछ न मिला। अगर निर्मला के सन्दूक में पैसे न फलते थेतो इस सन्दूकचे में शायद इसके फूल भी न लगते होंलेकिन संयोग ही कहिए कि कागजों को झाडक़ते हुए एक चवन्नी गिर पड़ी। मारे हर्ष के मुंशीजी उछल पड़े। बड़ी-बड़ी रकमें इसके पहले कमा चुके थेपर यह चवन्नी पाकर इस समय उन्हें जितना आह्लाद हुआउनका पहले कभी न हुआ था। चवन्नी हाथ में लिए हुए सियाराम के कमरे के सामने आकर पुकारा। कोई जवाब न मिला। तब कमरे में जाकर देखा। सियाराम का कहीं पता नहीं- क्या अभी स्कूल से नहीं लौटा? मन में यह प्रश्न उठते ही मुंशीजी ने अन्दर जाकर भूंगी से पूछा। मालूम हुआ स्कूल से लौट आये।

    मुंशीजी ने पूछा- कुछ पानी पिया है?

    भूंगी ने कुछ जवाब न दिया। नाक सिकोड़कर मुंह फेरे हुए चली गयी।

    मुंशीजी अहिस्ता-आहिस्ता आकर अपने कमरे में बैठ गये। आज पहली बार उन्हें निर्मेला पर क्रोध आयालेकिन एक ही क्षण क्रोध का आघात अपने ऊपर होने लगा। उस अंधेरे कमेरे में फर्श पर लेटे हुए वह अपने पुत्र की ओर से इतना उदासीन हो जाने पर धिक्कारने लगे। दिन भर के थके थे। थोड़ी ही देर में उन्हें नींद आ गयी।

    भूंगी ने आकर पुकारा- बाबूजीरसोई तैयार है।

    मुंशीजी चौंककर उठ बैठे। कमरे में लैम्प जल रहा था पूछा- कै बज गये भूंगी? मुझे तो नींद आ गयी थी।

    भूंगी ने कहा- कोतवाली के घण्टे में नौ बज गये हैं और हम नाहीं जानित।

    मुंशीजी- सिया बाबू आये?

    भूंगी- आये होंगेतो घर ही में न होंगे।

    मुंशीजी ने झल्लाकर पूछा- मैं पूछता हूंआये कि नहीं? और तू न जाने क्या-क्या जवाब देती है? आये कि नहीं?

    भूंगी- मैंने तो नहीं देखाझूठ कैसे कह दूं।

    मुंशीजी फिर लेट गये और बोले- उनको आ जाने देतब चलता हूं।

    आध घंटे द्वार की ओर आंख लगाए मुंशीजी लेटे रहेतब वह उठकर बाहर आये और दाहिने हाथ कोई दो फर्लांग तक चले। तब लौटकर द्वार पर आये और पूछा- सिया बाबू आ गये?

    अन्दर से आवाज आयी- अभी नहीं।

    मुंशीजी फिर बायीं ओर चले और गली के नुक्कड़ तक गये। सियाराम कहीं दिखाई न दिया। वहां से फिर घर आये और द्वारा पर खड़े होकर पूछा- सिया बाबू आ गये?

    अन्दर से जवाब मिला- नहीं।

    कोतवाली के घंटे में दस बजने लगे।

    मुंशीजी बड़े वेग से कम्पनी बाग की तरफ चले। सोचन लगेशायद वहां घूमने गया हो और घास पर लेटे-लेट नींद आ गयी हो। बाग में पहुंचकर उन्होंने हरेक बेंच को देखाचारों तरफ घूमेबहुते से आदमी घास पर पड़े हुए थेपर सियाराम का निशान न था। उन्होंने सियाराम का नाम लेकर जोर से पुकारापर कहीं से आवाज न आयी।

    ख्याल आया शायद स्कूल में तमाशा हो रहा हो। स्कूल एक मील से कुछ ज्यादा ही था। स्कूल की तरफ चलेपर आधे रास्ते से ही लौट पड़े। बाजार बन्द हो गया था। स्कूल में इतनी रात तक तमाशा नहीं हो सकता। अब भी उन्हें आशा हो रही थी कि सियाराम लौट आया होगा। द्वार पर आकर उन्होंने पुकारा- सिया बाबू आये? किवाड़ बन्द थे। कोई आवाज न आयी। फिर जोर से पुकारा। भूंगी किवाड़ खोलकर बोली- अभी तो नहीं आये। मुंशीजी ने धीरे से भूंगी को अपने पास बुलाया और करुण स्वर में बोले- तू ता घर की सब बातें जानती हैबता आज क्या हुआ था?

    भूंगी- बाबूजीझूठ न बोलूंगीमालकिन छुड़ा देगी और क्या? दूसरे का लड़का इस तरह नहीं रखा जाता। जहां कोई काम हुआबस बाजार भेज दिया। दिन भर बाजार दौड़ते बीतता था। आज लकड़ी लाने न गयेतो चूल्हा ही नहीं जला। कहो तो मुंह फुलावें। जब आप ही नहीं देखतेतो दूसरा कौन देखेगा? चलिएभोजन कर लीजिए, बहूजी कब से बैठी है।

    मुंशीजी- कह देइस वक्त नहीं खायेंगे।

    मुंशीजी फिर अपने कमेरे में चले गये और एक लम्बी सांस ली। वेदना से भरे हुए ये शब्द उनके मुंह से निकल पड़े- ईश्वरक्या अभी दण्ड पूरा नहीं हुआ? क्या इस अंधे की लकड़ी को हाथ से छीन लोगे?

    निर्मला ने आकर कहा- आज  सियाराम अभी तक नहीं आये। कहती रही कि खाना बनाये देती हूंखा लो मगर सन जाने कब उठकर चल दिये! न जाने कहां घूम रहे हैं। बात तो सुनते ही नहीं। कब तक उनकी राह देखा करु! आप चलकर खा लीजिएउनके लिए खाना उठाकर रख दूंगी।

    मुंशीजी ने निर्मला की ओर कठारे नेत्रों से देखकर कहा- अभी कै बजे होंगे?

    निर्मल- क्या जानेदस बजे होंगे।

    मुंशीजी- जी नहींबारह बजे हैं।

    निर्मला- बारह बज गये? इतनी देर तो कभी न करते थे। तो कब तक उनकी राह देखोगे! दोपहर को भी कुछ नहीं खाया था। ऐसा सैलानी लड़का मैंने नहीं देखा।

    मुंशीजी- जी तुम्हें दिक करता हैक्यों?

    निर्मला- देखिये नइतना रात गयी और घर की सुध ही नहीं।

    मुंशीजी- शायद यह आखिरी शरारत हो।

    निर्मला- कैसी बातें मुंह से निकालते हैं? जायेंगे कहां? किसी यार-दोस्त के यहां पड़ रहे होंगे।

    मुंशीजी- शायद ऐसी ही हो। ईश्वर करे ऐसा ही हो।

    निर्मला- सबेरे आवेंतो जरा तम्बीह कीजिएगा।

    मुंशीजी- खूब अच्छी तरह करुंगा।

    निर्मला- चलिएखा लीजिएदूर बहुत हुई।

    मुंशीजी- सबेरे उसकी तम्बीह करके खाऊंगाकहीं न आयातो तुम्हें ऐसा ईमानदान नौकर कहां मिलेगा?

    निर्मला ने ऐंठकर कहा- तो क्या मैंने भागा दिया?

    मुंशीजी- नहींयह कौन कहता है? तुम उसे क्यों भगाने लगीं। तुम्हारा तो काम करता थाशामत आ गयी होगी।

    निर्मला ने और कुछ नहीं कहा। बात बढ़ जाने का भय था। भीतर चली आयीय। सोने को भी न कहा। जरा देर में भूंगी ने अन्दर से किवाड़ भी बन्द कर दिये।

    क्या मुंशीजी को नींद आ सकती थी? तीन लड़कों में केवल एक बच रहा था। वह भी हाथ से निकल गयातो फिर जीवन में अंधकार के सिवाय और है? कोई नाम लेनेवाल भी नहीं रहेगा। हा! कैसे-कैसे रत्न हाथ से निकल गये? मुंशीजी की आंखों से अश्रुधारा बह रही थीतो कोई आश्चर्य है? उस व्यापक पश्चाताप, उस सघन ग्लानि-तिमिर में आशा की एक हल्की-सी रेखा उन्हें संभाले हुए थी। जिस क्षण वह रेखा लुप्त हो जायेगीकौन कह सकता हैउन पर क्या बीतेगी? उनकी उस वेदना की कल्पना कौन कर सकता है?

    कई बार मुंशीजी की आंखें झपकींलेकिन हर बार सियाराम की आहट के धोखे में चौंक पड़े।

    सबेरा होते ही मुंशीजी फिर सियाराम को खोजने निकले। किसी से पूछते शर्म आती थी। किस मुंह से पूछें? उन्हें किसी से सहानुभूति की आशा न थी। प्रकट न कहकर मन में सब यही कहेंगेजैसा कियावैसा भोगो! सारे दनि वह स्कूल के मैदानों, बाजारों और बगीचों का चक्कर लगाते रहेदो दिन निराहार रहने पर भी उन्हें इतनी शक्ति कैसे हुईयह वही जानें। 

    रात के बारह बजे मुंशीजी घर लौटेदरवाजे पर लालटेन जल रही थीनिर्मला द्वार पर खड़ी थी। देखते ही बोली- कहा भी नहींन जाने कब चल दिये। कुछ पता चला?

    मुंशीजी ने आग्नेय नेत्रों से ताकते हुए कहा- हट जाओ सामने सेनहीं तो बुरा होगा। मैं आपे में नहीं हूं। यह तुम्हारी करनी है। तुम्हारे ही कारण आज मेरी यह दशा हो रही है। आज से छ: साल पहले क्या इस घर की यह दशा थी? तुमने मेरा बना-बनाया घर बिगाड़ दियातुमने मेरे लहलहाते बाग को उजाड़ डाला। केवल एक ठूंठ रह गया है। उसका निशान मिटाकर तभी तुम्हें सन्तोष  होगा। मैं अपना सर्वनाश करने के लिए तुम्हें घर नहीं जाया था। सुखी जीवन को और भी सुखमय बनाना चाहता था। यह उसी का प्रायश्चित है। जो लड़के पान की तरह फेरे जाते थेउन्हें मेरे जीते-जी तुमने चाकर समझ लिया और मैं आंखों से सब कुछ देखते हुए भी अंधा बना बैठा रहा। जाओमेरे लिए थोड़ा-सा संखिया भेज दो। बसयही कसर रह गयी हैवह भी पूरी हो जाये।

    निर्मला ने रोते हुए कहा- मैं तो अभागिन हूं हीआप कहेंगे तब जानूंगी? ने जाने ईश्वर ने मुझे जन्म क्यों दिया था? मगर यह आपने कैसे समझ लिया कि सियाराम आवेंगे ही नहीं?   

    मुंशीजी ने अपने कमरे की ओर जाते हुए कहा- जलाओ मत जाकर   खुशियां मनाओ। तुम्हारी मनोकामना पूरी हो गयी।

    निर्मला सारी रात रोती रही। इतना कलंक! उसने जियाराम को गहने ले जाते देखने पर भी मुंह खोलने का साहस नहीं किया। क्यों? इसीलिए तो कि लोग समझेंगे कि यह मिथ्या दोषारोपण करके लड़के से वैर साध रही हैं। आज उसके मौन रहने पर उसे अपराधिनी ठहराया जा रहा है। यदि वह जियाराम को उसी क्षण रोक देती और जियाराम लज्जावश कहीं भाग जातातो क्या उसके सिर अपराध न मढ़ा जाता?

    सियाराम ही के साथ उसने कौन-सा दुर्व्यवहार किया था। वह कुछ बचत करने के लिए ही विचार से तो सियाराम से सौदा मंगवाया करती थी। क्या वह बचत करके अपने लिए गहने गढ़वाना चाहती थी? जब आमदनी की यह हाल हो रहा था तो पैसे-पैसे पर निगाह रखने के सिवाय कुछ जमा करने का उसके पास और साधान ही क्या था? जवानों की जिन्दगी का तो कोई भरोसा हीं नहींबूढ़ों की जिन्दगी का क्या ठिकाना? बच्ची के विवाह के लिए वह किसके सामने हाथ फैलती? बच्ची का भार कुद उसी पर तो नहीं था। वह केवल पति की सुविधा ही के लिए कुछ बटोरने का प्रयत्न कर रही थी। पति ही की क्यों? सियाराम ही तो पिता के बाद घर का स्वामी होता। बहिन के विवाह करने का भार क्या उसके सिर पर न पड़ता? निर्मला सारी कतर- व्योंत पति और पुत्र का संकट-मोचन करने ही के लिए कर रही थी। बच्ची का विवाह इस परिस्थिति में सकंट के सिवा और क्या था? पर इसके लिए भी उसके भाग्य में अपयश ही बदा था।

    दोपहर हो गयीपर आज भी चूल्हा नहीं जला। खाना भी जीवन का काम हैइसकी किसी को सुध ही नथी। मुंशीजी बाहर बेजान-से पड़े थे और निर्मला भीतर थी। बच्ची कभी भीतर जातीकभी बाहर। कोई उससे बोलने वाला न था। बार-बार सियाराम के कमरे के द्वार पर जाकर खड़ी होती और बैया-बैया पुकारतीपर बैया कोई जवाब न देता था।

    संध्या समय मुंशीजी आकर निर्मला से बोले- तुम्हारे पास कुछ रुपये हैं?

    निर्मला ने चौंककर पूछा- क्या कीजिएगा।

    मुंशीजी- मैं जो पूछता हूंउसका जवाब दो।

    निर्मला- क्या आपको नहीं मालूम है? देनेवाले तो आप ही हैं।

    मुंशीजी- तुम्हारे पास कुछ रुपये हैं या नहीं अगेर होंतो मुझे दे दोन हों तो साफ जवाब दो।

    निर्मला ने अब भी साफ जवाब न दिया। बोली- होंगे तो घर ही में न होंगे। मैंने कहीं और नहीं भेज दिये।

    मुंशीजी बाहर चले गये। वह जानते थे कि निर्मला के पास रुपये हैंवास्तव में थे भी। निर्मला ने यह भी नहीं कहा कि नही हैं या मैं न दूंगीउर उसकी बातों से प्रकट हो यगया कि वह देना नहीं चाहती।

    नौ बजे रात तो मुंशीजी ने आकर रुक्मिणी से काह- बहनमैं जरा बाहर जा रहा हूं। मेरा बिस्तर भूंगी से बंधवा देना और ट्रंक में कुछ कपड़े रखवाकर बन्द कर देना ।

    रुक्मिणी भोजन बना रही थीं। बोलीं- बहू तो कमेरे में हैकह क्यों नही देते? कहां जाने का इरादा है?

    मुंशीजी- मैं तुमसे कहता हूंबहू से कहना होतातो तुमसे क्यों कहाता? आज तुमे क्यों खाना पका रही हो?

    रुक्मिणी- कौन पकावे? बहू के सिर में दर्द हो रहा है। आखिरइस वक्त कहां जा रहे हो? सबेरे न चले जाना।

    मुंशीजी- इसी तरह टालते-टालते तो आज तीन दिन हो गये। इधर-इधर घूम-घामकर देखूंशायद कहीं सियाराम का पता मिल जाये। कुछ लोग कहते हैं कि एक साधु के साथ बातें कर रहा था। शायद वह कहीं बहका ले गया हो।

    रुक्मिणी- तो लौटोगे कब तक?

    मुंशीजी- कह नहीं सकता। हफ्ता भर लग जाये महीना भर लग जाये। क्या ठिकाना है?

    रुक्मिणी- आज कौन दिन है? किसी पंडित से पूछ लिया है कि नहीं?

    मुंशीजी भोजन करने बैठे। निर्मला को इस वक्त उन पर बड़ी दया आयी। उसका सारा क्रोध शान्त हो गया। खुद तो न बोलीबच्ची को जगाकर चुमकारती हुई बोली- देखतेरे बाबूजी कहां जो रहे हैं? पूछ तो?

    बच्ची ने द्वार से झांककर पूछा- बाबू दीतहां दाते हो?   

    मुंशीजी- बड़ी दूर जाता हूं बेटीतुम्हारे भैया को खोजने जाता हूं।   बच्ची ने वहीं से खड़े-खड़े कहा- अम बी तलेंगे।   

    मुंशीजी- बड़ी दूर जाते हैं बच्चीतुम्हारे वास्ते चीजें लायेंगे। यहां क्यों नहीं आती?

    बच्ची मुस्कराकर छिप गयी और एक क्षण में फिर किवाड़ से सिर निकालकर बोली- अम बी तलेंगे।

    मुंशीजी ने उसी स्वर में कहा- तुमको नर्ह ले तलेंगे।

    बच्ची- हमको क्यों नई ले तलोगे?

    मुंशीजी- तुम तो हमारे पास आती नहीं हो।

    लड़की ठुमकती हुई आकर पिता की गोद में बैठ गयी। थोड़ी देर के लिए मुंशीजी उसकी बाल-क्रीड़ा में अपनी अन्तर्वेदना भूल गये।

    भोजन करके मुंशीजी बाहर चले गये। निर्मला खडेक़ी ताकती रही। कहना चाहती थी- व्यर्थ जो रहे होपर कह न सकती थी। कुछ रुपये निकाल कर देने का विचार करती थीपर दे न सकती थी।

    अंत को न रहा गयारुक्मिणी से बोली- दीदीजी जरा समझा दीजिएकहां जा रहे हैं! मेरी जबान पकड़ी जायेगीपर बिना बोले रहा नहीं जाता। बिना ठिकाने कहां खोजेंगे? व्यर्थ की हैरानी होगी।

    रुक्मिणी ने करुणा-सूचक नेत्रों से देखा और अपने कमरे में चली गईं।

    निर्मला बच्ची को गोद में लिए सोच रही थी कि शायद जाने के पहले बच्ची को देखने या मुझसे मिलने के लिए आवेंपर उसकी आशा विफल हो गई? मुंशीजी ने बिस्तर उठाया और तांगे पर जा बैठे।

    उसी वक्त निर्मला का कलेजा मसोसने लगा। उसे ऐसा जान पड़ा कि इनसे भेंट न होगी। वह अधीर होकर द्वार पर आई कि मुंशीजी को रोक लेपर तांगा चल चुका था।

 

पच्चीस

 

दि

न न गुजरने लगे। एक महीना पूरा निकल गयालेकिन मुंशीजी न लौटे। कोई खत भी न भेजा। निर्मला को अब नित्य यही चिन्ता बनी रहती कि वह लौटकर न आये तो क्या होगा? उसे इसकी चिन्ता न होती थी कि उन पर क्या बीत रही होगीवह कहां मारे-मारे फिरते होंगे, स्वास्थ्य कैसा होगा? उसे केवल अपनी औंर उससे भी बढ़कर बच्ची की चिन्ता थी। गृहस्थी का निर्वाह कैसे होगा? ईश्वर कैसे बेड़ा पार लगायेंगे? बच्ची का क्या हाल होगा? उसने कतर-व्योंत करके जो रुपये जमा कर रखे थेउसमें कुछ-न-कुछ रोज ही कमी होती जाती थी। निर्मला को उसमें से एक-एक पैसा निकालते इतनी अखर होती थीमानो कोई उसकी देह से रक्त निकाल रहा हो। झुंझलाकर मुंशीजी को कोसती। लड़की किसी चीज के लिए रोतीतो उसे अभागिनकलमुंही कहकर झल्लाती। यही नहींरुक्मिणी का घर में रहना उसे ऐसा जान पड़ता थामानो वह गर्दन पर सवार है। जब हृदय जलता हैतो वाणी भी अग्निमय हो जाती है। निर्मला बड़ी मधुर-भाषिणी स्त्री थीपर अब उसकी गणना कर्कशाओ में की जा सकती थी। दिन भर उसके मुख से जली-कटी बातें निकला करती थीं। उसके शब्दों की कोमलता न जाने क्या हो गई! भावों में माधुर्य का कहीं नाम नहीं। भूंगी बहुत दिनों से इस घर मे नौकर थी। स्वभाव की सहनशील थीपर यह आठों पहहर की बकबक उससे भी न सकी गई। एक दिन उसने भी घर की राह ली। यहां तक कि जिस बच्ची को प्राणों से भी अधिक प्यार करती थीउसकी सूरत से भी घृणा हो गई। बात-बात पर घुड़क पड़तीकभी-कभी मार बैठती। रुक्मिणी रोई हुई बालिका को गोद में बैठा लेती और चुमकार-दुलार कर चुप करातीं। उस अनाथ के लिए अब यही एक आश्रय रह गया था।

    निर्मेला को अब अगर कुछ अच्छा लगता थातो वह सुधा से बात करना था। वह वहां जाने का अवसर खोजती रहती थी। बच्ची को अब वह अपने साथ न ले जाना चाहती थी। पहले जब बच्ची को अपने घर सभी चीजें खाने को मिलती थींतो वह वहां जाकर हंसती-खेलती थी। अब वहीं जाकर उसे भूख लगती थी। निर्मला उसे घूर-घूरकर देखतीमुटिठयां-बांधकर धमकातीपर लड़की भूख की रट लगाना न छोड़ती थी। इसलिए निर्मला उसे साथ न ले जाती थी। सुधा के पास बैठकर उसे मालूम होता था कि मैं आदमी हूं। उतनी देर के लिए वह चिंताआं से मुक्त हो जाती थी। जैसे शराबी शराब के नशे में सारी चिन्ताएं भूल जाता हैउसी तरह निर्मला सुधा के घर जाकर सारी बातें भूल जाती थी। जिसने उसे उसके घर पर देखा होवह उसे यहां देखकर चकित रह जाता। वहीं कर्कशाकटु-भाषिणी स्त्री यहां आकर हास्यविनोद और माधुर्य की पुतली बन जाती थी। यौवन-काल की स्वाभाविक वृत्तियां अपने घर पर रास्ता बन्द पाकर यहां किलोलें करने लगती थीं। यहां आते वक्त वह मांग-चोटीकपड़े-लत्ते से लैस होकर आती और यथासाध्य अपनी विपत्ति कथा को मन ही में रखती थी। वह यहां रोने के लिए नहींहंसने के लिए आती थी।

    पर कदाचित् उसके भाग्य में यह सुख भी नहीं बदा था। निर्मला मामली तौर से दोपहर को या तीसरे पहर से सुधा के घर जाया करती थी। एक दिन उसका जी इतना ऊबा कि सबेरे ही जा पहुंची। सुधा नदी स्नान करने गई थीडॉक्टर साहब अस्पताल जाने के लिए कपड़े पहन रहे थे। महरी अपने काम-धंधे में लगी हुई थी। निर्मला अपनी सहेली के कमरे में जाकर निश्चिन्त बैठ गई। उसने समझा-सुधा कोई काम कर रही होगीअभी आती होगी। जब बैठे दो-दिन मिनट गुजर गयेतो उसने अलमारी से तस्वीरों की एक किताब उतार ली और केश खोल पलंग पर लेटकर चित्र देखने लगी। इसी बीच में डॉक्टर साहब को किसी जरुरत से निर्मला के कमरे में आना पड़ा। अपनी ऐनक ढूंढते फिरते थे। बेधड़क अन्दर चले आये। निर्मला द्वार की ओर केश खोले लेटी हुई थी। डॉक्टर साहब को देखते ही चौंककार उठ बैठी और सिर ढांकती हुई चारपाई से उतकर खड़ी हो गई। डॉक्टर साहब ने लौटते हुए चिक के पास खड़े होकर कहा- क्षमा करना निर्मला,  मुझे मालूम न था कि यहां हो! मेरी ऐनक मेरे कमरे में नहीं मिल रही हैन जाने कहां उतार कर रख दी थी। मैंने समझा शायद यहां हो।

    निर्मला सने चारपाई के सिरहाने आले पर निगाह डाली तो ऐनक की डिबिया दिखाई दी। उसने आगे बढ़कर डिबिया उतार लीऔर सिर झुकायेदेह समेटेसंकोच से डॉक्टर साहब की ओर हाथ बढ़ाया। डॉक्टर साबह ने निर्मला को दो-एक बार पहले भी देखा थापर इस समय के-से भाव कभी उसके मन में न आये थे। जिस ज्वाजा को वह बरसों से हृदय में दवाये हुए थेवह आज पवन का झोंका पाकर दहक उठी। उन्होंने ऐनक लेने के लिए हाथ बढ़ायातो हाथ कांप रहा था। ऐनक लेकर भी वह बाहर न गयेवहीं खोए हुए से खड़े रहे। निर्मला ने इस एकान्त से भयभीत होकर पूछा- सुधा कहीं गई है क्या?

    डॉक्टर साहब ने सिर झुकाये हुए जवाब दिया- हांजरा स्नान करने चली गई हैं।

    फिर भी डॉक्टर साहब बाहन न गये। वहीं खड़े रहे। निर्मला ने फिश्र पूछा- कब तक आयेगी?

    डॉक्टर साहब ने सिर झुकाये हुए केहा- आती होंगीं।

फिर भी वह बाहर नहीं आये। उनके मन में घारे द्वन्द्व मचा हुआ था। औचित्य का बंधन नहींभीरुता का कच्चा तागा उनकी जबान को रोके हुए था। निर्मला ने फिर कहा- कहीं घूमने-घामने लगी होंगी। मैं भी इस वक्त जाती हूं।

    भीरुता का कच्चा तागा भी टूट गया। नदी के कगार पर पहुंच कर भागती हुई सेना में अद्भुत शक्ति आ जाती है। डॉक्टर साहब ने सिर उठाकर निर्मला को देखा और अनुराग में डूबे हुए स्वर में बोले- नहींनिर्मलाअब आती हो होंगी। अभी न जाओ। रोज सुधा की खातिर से बैठती होआज मेरी खातिर से बैठो। बताओकम तक इस आग में जला करु? सत्य कहता हूं निर्मला...।

    निर्मला ने कुछ और नहीं सुना। उसे ऐसा जान पड़ा मानो सारी पृथ्वी चक्कर खा रही है। मानो उसके प्राणों पर सहस्रों वज्रों का आघात हो रहा है। उसने जल्दी से अलगनी पर लटकी हुई चादर उतार ली और बिना मुंह से एक शब्द निकाले कमरे से निकल गई। डॉक्टर साहब खिसियाये हुए-से रोना मुंह बनाये खड़े रहे! उसको रोकने की या कुछ कहने की हिम्मत न पड़ी।

    निर्मला ज्योंही द्वार पर पहुंची उसने सुधा को तांगे से उतरते देखा। सुधा उसे निर्मला ने उसे अवसर न दियातीर की तरह झपटकर चली। सुधा एक क्षण तक विस्मेय की दशा में खड़ी रहीं। बात क्या हैउसकी समझ में कुछ न आ सका। वह व्यग्र हो उठी। जल्दी से अन्दर गई महरी से पूछने कि क्या बात हुई है। वह अपराधी का पता लगायेगी और अगर उसे मालूम हुआ कि महरी या और किसी नौकर से उसे कोई अपमान-सूचक बात कह दी हैतो वह खड़े-खड़े निकाल देगी। लपकी हुई वह अपने कमरे में गई। अन्दर कदम रखते ही डॉक्टर को मुंह लटकाये चारपाई पर बैठे देख। पूछा- निर्मला यहां आई थी?

    डॉक्टर साहब ने सिर खुजलाते हुए कहा- हांआई तो थीं।

    सुधा- किसी महरी-अहरी ने उन्हें कुछ कहा तो नहीं? मुझसे बोली तक नहींझपटकर निकल गईं।

    डॉक्टी साहब की मुख-कान्ति मजिन हो गईकहा- यहां तो उन्हें किसी ने भी कुछ नहीं कहा।

    सुधा- किसी ने कुछ कहा है। देखोमैं पूछती हूं नईश्वर जानता हैपता पा जाऊंगीतो खड़े-खड़े निकाल दूंगी।

    डॉक्टर साहब सिटपिटाते हुए बोले- मैंने तो किसी को कुछ कहते नहीं सुना। तुम्हें उन्होंने देखा न होगा।

    सुधा-वाहदेखा ही न होगा! उसनके सामने तो मैं तांगे से उतरी हूं। उन्होंने मेरी ओर ताका भीपर बोलीं कुद नहीं। इस कमरे में आई थी?

डॉक्टर साहब के प्राण सूखे जा रहे थे। हिचकिचाते हुए बोले- आई क्यों नहीं थी।

    सुधा- तुम्हें यहां बैठे देखकर चली गई होंगी। बसकिसी महरी ने कुछ कह दिया होगा। नीच जात हैं नकिसी को बात करने की तमीज तो है नहीं। अरेओ सुन्दरियाजरा यहां तो आ!

    डॉक्टर- उसे क्यों बुलाती होवह यहां से सीधे दरवाजे की तरफ गईं। महरियों से बात तक नहीं हुई।

    सुधा- तो फिर तुम्हीं ने कुछ कह दिया होगा।

    डॉक्टर साहब का कलेजा धक्-धक् करने लगा। बोले- मैं भला क्या कह देता क्या ऐसा गंवाह हूं?

    सुधा- तुमने उन्हें आते देखातब भी बैठे रह गये?

    डॉक्टर- मैं यहां था ही नहीं। बाहर बैठक में अपनी ऐनक ढूंढ़ता रहाजब वहां न मिलीतो मैंने सोचाशायद अन्दर हो। यहां आया तो उन्हें बैठे देखा। मैं बाहर जाना चाहता था कि उन्होंने खुद पूछा- किसी चीज की जरुरत है? मैंने कहा- जरा देखनायहां मेरी ऐनक तो नहीं है। ऐनक इसी सिरहाने वाले ताक पर थी। उन्होंने उठाकर दे दी। बस इतनी ही बात हुई।

    सुधा- बसतुम्हें ऐनक देते ही वह झल्लाई बाहर चली गई? क्यों?

    डॉक्टर- झल्लाई हुई तो नहीं चली गई। जाने लगींतो मैंने कहा- बैठिए वह आती होंगी। न बैठीं तो मैं क्या करता?

    सुधा ने कुछ सोचकर कहा- बात कुछ समझ में नहीं आतीमैं जरा उसके पास जाती हूं। देखूंक्या बात है।

    डॉक्टर-तो चली जाना ऐसी जल्दी क्या है। सारा दिन तो पड़ा हुआ है।

    सुधा ने चादर ओढते हुऐ कहा- मेरे पेट में खलबली माची हुई हैकहते हो जल्दी है?

    सुधा तेजी से कदम बढ़ती हुई निर्मला के घर की ओर चली और पांच मिनट में जा पहुंची? देखा तो निर्मला अपने कमरे में चारपाई पर पड़ी रो रही थी और बच्ची उसके पास खड़ी रही थी- अम्मांक्यों लोती हो?

    सुधा ने लड़की को गोद मे उठा लिया और निर्मला से बोली-बहिनसच बताओक्या बात है? मेरे यहां किसी ने तुम्हें कुछ कहा है? मैं सबसे पूछ चुकी, कोई नहीं बतलाता।

    निर्मला आंसू पोंछती हुई बोली- किसी ने कुछ कहा नहीं बहिनभला वहां मुझे कौन कुछ कहता?

    सुधा- तो फिर मुझसे बोली क्यों नहीं ओर आते-ही-आते रोने लगीं?

निर्मला- अपने नसीबों को रो रही हूंऔर क्या।

    सुधा- तुम यों न बतलाओगीतो मैं कसम दूंगी।

    निर्मला- कसम-कसम न रखाना भाईमुझे किसी ने कुछ नहीं कहाझूठ किसे लगा दूं?

    सुधा- खाओ मेरी कसम।

    निर्मला- तुम तो नाहक ही जिद करती हो।

    सुधा- अगर तुमने न बताया निर्मलातो मैं समझूंगीतुम्हें जरा भी प्रेम नहीं है। बससब जबानी जमा- खर्च है। मैं तुमसे किसी बात का पर्दा नहीं रखती और तुम मुझे गैर समझती हो। तुम्हारे ऊपर मुझे बड़ा भरोसा थ। अब जान गई कि कोई किसी का नहीं होता।

    सुधा कीं आंखें सजल हो गई। उसने बच्ची को गोद से उतार लिया और द्वार की ओर चली। निर्मला ने उठाकर उसका हाथ पकड़ लिया और रोती हुई बोली- सुधामैं तुम्हारे पैर पड़ती हूंमत पूछो। सुनकर दुख होगा और शायद मैं फिर तुम्हें अपना मुंह न दिखा सकूं। मैं अभगिनी ने होतीतो यह दिन हि क्यों देखती? अब तो ईश्वर से यही प्रार्थना है कि संसार से मुझे उठा ले। अभी यह दुर्गति हो रही हैतो आगे न जाने क्या होगा?

    इन शब्दों में जो संकेत थावह बुद्विमती सुधा से छिपा न रह सका। वह समझ गई कि डॉक्टर साहब ने कुछ छेड़-छाड़ की है। उनका हिचक-हिचककर बातें करना और उसके प्रश्नों को टालनाउनकी वह ग्लानिमयेकांतिहीन मुद्रा उसे याद आ गई। वह सिर से पांव तक कांप उठी और बिना कुछ कहे-सुने सिंहनी की भांति क्रोध से भरी हुई द्वार की ओर चली। निर्मला ने उसे रोकना चाहापर न पा सकी। देखते-देखते वह सड़क पर आ गई और घर की ओर चली। तब निर्मला वहीं भूमि पर बैठ गई और फूट-फूटकर रोने लगी।

 

छब्बीस

 

निर्मला दिन भर चारपाई पर पड़ी रही। मालूम होता हैउसकी देह में प्राण नहीं है। न स्नान कियान भोजन करने उठी। संध्या समय उसे ज्वर हो आया। रात भर देह तवे की भांति तपती रही। दूसरे दिन ज्वर न उतरा। हां, कुछ-कुछ कमे हो गया था। वह चारपाई पर लेटी हुई निश्चल नेत्रों से द्वार की ओर ताक रही थी। चारों ओर शून्य थाअन्दर भी शून्य बाहर भी शून्य कोई चिन्ता न थीन कोई स्मृतिन कोई दु:खमस्तिष्क में स्पन्दन की शक्ति ही न रही थी।

    सहसा रुक्मिणी बच्ची को गोद में लिये हुए आकर खड़ी हो गई। निर्मला ने पूछा- क्या यह बहुत रोती थी?

    रुक्मिणी- नहींयह तो सिसकी तक नहीं। रात भर चुपचाप पड़ी रहीसुधा ने थोड़ा-सा दूध भेज दिया था।

    निर्मला- अहीरिन दूध न दे गई थी?

    रुक्मिणी- कहती थीपिछले पैसे दे दोतो दूं। तुम्हारा जी अब कैसा है?

    निर्मला- मुझे कुछ नहीं हुआ है? कल देह गरम हो गई थीं।

    रुक्मिणी- डॉक्टर साहब का बुरा हाल है?

    निर्मला ने घबराकर पूछा- क्या हुआक्या? कुशल से है न?

    रुक्मिणी- कुशल से हैं कि लाश उठाने की तैयारी हो रही है! कोई कहता हैजहर खा लिया थाकोई कहता हैदिल का चलना बन्द हो गया था। भगवान् जाने क्या हुआ था।

    निर्मला ने एक ठण्डी सांस ली और रुंधे हुए कंठ से बोली- हाया भगवान्! सुधा की क्या गति होगी! कैसे जियेगी?

    यह कहते-कहते वह रो पड़ी और बड़ी देर तक सिसकती रही। तब बड़ी मुश्किल से उठकर सुधा के पास जाने को तैयार हुई पांव थर-थर कांप रहे थेदीवार थामे खड़ी थीपर जी न मानता था। न जाने सुधा ने यहां से जाकर पति से क्या कहा? मैंने तो उससे कुछ कहा भी नहींन जाने मेरी बातों का वह क्या मतलब समझी? हाय! ऐसे रुपवान् दयालुऐसे सुशील प्राणी का यह अन्त! अगर निर्मला को मालूम होत कि उसके क्रोध का यह भीषण परिणाम होगातो वह जहर का घूंट पीकर भी उस बात को हंसी में उड़ा देती।

    यह सोचकर कि मेरी ही निष्ठुरता के कारण डॉक्टर साहब का यह हाल हुआनिर्मला के हृदय के टुकड़े होने लगे। ऐसी वेदना होने लगीमानो हृदय में शूल उठ रहा हो। वह डॉक्टर साहब के घर चली।

    लाश उठ चुकी थी। बाहर सन्नाटा छाया हुआ था। घर में स्त्रीयां जमा थीं। सुधा जमीन पर बैठी रो रही थी। निर्मला को देखते ही वह जोर से चिल्लाकर रो पड़ी और आकर उसकी छाती से लिपट गई। दोनों देर तके रोती रहीं।

    जब औरतों की भीड़ कम हुई और एकान्त हो गयानिर्मला ने पूछा- यह क्या हो गया बहिनतुमने क्या कह दिया?

    सुधा अपने मन को इसी प्रश्न का उत्तर कितनी ही बार दे चुकी थी। उसकी मन जिस उत्तर से शांत हो गया थावही उत्तर उसने निर्मला को दिया। बोली- चुप भी तो न रह सकती थी बहिनक्रोध की बात पर क्रोध आती ही है।

निर्मला- मैंने तो तुमसे कोई ऐसी बात भी न कही थी।

    सुधा- तुम कैसे कहतीकह ही नहीं सकती थींलेकिन उन्होंने जो बात हुई थीवह कह दी थी। उस पर मैंने जो कुद मुंह में आयाकहा। जब एक बात दिल में आ गई,तो उसे हुआ ही समझना चाहिये। अवसर और घात मिलेतो वह अवश्य ही पूरी हो। यह कहकर कोई नहीं निकल सकता कि मैंने तो हंसी की थी। एकान्त में एसा शब्द जबान पर लाना ही कह देता है कि नीयत बुरी थी। मैंने तुमसे कभी कहा नहीं बहिनलेकिन मैंने उन्हें कई बात तुम्हारी ओर झांकते देखा। उस वक्त मैंने भी यही समझा कि शायद मुझे धोखा हो रहा हो। अब मालूम हुआ कि उसक ताक-झांक का क्या मतलब था! अगर मैंने दुनिया ज्यादा देखी होतीतो तुम्हें अपने घर न आने देती। कम-से-कम तुम पर उनकी निगाह कभी ने पड़ने देतीलेकिन यह क्या जानती थी कि पुरुषों के मुंह में कुछ और मन में कुछ और होता है। ईश्वर को जो मंजूर थावह हुआ। ऐसे सौभाग्य से मैं वैधव्य को बुर नहीं समझती। दरिद्र प्राणी उस धनी से कहीं सुखी हैजिसे उसका धन सांप बनकर काटने दौड़े। उपवास कर लेना आसान हैविषैला भोजन करन उससे कहीं मुंश्किल ।

    इसी वक्त डॉक्टर सिन्हा के छोटे भाई और कृष्णा ने घर में प्रवेश किया। घर में कोहराम मच गया।

 

सत्ताईस

 

क महीना और गुजर गया। सुधा अपने देवर के साथ तीसरे ही दिन चली गई। अब निर्मला अकेली थी। पहले हंस-बोलकर जी बहला लिया करती थी। अब रोना ही एक काम रह गया। उसका स्वास्थय दिन-दिन बिगडेक़ता गया। पुराने मकान का किराया अधिक था। दूसरा मकान थोड़े किराये का लियायह तंग गली में था। अन्दर एक कमरा था और छोटा-सा आंगन। न प्रकाशा जातान वायु। दुर्गन्ध उड़ा करती थी। भोजन का यह हाल कि पैसे रहते हुये भी कभी-कभी उपवास करना पड़ता था। बाजार से जाये कौन? फिर अपना कोई मर्द नहीं, कोई लड़का नहींतो रोज भोजन बनाने का कष्ट कौन उठाये? औरतों के लिये रोज भोजन करेन की आवश्यका ही क्या? अगर एक वक्त खा लियातो दो दिन के लिये छुट्टी हो गई। बच्ची के लिए ताजा हलुआ या रोटियां बन जाती थी! ऐसी दशा में स्वास्थ्य क्यों न बिगड़ता? चिन्तशोकदुरवस्थाएक हो तो कोई कहे। यहां तो त्रयताप का धावा था। उस पर निर्मला ने दवा खाने की कसम खा ली थी। करती ही क्या? उन थोड़े-से रुपयों में दवा की गुंजाइश कहां थी? जहां भोजन का ठिकाना न था, वहां दवा का जिक्र ही क्या? दिन-दिन सूखती चली जाती थी।

    एक दिन रुक्मिणी ने कहा- बहुइस तरक कब तक घुला करोगीजी ही से तो जहान है। चलोकिसी वैद्य को दिखा लाऊं।

    निर्मला ने विरक्त भाव से कहा- जिसे रोने के लिए जीना होउसका मर जाना ही अच्छा।

    रुक्मिणी- बुलाने से तो मौत नहीं आती?

    निर्मला- मौत तो बिन बुलाए आती हैबुलाने में क्यों न आयेगी? उसके आने में बहुत दिन लगेंगे बहिनजै दिन चलती हूं, उतने साल समझ लीजिए।

    रुक्मिणी- दिल ऐसा छोटा मत करो बहूअभी संसार का सुख ही क्या देखा है?

    निर्मला- अगर संसार की यही सुख हैजो इतने दिनों से देख रही हूंतो उससे जी भर गया। सच कहती हूं बहिनइस बच्ची का मोह मुझे बांधे हुए हैनहीं तो अब तक कभी की चली गई होती। न जाने इस बेचारी के भाग्य में क्या लिखा है?

    दोनों महिलाएं रोने लगीं। इधर जब से निर्मला ने चारपाई पकड़ ली हैरुक्मिणी के हृदय में दया का सोता-सा खुल गया है। द्वेष का लेश भी नहीं रहा। कोई काम करती होंनिर्मला की आवाज सुनते ही दौड़ती हैं। घण्टों उसके पास कथा-पुराण सुनाया करती हैं। कोई ऐसी चीज पकाना चाहती हैंजिसे निर्मला रुचि से खाये। निर्मला को कभी हंसते देख लेती हैंतो निहाल हो जाती है और बच्ची को तो अपने गले का हार बनाये रहती हैं। उसी की नींद सोती हैंउसी की नींद जागती हैं। वही बालिका अब उसके जीवन का आधार है।

    रुक्मिणी ने जरा देर बाद कहा- बहूतुम इतनी निराश क्यों होती हो? भगवान् चाहेंगेतो तुम दो-चार दिन में अच्छी हो जाओगी। मेरे साथ आज वैद्यजी के पास चला। बड़े सज्जन हैं।

    निर्मला- दीदीजीअब मुझे किसी वैद्यहकीम की दवा फायदा न करेगी। आप मेरी चिन्ता न करें। बच्ची को आपकी गोद में छोड़े जाती हूं। अगर जीती-जागती रहेतो किसी अच्छे कुल में विवाह कर दीजियेगा। मैं तो इसके लिये अपने जीवन में कुछ न कर सकीकेवल जन्म देने भर की अपराधिनी हूं। चाहे क्वांरी रखियेगाचाहे विष देकर मार डालिएगपर कुपात्र के गले न मढ़िएगाइतनी ही आपसे मेरी विनय है। मैंनें आपकी कुछ सेवा न कीइसका बड़ा दु:ख हो रहा है। मुझ अभागिनी से किसी को सुख नहीं मिला। जिस पर मेरी छाया भी पड़ गईउसका सर्वनाश हो गया अगर स्वामीजी कभी घर आवेंतो उनसे कहिएगा कि इस करम-जली के अपराध क्षमा कर दें।

    रुक्मिणी रोती हुई बोली- बहूतुम्हारा कोई अपराध नहीं ईश्वर से कहती हूंतुम्हारी ओर से मेरे मन में जरा भी मैल नहीं है। हांमैंने सदैव तुम्हारे साथ कपट कियाइसका मुझे मरते दम तक दु:ख रहेगा।

    निर्मला ने कातर नेत्रों से देखते हुये केहा- दीदीजीकहने की बात नहींपर बिना कहे रहा नहीं जात। स्वामीजी ने हमेशा मुझे अविश्वास की दृष्टि से देखालेकिन मैंने कभी मन मे भी उनकी उपेक्षा नहीं की। जो होना थावह तो हो ही चुका था। अधर्म करके अपना परलोक क्यों बिगाड़ती?  पूर्व जन्म में न जाने कौन-सा पाप किया था, जिसका वह प्रायश्चित करना पड़ा। इस जन्म में कांटे बोतीतोत कौन गति होती?

    निर्मला की सांस बड़े वेग से चलने लगीफिर  खाट पर लेट गई और बच्ची की ओर एक ऐसी दृष्टि से देखाजो उसके चरित्र जीवन की संपूर्ण विमत्कथा की वृहद् आलोचना थीवाणी में इतनी सामर्थ्य कहा?

    तीन दिनों तक निर्मला की आंखों से आंसुओं की धारा बहती रही। वह न किसी से बोलती थीन किसी की ओर देखती थी और न किसी का कुछ सुनती थी। बसरोये चली जाती थी। उस वेदना का कौन अनुमान कर सकता है?

    चौथे दिन संध्या समय वह विपत्ति कथा समाप्त हो गई। उसी समय जब पशु-पक्षी अपने-अपने बसेरे को लौट रहे थेनिर्मला का प्राण-पक्षी भी दिन भर शिकारियों के निशानोंशिकारी चिड़ियों के पंजों और वायु के प्रचंड झोंकों से आहत और व्यथित अपने बसेरे की ओर उड़ गया।

    मुहल्ले के लोग जमा हो गये। लाश बाहर निकाली गई। कौन दाह करेगायह प्रश्न उठा। लोग इसी चिन्ता में थे कि सहसा एक बूढ़ा पथिक एक बकुचा लटकाये आकर खड़ा हो गया। यह मुंशी तोताराम थे।


Jan Jan Ki Baat

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